Wednesday, 24 November 2021

शिव गणेश।

शिव और गणेश। 

‌पार्वती के मैल से गणेश की उत्पत्ति हुई यह तो सब जानते है लेकिन एक कहानी और भी है। ब्रह्मा नारद को जब मैल से गणेश की उत्पत्ति के बारे में बताता है तो यह भी कहता है कि गणेश के दूसरे तरीके के जनम की कहानी शिव के पहले वाले कल्प में हुई थी (1) जिसका विवरण ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा हुआ मिलता है। एक कल्प 4 अरब 32 करोड़ का होता है जिसको 14 मन्वन्तरों में बांटा गया है। एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युग ( सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग) होते हैं। एक चतुर्युग की आयु 43 लाख 20 हजार वर्ष है। 1000 चतुर्युग का एक कल्प होता है।  लेकिन एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युग और 14 मन्वन्तर का एक कल्प। यह 994 चतुर्युग ही हुए। तो भगत लोगों हर एक मन्वन्तर से दूसरे मन्वन्तर शुरू होने में भी कुछ काल और कल्प के शुरू और अंत में भी कुछ काल होता है उसकी गणना करके 1000 चतुर्युग के बराबर का समय बनेगा। 43 लाख 20 हजार ( एक चतुर्युग की आयु) x 1000 . ऐसी गणना पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद ने बताई है। (https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA).  दयानंद ने भी वेदों कि उमर इसी तरह की गणना कर के बनाई है लेकिन दो चतुर्युगों के बीच के समय की गणना नहीं की है। उसके अनुसार वेद सृष्टि की शुरुआत में आए अभी 14 मन्वन्तरों में से 7 वा मन्वन्तर के कुल 71चतुर्युग का 28 वा चतुर्युग चल रहा है। उसके अनुसार अब 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 52 हजार 9 सौ 84 वर्ष पहले सृष्टि की शुरुआत हुई और तभी शुरुआत में ही वेद आ गए। (  https://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/vedic/)
‌लेकिन गणेश की एक कहानी तो इस सृष्टि के पहली वाली सृष्टि से भी संबंधित है और दूसरी शायद इसी सृष्टि से। कहने को तो यह भी कहा जा सकता था इस चल रहे 7 वे मन्वन्तर के 28 वे चतुर्युग की नहीं 27 वे चतुर्युग के सतयुग की है या 6 वे मन्वन्तर की है लेकिन यह ना बोल कर सीधे सीधे पिछले कल्प की कहानी बता दी।
पहली वाली कहानी के अनुसार शिव और पार्वती अपने घर में मैथुन रत में लग्न थे कि एक ब्राह्मण ने भिक्षा मांगी जिससे शिव का वीर्य पार्वती के शरीर में नहीं बिस्तर पर ही गिर गया।(2) भिक्षु कोई और नहीं स्वयं भगवान थे जिसने छिपकर शिव पार्वती के बिस्तर पर बालक का रूप ले लिया (3)और बिस्तर पर गिरा हुए  वीर्य भी उसी बालक में मिल गया। ( 4) जबकि शिव पार्वती उस भिक्षु को ढूंढने लगे। तभी आकाशवाणी हुई जिसमें पार्वती को अपना बालक संभालने को कहा। यही तो था गणेश। ( स्कन्द पुराण में कहानी इस प्रकार है कि अग्नि देवता खुद भिक्षु बन कर शिव पार्वती के घर पर गया तो पार्वती ने उसके हाथ पर शिव का वीर्य रख दिया जिसको अग्नि ने पी लिया तब पार्वती कुपित हो कर बोली कि तू सर्वभक्षी हो जाएगा तभी से अग्नि हर एक वस्तु को जला देती है यानी खा जाती हैं और अग्नि के वीर्य पीने से स्कन्द की उत्पत्ति हुई जिसको कभी अग्नि पुत्र और कभी शिव पुत्र भी कहा जाता है - https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2245944082204507&id=100003668123693  )

फिर सिर कैसे कटा? 

बालक को देखने के लिए सूर्य का पुत्र शनि आया। वह बालक की तरफ देखता ही नहीं था तो पार्वती ने कारण पूछा तो शनि ने बताया कि मेरी पत्नी को जब ऋतु स्नान हुआ तब उसने इस तरह से सिंगार किया कि मुनियों के मन भी डोल जाएं। उसने मुझे बुलाया लेकिन मैने उसकी तरफ नहीं देखा तब उसने मुझे श्राप दिया कि तूने मेरा ऋतुकाल नष्ट किया है अब तू जिस की तरफ भी देखेगा वह नष्ट हो जाएगा। ( यह श्राप शनि को तो नहीं हुआ, नुकसान शनि का नहीं बल्कि उसका होगा जिसको शनि देखेगा।) (5)

पार्वती ने श्राप को जांचने के लिए उसको कहा कि तुम देखो और उसके देखते ही बालक का सिर उड़ गया। (5)

फिर एक हाथी अपनी पत्नी और बालकों के साथ सो रहा था तब उसका सिर काटा जिस पर हाथी की पत्नी और बालकों ने रोष किया तब किसी और हाथी का सिर काट कर वहां हाथी पर लगा दि कोया। और पहले काटे हाथी का सिर गणेश के लगा दिया। (6)

हाथी का सिर क्यों काटा ?

 इसके पीछे भी एक कहानी बनाई गई है। दुर्वासा ऋषि ने एक बार एक फूल इन्द्र को दिया कि जो भी इस फूल को मस्तक पर धारण करेगा उसी की सबसे पहले पूजा होगी। इन्द्र ने वह फूल खुद अपने मस्तक पर ना रख कर हाथी के मस्तक पर रख दिया। इसी के प्रभाव से उसी हाथी का सिर गणेश के लगा और सबसे पहले उसी की पूजा होती है। (7)
 
‌वह गणेश,  शिव पार्वती का बेटा है जिसकी सर्वप्रथम पूजा होती ही या वह वहीं हाथी है जिसके मस्तक पर इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि वाला फूल रख दिया था ? 

अगर कोई किसी को कहे कि तेरा सिर काट कर ले जाना है और इस सिर की बहुत पूजा हुआ करेगी तो क्या कोई अपना सिर कटवाने को तैयार हो जाएगा ?

गणेश की उत्पत्ति पार्वती के मैल से। ( शिव पुराण में दी हुई कहानी के अनुसार )

पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक चेतन, विशाल और पराक्रमी पुरुष का निर्माण किया। (8) उसने शिव को अंदर जाने से रोका। इसके बाद की कहानी तो सभी जानते ही है लेकिन शिव पुराण के अनुसार शिव ने अपने गणों के द्वारा पता लगा लिया था कि यह पार्वती का बेटा है फिर भी अपने गणों और देवताओं को बुला कर गणेश से युद्ध करवाया ताकि उनका गर्व तोड़ा जा सके।(9) कोई भी गणेश को हरा नहीं सका तब शिव ने खुद आ कर गणेश का सिर काट दिया।(10) यह पता होने के बावजूद कि यह पार्वती का बेटा है फिर महादेव ने गणेश का सिर क्यों काटा ? क्या वह पार्वती के पुत्र को अपना पुत्र नहीं समझता था ? शिव के गणों ने ही शिव को बताया कि वह पार्वती का बेटा है और शिव उन्हीं गणों को पार्वती के बेटे से युद्ध करने को बोलता है। गण भी क्या सोचते होंगे कि अपनी ही पत्नी के बेटे से लड़ने के लिए बोल रहा है।

पार्वती कुपित हुई तो देवता लगे मनाने। वह मानने को तैयार तो हुई लेकिन इस शर्त पर कि गणेश को जीवित करो और फिर इसी गणेश की सर्वप्रथम पूजा होनी चाहिए।(11)

फिर ऋषि उत्तर दिशा में गए जो भी पहला जीव मिला उसी का सिर काट कर उस गणेश के साथ जोड़ दिया। वह जीव था एक दांत वाला हाथी। यानी हाथी का क्यों काटा, एक दांत क्यों हुआ कोई सफाई, कोई नई कहानी नहीं। जो जीव पहले मिला उसी का सिर काटा। अब हाथी ही मिला, एक दांत वाला ही मिला तो कोई क्या कर सकता है ? (12)

ब्रह्मवैवर्त पुराण की मेरे पास दो पुस्तके हैं। शिव का वीर्य जो बिस्तर पर गिरा उसके बालक के साथ सयुक्त होने की बात सिर्फ एक ही में है। उसका मुख पृष्ठ (13) और एक और पन्ना डाल रहा हूं जिसमें प्रकाशक ने खुद लिखा है कि परशुराम द्वारा गणेश का एक दांत के तोड़ने की कहानी मनोरंजन के लिए ही है फिर भी पाठक इसको शिक्षा के तौर पर के सकते हैं कि झगड़ा नहीं करना चाहिए। (14)

मुझे तो सभी कहानियां मनोरंजन के लिए ही बनाई हुई लगती हैं। 

कुछ लोग अपना जोर यह सिद्ध करने में लगा देते है कि बिना वीर्य के खीर खाने से ही आयुर्वेद उपचार से बच्चा पैदा हो सकता है। शिव के एक तीसरे बेटे के बारे में भी कहानी है जो शिव के पसीने से पैदा हुआ। स्कन्द और गणेश तो फिर भी शिव के वीर्य से पैदा हुए लेकिन तीनों ( अगर गणेश दो हैं तो चारों) में से किसी ने भी किसी औरत के गर्भ से जन्म नहीं लिया।
कोष्ठक में जो अंक लिखे है, वहीं अंक संबंधित पन्नो पर लगे हैं।


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1.   मेरी पिछली पोस्ट "शिव और गणेश" जो 02 अगस्त को डाली थी,  में किसी ने कमेंट किया कि मैं भी पहले सनातन धर्म को नहीं मानता था परन्तु अब समझ आ रहा है कि जो लिखा रहा वह काल्पनिक नहीं वैज्ञानिक था और वह आज सच हो रहा है। उसने आगे बताया कि तुलसीदास ने 600 साल पहले ही पृथ्वी और सूर्य की सही सही गणना कर दी थी।

2.   कैसे गणना की थी, आओ देखतें है:-

नोट :- निम्नलिखित मैने vigyanam नाम की वेबसाइट से कॉपी किया है।

"हनुमान चालीसा में एक दोहा है:

जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु. लील्यो ताहि मधुर फल जानू..

इस दोहे का सरल अर्थ यह है कि हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था।

हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था।

एक युग = 12000 वर्ष
एक सहस्त्र = 1000
एक योजन = 8 मील

युग x सहस्त्र x योजन = पर भानु

12000 x 1000 x 8 मील = 96000000 मील

एक मील = 1.6 किमी

96000000 x 1.6 = 153600000 किमी"

3.   दोहे में सूर्य युग सहस्त्र योजन दूर है, ऐसा करके तुलसीदास ने लिखा और व्याख्या करने वालों ने इसको आज के विज्ञान के साथ मिला कर दिखा दिया। लेकिन दोहे का दूसरा हिस्सा जिसमें लिखा है कि इतनी दूर होने पर भी हनुमान ने इसको मीठा फल जान कर खा लिया, इस पर कोई कुछ नहीं बोलेगा। अब जो बोला रहें हैं उसकी पड़ताल भी जरूरी है कि क्या वे सच भी बोल रहे हैं। 

4.   (क)   युग को इन्होंने बताया 12000 वर्ष का। युग का मान 12000 वर्ष कहां से लिया ? एक तो होता है सतयुग वगेरह और चतुर्युग। इनमे से किसी की भी आयु 12000 वर्ष नहीं हैै। इससे बहुत ज्यादा है।  फिर "युग सहस्त्र" को इन्होंने 12000 x 1000 कर दिया जो बन गया 1 करोड़ 20 लाख।  12000 से क्यों गुना किया, 12000 वर्ष  बताया जा रहा है। वर्ष के 365 से गुना क्यों नहीं किया, घंटे बनाने के लिए 24 से गुना क्यों नहीं किया, इसी तरह मिनट सेकंड, नैनो सेकंड कोन बनाएगा? क्या तुलसीदास को 1 करोड़ 20 लाख नहीं लिखना आता था ? 120 लाख भी लिख सकता था।  वानर सेना की गिनती बताते समय तुलसीदास ने 18 पदम संख्या बता सकता है तो 1 करोड़ 20 लाख क्यों नहीं बता सकता था ? 

      (ख)  "अस मैं सुना श्रवन दसकंधर । पदुम      अठारह जूथप बंदर ।" सुंदर काण्ड 54

      (ग)  सौ करोड़ ( शत कोटि) भी लिखा।

मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।
जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ।। सुंदर काण्ड 53

भावार्थ:- मेघनाद के समान सौ करोड़ (अन गिनित) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं, परन्तु जगत्‌ के आधार श्री शेषजी (लक्ष्मणजी) उनसे कैसे उठते? तब वे लजाकर चले गए।

    (घ)   इसी तरह तुलसीदास ने अरब खरब सब इस्तेमाल किए है फिर 1 करोड़ 20 लाख लिखने में परेशानी क्या थी।

5.    युग का मान 12000 वर्ष ही लेना है, सतयुग, त्रेता, द्वापर या कलयुग का मान नहीं लेना यह किसने बताया। कलयुग की आयु बताई है 432000 वर्ष, द्वापर की इस से दो गुनी, त्रेता की इससे तीन गुनी और सतयुग की इससे चार गुनी। 

6.   आज हम सूर्य की पृथ्वी की दूरी 8 प्रकाश मिनट ( लगभग) भी बताते है। जिसका मतलब होता है 8 x 60 x 3 लाख ( मतलब 8 मिनट के सेकंड बनाओ और एक सेकंड में जितने किलोमीटर प्रकाश सफर तय करता है उससे गुना करो ।

7.   12000 वर्ष बताया तो सिर्फ 12000 से गुना क्यों?

8.    तुलसीदास को दूरी या लंबाई नापने की कितनी समझ थी इन्हीं ज्ञानियों के अनुसार ही समझने की कोशिश करते हैं। इन्होंने बताया कि योजन 8 मील यानी 12.8 किलोमीटर का होता है। तुलसीदास ने लिखा :-

      ( क).  जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥1॥ किशिकंधा कांड 28/29

भावार्थ
जो सौ योजन (चार सौ कोस) समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा, वही श्री रामजी का कार्य कर सकेगा। (निराश होकर घबराओ मत) मुझे देखकर मन में धीरज धरो। देखो, श्री रामजी की कृपा से (देखते ही देखते) मेरा शरीर कैसा हो गया (बिना पाँख का बेहाल था, पाँख उगने से सुंदर हो गया) । यानी रामेश्वरम के समुन्द्र तट से लंका कि दूरी 100 योजन यानी 800 मील यानी 1280 किलोमीटर।  यह तो सरासर झूठ है।

        (ख).    "सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।"   सुंदर काण्ड 3.5

अर्थात
जब हनुमान समुन्द्र के ऊपर से लंका जा रहा था तब सुरसा ने हनुमान को निगलने के लिए अपने मुंह को बढ़ाती रही और हनुमान उससे दुगने शरीर वाले बनते रहे। आखिर में सुरसा ने जब 100 योजन मुंह खोला तो हनुमान ने सूक्ष्म रूप लेकर मुंह में प्रवेश कर गए।

100 योजन मतलब 1280 किलोमीटर का लंबा मुंह खुल गया। यानी दिल्ली से दमन जितनी दूरी तक।

      (ग).   मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला॥ अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं॥ लंका काण्ड 3.3

भावार्थ बहुत तरह के मगर, नाक (घड़ियाल), मच्छ और सर्प थे, जिनके सौ-सौ योजन के बहुत बड़े विशाल शरीर थे। कुछ ऐसे भी जंतु थे, जो उनको भी खा जाएँ। किसी-किसी के डर से तो वे भी डर रहे थे। 

जब समुन्द्र पर पुल बांधां जा रहा था उस समय का विवरण तुलसीदास ने लिखा कि समुन्द्र में मगरमच्छ, मछली का शरीर 100 योजन का था और कुछ तो इतने बड़े थे जो इनको भी खा जाएं। 1280 किलोमीटर का लंबा चौड़ा शरीर ? और जो इनको भी खा जाएं उनका कितना बड़ा शरीर ?

यानी तुलसीदास ने 100 योजन का रट्टा लगा रखा था ।

अब उपरोक्त 4(ख) की पड़ताल से पता लगता है कि तुलसीदास का गणित बहुत ही कमजोर था। तुलसीदास हिंदी साहित्य के सम्राट थे, इसमें कोई शक नहीं। इसी साहित्य कौशल के बल पर कितनी ही गलत धारणाएं समाज में पेश की। अब बात गणित की। 18 पदम बन्दर। यानी 1800 के बाद 13 शून्य। पूरी धरती ( समुन्द्र समेत) का क्षेत्रफल 51,00,67,420 ( 51 करोड़ 67 हजार 4 सौ 20) वर्ग किलोमीटर जिसमें समुन्द्र को छोड़ कर धरती का क्षेत्रफल 14,89,40,000 ( 14 करोड़ 89 लाख 40 हजार) वर्ग किलोमीटर. अब वर्ग मीटर बनाने के लिए उपरोक्त वर्ग किलोमीटर के पीछे 6 शून्य लग जाएंगे। 14 करोड़ 89 लाख 40 हजार को 15 करोड़ भी मान ले तो बनेंगे 15 के पीछे 13 शून्य। 18 पदम यानी 1800 के पीछे 13 शून्य को 15 के पीछे 13 शून्य से भाग करेंगे तो  120 बन्दर प्रति वर्ग मीटर आएंगे. 6 फीट x 6 फीट के बेड के बनते है 3.34450944 वर्ग मीटर। 
120 को अगर इस 3.34450944 से गुणा करेंगे तो 401.34 आएगा। यानी एक डबल बेड पर 401 बन्दर। और फिर पूरी धरती तो ढक गई इन बंदरों से, तो बाकी के जानवर और आदमी कहां जाएंगे। क्या डबल बेड पर 401 बन्दर आ सकते है। क्या इतने बन्दर लंका में या संयुक्त भारत में समा सकते है ?

पुत्र प्राप्ति।

29 अगस्त 2021

धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी। उसके 100 पुत्र और एक पुत्री। सभी लोग सवाल करते हैं कि जब 100 वें पुत्र ने जनम लिया तब पहले पुत्र की आयु क्या थी ? अब जो अंड भगत है वह सिर्फ इतना ही जवाब देते है या यूं कहो कि जवाब देने की जगह उल्टा सवाल करते है कि स्टेम सेल का नाम सुना है, टेस्ट ट्यूब बेबी का नाम सुना है ? यानी वह कहना तो चाहते है कि टेस्ट ट्यूब बेबी की तरह एक साथ 101 बच्चों का निर्माण टेस्ट ट्यूब में किया गया, पर कह नहीं पाते।

आधुनिक विज्ञान ने पुरुष का स्पर्म और स्त्री का अंडाणु को लेबोरेटरी या टेस्ट ट्यूब में मिलन करवाया जाता है । जिससे भ्रूण तैयार होता है। स्पर्म और अंडाणु के मिलन के 5 दिन पश्चात ही औरत के गर्भ में डाल दिया जाता है। 9 महीने पश्चात बच्चा पूर्ण विकसित हो कर बाहर आ जाता है। स्पर्म और अंडाणु में एक कोशिका के मुकाबले आधे आधे गुण सूत्र होते है। पुरुष स्पर्म में पुरुष कोशिका के आधे गुण सूत्र और अंडाणु में स्त्री की कोशिका के आधे गुण सूत्र। मिलने से एक पूर्ण नई कोशिका का निर्माण होता है। वैज्ञानिक यह कोशिश कर रहे है कि अंडाणु से स्त्री के गुण सूत्र निकाल कर पुरुष कोशिका से पूरे के पूरे गुण सूत्र जो कि कोशिका के न्यूक्लस में होते है, डाल दिए जाएं जबकि पुरुष स्पर्म में आधे होते हैं। इसको कोलोन विधि कहते हैं। इस तरह नव जन्मे बच्चे में पूरे के पूरे गुण उस से मिलते है जिसकी कोशिका से न्यूक्लस लिया गया हो। भ्रूण के बनते ही दो तीन दिन तक इसको मादा के गर्भ में डाल दिया जाता है। निश्चित अवधि पर विकसित हो कर बच्चा बाहर आ जाता है। यह विधि आदमियों पर लाख कोशिशों के बावजूद कामयाब नहीं हुई है। भेड़ और कुछ और जानवरों पर कामयाबी पाई हैं।

स्टेम सेल यानी स्टेम कोशिका एक विशेष प्रकार की कोशिका है जो अपनी जैसी कोशिकाओं का निर्माण करती है और उनमें क्षमता होती है कि वह पूर्ण शरीर या पूर्ण अंग में विकसित हो जाए। अंड और स्पर्म के मिलन से भी स्टेम सेल का निर्माण होता है।

 मैं कोई विज्ञान का विद्यार्थी नहीं रहा लेकिन साधारण जानकारी के लिए लिखा है ताकि इस का मुकाबला हम गांधारी के 101 पुत्र/पुत्री पैदा होने की प्रक्रिया से मुकाबला कर सकें। बहस सिर्फ गांधारी के 101 बच्चों के पैदा होने की प्रक्रिया को विज्ञान से जोड़ने पर केन्द्रित होनी चाहिए।

1.     गांधारी के ससुर व्यास ने वरदान दिया 100 पुत्र होने का । वरदान वाली बात को विज्ञान से कैसे जोड़ेंगे। क्या कोलोन विधि उसी पर काम करेगी जिसको वरदान मिला हो ? आदीपर्व 114 वा अध्याय (1) 
 
2.     2 वर्ष गर्भ बना रहा और जब कुंती के पहला बच्चा हुआ युधिष्ठिर तो गांधारी को चिंता हुई और जबरदस्ती प्रहार करके गर्भ गिरा दिया। पेट से निकला एक लोहे के समान सख्त पिंड ( बॉल ball समझा जा सकता है ) गांधारी उस को फेंकना चाहती थी। ( 2) आदीपर्व 114 वा अध्याय 
3.      तब फिर भगवान व्यास जी आ गए। उसमे कहा कि मेरा वरदान गलत नहीं हो सकता। 100 मटके या कुंड मंगवाए, जिसमें घी भरा हुआ था। गर्भ से निकले पिंड को पानी से सिंचित किया गया। ऐसा करने से 100 या 101 अंगूठे के एक पोरुए जितने टुकड़े हो गए।  एक एक टुकड़े को एक एक घी से भरे घड़े में रखा गया। जिसमे सबसे पहला टुकड़ा डाला वह सबसे बड़ा दुर्योधन बना। इस तरह छोटे और बड़े का निश्चय हुआ। ( 1 से 3 ) आदीपर्व 114 वा अध्याय

4.    वह घड़े गुप्त जगह पर रखे गए और फिर दो साल पड़े रहे। तब जा कर बच्चे निकले। (3) आदीपर्व 114 वा अध्याय

अगर वाकई में कोई विज्ञान था तो उसके होने का फायदा क्या ? अब कुछ कर के दिखाओ। यह थोड़े होगा कि आज काम विदेशी वैज्ञानिक करेंगे और हम अपनी पीठ थपथपाएंगें कि देखा हमारी महाभारत में तो पहले से लिखा हुआ था। अभी तो विज्ञान बहुत पीछे है जी। 

अगर इस तरह से विज्ञान से कोई भरपूर बन जाता तो मैं भी कोई कल्पनिक कहानी लिख देता हूं। साबित मुझे थोड़े करना है। करने वाले विज्ञानी करेंगे।  जब थोड़ा कुछ कर देंगे तो ताली पीटूंगा कि विज्ञान तो अभी मुझ से बहुत पीछे है, मैने तो पहले ही लिख दिया था।

अपनी विज्ञानिकता आधुनिक विज्ञान से मिला कर क्यों करते हो ? 2 साल पेट ने गर्भ क्यों रहा इसका जवाब दो। 2 साल घी से भरे मटके में क्यों पढ़े रहे, 9 महीने या 4 साल क्यों नहीं? क्या सिर्फ घी से भ्रूण का पोषण हो सकता है ? 9 महीने भ्रूण को विकसित होने के लिए लगते हैं, विज्ञान को तब मानेंगे जब यह समय कम हो जाए, 30 दिन, 60 दिन, 90 दिन इत्यादि। ऐसा कोई कारनामा कर के दिखाओ जिससे भ्रूण पूरा समय गर्भ से बाहर ही विकसित हो। अंध भक्ति और मूर्खता में कोई फर्क नहीं है। कुछ लोग जानबूझ कर लोगों को मूर्ख बने रहना देना चाहते है। ताकि उनकी मुफ्त की कमाई चलती रहे और वे श्रेष्ठ बने रहें। लानत भेजो ऐसी श्रेष्ठता पर। इतना बड़ा विज्ञान था तो धृतराष्ट्र को क्या जानबूझ कर अंधा रखा गया था ? आज का विज्ञान तो आंख प्रत्यारोपण भी कर सकता है। अब कुछ अंड भगत इस पर बहस करेंगे कि आधुनिक विज्ञान भी जन्मजात अंधे की आंख ठीक नहीं कर सकता। ठीक है । आधुनिक विज्ञान की बात क्यों करते हो। अपने वैदिक विज्ञान की बात करो। हाथी का सिर लगाया जा सकता है, सिर्फ आंखे क्यों नहीं लगाई जा सकती थी? महाभारत युद्ध के समय व्यास ने अपने अंधे पुत्र धृतराष्ट्र को दिव्य दृष्टि देने के पूछा। भीष्म पर्व 2 सरा अध्याय (4)  यह दिव्य दृष्टि बालक धृतराष्ट्र को क्यों नहीं दी। यह कोन सा विज्ञान है कि अगर स्त्री से कोई अनजान कुरूप आदमी संभोग करे और स्त्री डर के मारे आंखे बन्द कर ले तो बच्चा अंधा पैदा होगा या डर के मारे पीली पढ़ जाए तो बच्चा पीला ( पांडु) पैदा होगा। आदीपर्व 104 वा अध्याय (5 और 6) आज कल तो  बलात्कार से जो बच्चे पैदा होते है वह तो नॉर्मल ही होते है। यहां तो किसी विज्ञान की जरूरत ही नहीं। गांधारी के देवर पांडु को श्राप था कि वह मैथुन करेगा तो कर नहीं पाएगा मृत्यु हो जाएगी। बच्चे पैदा करने के लिए मैथुन की जरूरत ही क्या थी। टेस्ट ट्यूब बेबी का विज्ञान उस पर काम क्यों नहीं कर सकता था ? क्यों यम - धर्म के देवता को और वरुण को और इन्द्र को बुलाया। क्यों अश्वनी कुमारों को बुलाया ?  क्यों कुंती का  समागम दूसरों से करवाया ( समागम शब्द मेरा नहीं महाभारत का है।) आदीपर्व 121, 122 अध्याय ( 7 से 9)

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत के संबंधित पन्ने पोस्ट कर दिए है। ऊपर ( ) में दिय गए नंबर ही पन्नो पर लगा दिए हैं।

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16 अगस्त 2021 (2)
कश्यप ब्रह्मा के पौत्र और मरीचि के पुत्र थे.  कश्यप की दो पत्नियां कद्रू और विनता कश्यप के चाचा दक्ष की पुत्रीयां थी।( 223). कश्यप ने दोनों को खुश हो कर वरदान मांगने को कहा। कद्रू ने 1000 नाग पुत्र और विनता ने सिर्फ 2 पुत्र ही मांगे।

काफी समय के बाद ( दीर्घ काल ही लिखा है लेकिन इसका मान कितना है, नहीं बताया।) कद्रू ने 1000 अंडे दिए और विनता ने 2 अंडे दिए। 

अंडे क्यों दिए ? क्योंकि सांप और पक्षी तो अंडों से ही निकलते है।

फिर वह अंडे 500 वर्ष तक गरम बर्तनों में पढ़े रहे। तब 1000 अंडों से सांप पैदा हुए। लेकिन विनता के 2 अंडों से बच्चे नहीं निकले।

विनता ने एक अंडा तोड़ दिया। उसमे से जो निकला वह पूर्ण विकसित नहीं हो पाया था इसलिए उसने माता को शाप दे दिया कि अपनी ही बहन से द्वेष करती है, तुझे उसी की गुलामी करनी पड़ेगी। और इस गुलामी से छुटकारा मेरा भाई जो दूसरे अंडे से पैदा होगा वह दिलवाएगा और वह भी तब अगर वह पूर्ण विकसित हो कर अंडे से निकलेगा। अगर मेरी तरह अविकसित अंडे को तोड़ दिया तब वह भी कुछ नहीं कर पाएगा।

सूर्य निकलने से पहले जो लाल आसमान दिखाई देता है उसको अरुणाई ( लालिमा) कहते है। यानी यह सूर्य की रोशनी अविकसित होती है। जो अंडे से अविकसित निकला था वह यही अरुण था, वह सूर्य के रथ का सारथी बन गया जो रथ के सबसे अगले हिस्से में बैठता है। 

पहले तो दीर्घ काल के बाद अंडे निकले, फिर 500 साल पड़े रहे। विनता के दूसरे अंडे को 500 वर्ष इसके बाद भी रहना था। तब वह विकसित हो कर गरुड़ को पैदा किए। (108, 109)

यही गरुड़ विष्णु का वाहन है। 

कद्रू ने विनता को शर्त हारने पर दासी बना लिया था। 500 वर्ष वह दासी बनी रही। जब गरुड़ ने कद्रू और उनके नाग पुत्रो को अपनी माता के दासिपन से छुटकारे के लिए कीमत पूछी तो नागों ने अमृत मांगा। गरुड़ ने इंदरलोक से अमृत तो ला कर दिया लेकिन इन्द्र से पहले ही सांठ गांठ कर लिया कि नागों के अमृत पीने से पहले ही वह अमृत का बरतन चोरी कर लेगा। गरुड़ ने अपनी माता को छुड़ा भी लिया और अमृत पीने का मोका भी नहीं दिया।

लेकिन जब वह अमृत लेने जा रहा था तो उसकी माता ने कहा था कि रास्ते में जितने मर्जी निषाद लोगों को खा लेना लेकिन किसी ब्राह्मण को नहीं। तो वह हजारों निषादों को एक ही बार में खा गया।

फिर गरुड़ को उसके पिता कश्यप मिले। गरुड़ ने बताया कि हजारों निषाद खाने पर भी मेरी भूख ख़तम नहीं हुई मुझे खाने के बारे ने बताइए।

कश्यप ने अपने बेटे गरुड़ को एक हाथी जो सरोवर के पास रहता है और सरोवर में एक कछुए के बारे में बताया कि उसको अपना भोजन बना ले।

अब हाथी और कछुए का परिमाण।

हाथी के बारे में लिखा है 6 योजन ऊंचा, 12 योजन लंबा।अंड भक्तों के गणित के हिसाब से इसको किलोमीटर बनाते हैं। एक योजन 8 मील या 12.8 किलोमीटर।

76.8 किलोमीटर ऊंचा।  हिमालय ( 8.848 किलोमीटर ) से साढ़े आठ गुणा ऊंचा। और हाथी की लंबाई इससे दो गुनी यानी 153.6 किलोमीटर। दिल्ली से मथुरा जितनी दूरी वाला लंबा एक हाथी और उसकी ऊंचाई हिमालय से साढ़े आठ गुना।

अब कछुआ।  ऊंचाई तीन योजन यानी हिमालय से 4 गुना से भी ज्यादा ऊंचा। और उसकी परिधि 10 योजन यानी 80 मील यानी 128 किलोमीटर। व्यास बन जाएगा 40 किलोमीटर से ज्यादा। 

गरुड़ जी महाराज जब इनको लेे कर उड़ रहे थे तब एक वट वृक्ष बोला कि मेरी एक शाखा जो 100 योजन तक फैली हुई है उस पर बैठ कर हाथी और कछुए को खा लो। लेकिन शाखा गरुड़ के बैठते ही टूट हुई। शाखा पर ऋषि लटक रहे थे। गरुड़ ने सोचा कि ऋषि तो मर जाएंगे इसलिए 100 योजन विस्तार वाली वट वृक्ष की शाखा को अपनी चोंच से उठा लिया। अब एक पंजे में हाथी, दूसरे पंजे में कछुआ और चोंच में वृक्ष की शाखा। 100 योजन मतलब दिल्ली से दमन तक की दूरी जितनी लंबी शाखा।

फिर लिखा है कि वृक्ष की शाखा इतनी बड़ी थी कि  100 पशुओं के चमड़े से बनी रस्सी भी उसको बांध नहीं सकती थी।

यानी पशुओं के चमड़े का उपयोग होता था। जरूरी है कि पशु मारे जाते थे।

फिर वह गरुड़ तीनों, कछुआ, हाथी और वृक्ष की शाखा को लेकर एक लाख योजन तक उड़ा। यानी 8 लाख मील यानी 12 लाख 80 हजार किलोमीटर। पृथ्वी की परिधि 40075 किलोमीटर यानी पूरी पृथ्वी के 32 चक्कर जितनी दूरी तक उड़ा और पहुंचा कहां? एक पर्वत पर। शाखा को वहीं छोड़ा और हाथी कछुए को खा लिया।

बाल्मीकि रामायण में भी इसी गरुड़ वाले वट वृक्ष का जिक्र है। उसमे इस वृक्ष की शाखाओं का विस्तार 100 योजन चारो तरफ। ऐसे पेड़ कश्मीर से कन्याकुमारी तक अगर 2 ही लगा दिए जाए तो 1280 किलोमीटर तो समुन्द्र के पार भी हो जाएगा। फिर लिखा है कि हाथी कछुए की हड्डियों और वृक्ष की शाखा को गिरा कर निषाद देश ख़तम कर दिया। 

राम की एक निषाद राजा की दोस्ती दिखा कर कहा जाता है कि शूद्रों के साथ कोई भेद भाव नहीं था। लेकिन यहां गरुड़ जी महाराज विष्णु का वाहन हजारों निषाद को खा लेता है और गलती से चले गए एक ब्राह्मण को बाहर निकाल देता है। ब्राह्मण कहता कि मेरी पत्नी निषाद जाती की है उसको भी निकालना है, और निकाल दिया जाता है। किसी ब्राह्मण स्त्री को निषाद के साथ क्यों नहीं दिखाया ? ब्राह्मण निषाद स्त्री से शादी करके भी ब्राह्मण और ब्राह्मण स्त्री अगर शूद्र से शादी कर ले तो क्या स्त्री ब्राह्मण ही मानी जाएगी ? सवाल ही पैदा नहीं होता। स्त्री  का तो शूद्रों की तरह जनेऊ संस्कार भी संभव नहीं।

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत और बाल्मीकि रामायण के पन्ने डाल दिए गए है ।


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17 अगस्त 2021 (2)
आज ही की पहली पोस्ट में मैने भरत जिसके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा बताया जाता है के जनम वृतात के बारे में लिखा है।

भरत ने खुद अपनी तीन पत्नियों से 9 पुत्र पैदा किए लेकिन सभी को त्याग दिया ऐसा कह कर कि ये मेरे पुत्र नहीं हैं।

कुपित हो कर पुत्रों की माताओं ने इन सभी 9 बच्चों का मार डाला।

फिर भरत ने यज्ञ से भारद्वाज ऋषि की कृपा से एक और पुत्र को प्राप्त किया जिससे भरत वंश आगे बड़ा। (यज्ञ की अग्नि से ही पुत्र पुत्री प्रगट हो जाते है। द्रोपदी और  उसका भाई उसी तरह जवान ही यज्ञ अग्नि से प्रगट हुए थे। दसरथ द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ अग्नि से एक दिव्य पुरुष खीर का पात्र लेे कर प्रगट हुआ था।)

क्या इनको हम अपना आदर्श मानेंगे?

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19 अगस्त 2021

एक है महाभारत और एक अलग किताब है महाभारत खिल भाग हरिवंश पुराण। महाभारत के शुरू में ही बताया गया है यह हरिवंश पुराण भी महाभारत का हिस्सा है । दोनों ही किताबें गीता प्रेस गोरखपुर ने प्रकाशित की हैं। हरिवंश पुराण सिर्फ कृष्ण से सम्बन्धित है । कृष्ण के पिता वासुदेव के 14 पत्नियां थीं  ऐसा इसके 35 वे अध्याय में बताया गया है। 12 के नाम के बाद 2 नाम के साथ लिखा है कि ये परिचर्या करने वाली पत्नियां थी। यानी पटरानी, रानी और परिचर्या पत्नी, ऐसी किस्में भी होती है। (1) गीता प्रेस द्वारा ही प्रकाशित मत्स्य पुराण के 46 वे अध्याय में वासुदेव की 24 पत्नियां लिखी है। (2) अब यह दोनों तो सही हो नहीं सकती।  तो ठीक कोन सी है ?

कृष्ण की पत्नियां :-

महाभारत के आदिपर्व के 67वे अध्याय में बताया है 16000 अप्सराए मनुष्य लोक में देवियों के रूप में उत्पन्न हुई और ये कृष्ण की पत्नियां बनी। (3) महाभारत के ही अनुशासन पर्व के 15 अध्याय में शिव और पार्वती दोनों ने कृष्ण को 8 - 8 वर मांगने को कहा। शिव से मांगे बाकियों के अलावा 10000 पुत्र और पार्वती से मांगे सेंकड़ों पुत्र। पार्वती/उमा/जगदम्बा ने तब 16000 पत्नियां होने का वरदान दिया। (4) श्री लिंग पुराण में कृष्ण की  16108 पत्नियां बताई गई है। (5) ब्रह्मवैवर्त पुराण के 103 अध्याय में भी 16108 ही बताई है (6) लेकिन  इसी के  अध्याय 6 में 16110 पत्नियां बताई गई है।(7)

कृष्ण के पुत्रो की गिनती :-
 1 लाख 80 हजार ( 1,80,000) 103 वा अध्याय  महाभारत खिल भाग हरिवंश पुराण (8)
1 करोड़ 80 हजार ( 1,00,80,000) 276 वा अध्याय अग्नि पुराण (9)
1करोड़ 1 लाख 80 हजार ( 1, 01,80,000) अध्याय 47 मत्स्य पुराण (10)

अगर एक करोड़ 80 लाख बच्चे मान ले और पत्नियां 16108 तो एक स्त्री से 626 बच्चे हुए। और अगर एक करोड़ एक लाख 80 हजार बच्चे माने तो एक औरत को 632 बच्चे।

626 बच्चे , 632 बच्चे एक औरत को। ज्यादा लग रहें होंगे ना। 

अरे यह तो कुछ भी नहीं। कश्यप ने सिर्फ 2 पत्नियों से 61400 बच्चे पैदा किए यानी एक औरत ने 30700 बच्चे। - महाभारत खिल भाग हरिवंश पुराण तीसरा अध्याय। (11)

गांधारी ने 100 बच्चे पैदा किए,  लोग इसी पर अटके हुए हैं। आंखे खोलो। आगे बढ़ो। 30700 बच्चे पैदा कर सकती है भारतीय नारी। 

नोट :- ( ) में जो नंबर लिखे है वहीं नंबर पन्नों पर लगा दिए गए है।


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आपने सुना होगा या ऐसी पोस्ट देखी होगी जिसमें गुरु द्रोणाचार्य को कलश में पैदा हुआ बताया जाता हैै। 

यह सही है।

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत में ऐसा ही बताया गया है।

गुरु द्रोण जब परशुराम से मिलने गए तब अपना परिचय इस प्रकार दिया, "मैं ऋषि भारद्वाज द्वारा उत्पन्न उनका अयोनिज पुत्र हूं।" (1)

जो अपनी माता की योनि से पैदा हुआ, वह योनिज और जो किसी माता की योनि से नहीं निकला वह "अयोनिज" ।

भारद्वाज मुनि का वीर्य तो था द्रोणाचार्य के जन्म का कारण लेकिन महाभारत में ऐसी कहानी भी है जिसमें एक लड़का और एक लड़की पैदा हुई लेकिन पैदा करने वाले थे एक पर्वत और एक नदी। पर्वत ने नदी से बलात्कार किया था। (2)

द्रोणाचार्य ने कोरवों और पांडवो को शस्त्र शिक्षा दी थी। द्रोणाचार्य से पहले कोरवों और पांडवो को शस्त्र शिक्षा कृपाचार्य देते थे। कृपाचार्य का जन्म भी किसी स्त्री की योनि से नहीं हुआ था। यानी वह भी अयोनिज थे।

भारद्वाज मुनि गंगा में स्नान के लिए गए थे, जहां घृतांची अप्सरा पहले से स्नान कर के कपड़े पहन रही थी लेकिन गलती से कपड़ा गिर गया। यह देख कर भारद्वाज मुनि का वीर्य स्खलित हो गया और भारद्वाज जी ने अपना वीर्य द्रोण ( कलश) में डाल लिया जिससे द्रोण यानी द्रोणाचार्य का जन्म हुआ। कृपाचार्य के पिता शरदान गौतम ( शरदान गौतम गौतम ऋषि के पुत्र थे ) ऋषि का वीर्य भी एक देवकन्या जानपदी को देख कर सरकंडों में गिर गया कर दो भागों में विभक्त हो गया था जिससे एक लड़का कृप और एक लड़की कृपी पैदा हुई थी। (3 और 4)

महाभारत को लिखने वाले व्यास जी थे। महाभारत के पहले पर्व आदि पर्व के पहले अध्याय  "अनुक्रमणिका पर्व" के 62 -63 वे शलोक में लिखा है कि व्यास जी ने ब्रह्मा को बताया कि "मैने इस महाकाव्य में  सम्पूर्ण वेदों का गुप्ततम रहस्य तथा अन्य सब  शास्त्रों का सार - सार संकलित कर के स्थापित कर दिया है। केवल वेदों का ही नहीं, उनके अंग व उपनिषदों का भी इसमें विस्तार से निरूपण किया है।" (5)

यानी महाभारत पढ़ने के बाद वेदों वी उपनिषदों को पढ़ने की जरूरत नहीं रह जाएगी।

द्रोणाचार्य का विवाह भी ऊपर वर्णित अयोनिज कन्या कृपी ( कृप अथवा कृपाचार्य की बहन और शरदान गौतम की बेटी ) से हुआ था जिससे अश्वत्थामा बेटा उत्पन्न हुआ था।

अब मेरे दिमाग में सवाल आता है कि विष्णु के अवतार राम व कृष्ण का जन्म तो माता की योनि से ही हुआ, वह अयोनिज क्यों नहीं अवतार लिए ? एक और कहानी के अनुसार 8 वसुओं को श्राप हुआ कि वह धरती पर जन्म लेंगे। तब इन वसुओं ने गंगा से प्राथना की वह किसी मनुष्य स्त्री की योनि से पैदा नहीं होना चाहते  ( महाभारत में गर्भस्थ शिशु को  दुख झेलते  बताया गया है ) ( 6)
 इसलिए वह हमे पैदा भी करे और पैदा होने पर मार भी दे, जिससे उनको श्राप से जल्दी मुक्ति मिल जाए। गंगा मान भी गई और आठों वसुओं को पैदा भी किया और सातों को पैदा होते ही गंगा नदी में बहा दिया। आठवां था भीष्म उर्फ भीष्म पितामह उर्फ देवव्रत उर्फ गंगादत्त।  दूसरा सवाल यह की पांडु को यह तकनीक हासिल क्यों नहीं हुई कि वह अपने वीर्य से बिना स्त्री के अपने बच्चे पैदा कर लेता और अगर ऐसा होता तो ना ही उसको राज पाठ छोड़ कर वन में जाना पड़ता और ना ही कुंती से तीन पांडु को पैदा करने के लिए धर्म, वायु और इन्द्र को नियोजित करना पड़ता। कहा तो चोथे बालक को पैदा करने के लिए भी लेकिन कुंती नहीं मानी। माद्री के लिए भी पांडु को कुंती से प्राथना करनी पड़ी।  माद्री के लिए भी पांडु ने फिर से प्राथना की थी परन्तु कुंती माद्री से पहले से ही नाराज थी कि उसने एक साथ दोनों अश्विनी कुमारों को बुला कर दो बालक पैदा करके मुझे ठग लिया।

अब इतना जरूर समझ आया कि जो कहते हैं कि वेदों में बहुत अदभुत ज्ञान है, विज्ञान है, वह बिल्कुल सही है। बिना आदमी और बिना औरत के बच्चे पैदा होना ( पर्वत और नदी के सयोंग से) और बिना औरत के आदमी के वीर्य गिरने से बच्चे पैदा होना, यह क्या अदभुत विज्ञान नहीं है ?

महाभारत के संबंधित पन्ने डाल रहा हूं। ज़ूम कर के पढ़े।


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पुरातन समय में जरूर यह प्रश्न आदमी के मन में आया होगा कि शुरुआत में आदमी और औरत (नर और मादा सभी जीव भी ) कैसे पैदा हुए ? यह तो उन्होंने जान ही लिया था कि स्त्री और पुरुष ( नर और मादा ) के मैथुन से बच्चे पैदा होते रहते हैं।

जीवों की उत्पत्ति स्त्री पुरुष के मैथुन से होती है। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्मा ने की, इसीलिए ब्रह्मा को प्रजापति या पिता भी कहा जाता है। शुरुआत में ब्रह्मा ने मनुष्यों की उत्पत्ति मन की कल्पना से की। फिर मन की कल्पना से ही स्त्री को जन्म दिया, ताकि मैथुन द्वारा मनुष्यों की उत्पत्ति हो। अब जिस स्त्री को पैदा किया वह खुद ब्रह्मा की क्या लगी ? निस्संदेह पुत्री ही लगी। अब ब्रह्मा द्वारा पैदा हुई स्त्री से मैथुन कोन करेगा ? या तो ब्रह्मा द्वारा पैदा किए हुए उसके मानस पुत्र या खुद करेगा। जिसने भी सृष्टि की उत्पत्ति का यह सिद्धांत पेश किया, निश्चय ही उसको यह प्रश्न भी हल करना था कि मैथुन की शुरुआत किस ने की। स्त्री और पुरुष तो ब्रह्मा ने बना दिया लेकिन मैथुन की शुरुआत खुद ब्रह्मा ने की या उसके मानस पुत्रो ने।  अगर पुत्र करते तो भाई बहन में मैथुन का रिश्ता बनता। अगर ब्रह्मा खुद करता तो पिता और बेटी में मैथुन का रिश्ता बनता था।

प्रश्न तो हल करना ही था।

धार्मिक किताबों में लिखा हुआ है कि ब्रह्मा ने अपनी बेटी से विवाह किया यानी मेथुनी सृष्टि का आरंभ किया।

लेकिन नव हिंदुत्ववादी लोग जो कभी इन बातों पर गहराई से विचार नहीं करते, कभी धार्मिक ग्रंथ नहीं पढ़ते, इस तरह की बात को बर्दास्त नहीं कर पाते और जो लोग किताबों से उद्धरण करते हुए असलियत बताते है तो इनको बहुत क्रोधआता है। निस्संदेह उद्धरण करने वाले भी कभी गंभीरता से विचार नहीं करते बस सिर्फ अंधभक्तों को तंग करने के इरादे से ही ऐसा करते हैं।

राहुल साकृत्यायन की लिखी एक पुस्तक है "वोल्गा से गंगा तक"।  उसका भी मानना है कि आर्य मध्य एशिया से भारत में आए और उसी को दर्शाने के लिए वोल्गा - रूस की नदी  से गंगा तक टाइटल का चुनाव किया है । सभ्यता का विकास कैसे हुआ यह बताया गया है। शुरुआत में यानी जब आदमी जंगली था, मनुष्यों में भी मातृ प्रधान समाज था, बिल्कुल वैसे ही जैसे आजकल जानवरों में है। जानवरों का परिवार मां और बच्चों से बनता है और परिवार की मुखिया मादा होती है। मनुष्यों में भी मातृ प्रधान परिवार थे। कालांतर में औरत प्रधान अपने साथ एक मर्द को भी रखने लगी। यह उसका भाई या बेटा ही हो सकता था। एक को छोड़ कर दूसरे ताकतवर को अपने साथ भी रखती थी। परिवार में ही कोई लड़की भी औरत प्रधान को मार कर खुद प्रधान बन जाती थी और अपने साथ ताकतवर मर्द को रखती थी। निस्संदेह वह मर्द उसका भाई ही होता था।

इतना मैने इसलिए लिखा कि हम स्वीकार करें कि धार्मिक किताबों में जो लिखा हुआ है कि ब्रह्मा ने अपनी ही बेटी से संबंध बनाएं उसको स्वीकार किया जाए। मुगलों ने, वामपंथियों ने, अंग्रेजों ने मिलावट कर दी , ऐसा बोलने वाले महा मूर्ख है, अपने ही पूर्वजों का अपमान करते है।  वह मान लेते है कि हमारे पूर्वजों ने या तो यह लिखा नहीं या इतने कमजोर थे कि अपने ही धार्मिक ग्रंथों की रक्षा ना कर के मिलावट करने वालों की सौंप दिया और फिर उनसे मिलावटी किताबें लेे कर फिर अपने पास रख ली। अगर यह दोनों बातें उनकी सही है तो सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई इसका सिद्धांत खुद पेश करें। बताएं कि सही क्या है।

मत्स्य पुराण में तो ब्रह्मा लिखा हुआ है जिसने अपनी ही बेटी से संबंध बनाए।  किताब के पन्ने पोस्ट कर दिए है। लेकिन एक और उपनिषद् है नाम है "बृहदारण्यकउपनिषद्" उसमे प्रजापति मनु को अपनी पुत्री शतरूपा से मैथुन प्रवृति में लिप्त होने का बताया है। यह भी कि शतरूपा यह विचार करते हुए कि प्रजापति खुद से ही मुझे उत्पन्न कर के, ना करने वाला काम क्यों करता है, छुपने के लिए गाय बन गई, तब मनु सांड बन कर उससे गाय सांड उत्पन्न किए, वह घोड़ी बन गई, मनु ने घोड़ा बन कर घोड़े परिवार पैदा किया, वह बकरी बन गई, मनु ने बकरा बन कर जीव उत्पन्न किए, वह भेड़ बन गई तो भी मनु ने वहीं किया, गधी बनी तब भी वही यानी चींटी तक सब जीव पैदा कर दिए। इस किताब के पन्ने भी पोस्ट कर रहा हूं।


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मन चाहा बच्चे पैदा करने का ठेका तो आपके वेदिक ईश्वर ने ले रखा हैं 😛
वो भी एक नही 10,10 बच्चे 😛
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और जो औरत बच्चे पैदा नाही कर सकती उसे अभागा कहा गए हैं 😛
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कौन समझाए इन कट्टर बिंदुओ को 100Cr Plus हो गए हैं इनके संख्या।।।
और तो इनके वेदिक ईश्वर 10,10 बच्चे पैदा करने का आदेश देता हैं ।
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पर्वत उड़ना।