शिव और गणेश।
पार्वती के मैल से गणेश की उत्पत्ति हुई यह तो सब जानते है लेकिन एक कहानी और भी है। ब्रह्मा नारद को जब मैल से गणेश की उत्पत्ति के बारे में बताता है तो यह भी कहता है कि गणेश के दूसरे तरीके के जनम की कहानी शिव के पहले वाले कल्प में हुई थी (1) जिसका विवरण ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा हुआ मिलता है। एक कल्प 4 अरब 32 करोड़ का होता है जिसको 14 मन्वन्तरों में बांटा गया है। एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युग ( सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग) होते हैं। एक चतुर्युग की आयु 43 लाख 20 हजार वर्ष है। 1000 चतुर्युग का एक कल्प होता है। लेकिन एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युग और 14 मन्वन्तर का एक कल्प। यह 994 चतुर्युग ही हुए। तो भगत लोगों हर एक मन्वन्तर से दूसरे मन्वन्तर शुरू होने में भी कुछ काल और कल्प के शुरू और अंत में भी कुछ काल होता है उसकी गणना करके 1000 चतुर्युग के बराबर का समय बनेगा। 43 लाख 20 हजार ( एक चतुर्युग की आयु) x 1000 . ऐसी गणना पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद ने बताई है। (https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA). दयानंद ने भी वेदों कि उमर इसी तरह की गणना कर के बनाई है लेकिन दो चतुर्युगों के बीच के समय की गणना नहीं की है। उसके अनुसार वेद सृष्टि की शुरुआत में आए अभी 14 मन्वन्तरों में से 7 वा मन्वन्तर के कुल 71चतुर्युग का 28 वा चतुर्युग चल रहा है। उसके अनुसार अब 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 52 हजार 9 सौ 84 वर्ष पहले सृष्टि की शुरुआत हुई और तभी शुरुआत में ही वेद आ गए। ( https://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/vedic/)
लेकिन गणेश की एक कहानी तो इस सृष्टि के पहली वाली सृष्टि से भी संबंधित है और दूसरी शायद इसी सृष्टि से। कहने को तो यह भी कहा जा सकता था इस चल रहे 7 वे मन्वन्तर के 28 वे चतुर्युग की नहीं 27 वे चतुर्युग के सतयुग की है या 6 वे मन्वन्तर की है लेकिन यह ना बोल कर सीधे सीधे पिछले कल्प की कहानी बता दी।
पहली वाली कहानी के अनुसार शिव और पार्वती अपने घर में मैथुन रत में लग्न थे कि एक ब्राह्मण ने भिक्षा मांगी जिससे शिव का वीर्य पार्वती के शरीर में नहीं बिस्तर पर ही गिर गया।(2) भिक्षु कोई और नहीं स्वयं भगवान थे जिसने छिपकर शिव पार्वती के बिस्तर पर बालक का रूप ले लिया (3)और बिस्तर पर गिरा हुए वीर्य भी उसी बालक में मिल गया। ( 4) जबकि शिव पार्वती उस भिक्षु को ढूंढने लगे। तभी आकाशवाणी हुई जिसमें पार्वती को अपना बालक संभालने को कहा। यही तो था गणेश। ( स्कन्द पुराण में कहानी इस प्रकार है कि अग्नि देवता खुद भिक्षु बन कर शिव पार्वती के घर पर गया तो पार्वती ने उसके हाथ पर शिव का वीर्य रख दिया जिसको अग्नि ने पी लिया तब पार्वती कुपित हो कर बोली कि तू सर्वभक्षी हो जाएगा तभी से अग्नि हर एक वस्तु को जला देती है यानी खा जाती हैं और अग्नि के वीर्य पीने से स्कन्द की उत्पत्ति हुई जिसको कभी अग्नि पुत्र और कभी शिव पुत्र भी कहा जाता है - https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2245944082204507&id=100003668123693 )
फिर सिर कैसे कटा?
बालक को देखने के लिए सूर्य का पुत्र शनि आया। वह बालक की तरफ देखता ही नहीं था तो पार्वती ने कारण पूछा तो शनि ने बताया कि मेरी पत्नी को जब ऋतु स्नान हुआ तब उसने इस तरह से सिंगार किया कि मुनियों के मन भी डोल जाएं। उसने मुझे बुलाया लेकिन मैने उसकी तरफ नहीं देखा तब उसने मुझे श्राप दिया कि तूने मेरा ऋतुकाल नष्ट किया है अब तू जिस की तरफ भी देखेगा वह नष्ट हो जाएगा। ( यह श्राप शनि को तो नहीं हुआ, नुकसान शनि का नहीं बल्कि उसका होगा जिसको शनि देखेगा।) (5)
पार्वती ने श्राप को जांचने के लिए उसको कहा कि तुम देखो और उसके देखते ही बालक का सिर उड़ गया। (5)
फिर एक हाथी अपनी पत्नी और बालकों के साथ सो रहा था तब उसका सिर काटा जिस पर हाथी की पत्नी और बालकों ने रोष किया तब किसी और हाथी का सिर काट कर वहां हाथी पर लगा दि कोया। और पहले काटे हाथी का सिर गणेश के लगा दिया। (6)
हाथी का सिर क्यों काटा ?
इसके पीछे भी एक कहानी बनाई गई है। दुर्वासा ऋषि ने एक बार एक फूल इन्द्र को दिया कि जो भी इस फूल को मस्तक पर धारण करेगा उसी की सबसे पहले पूजा होगी। इन्द्र ने वह फूल खुद अपने मस्तक पर ना रख कर हाथी के मस्तक पर रख दिया। इसी के प्रभाव से उसी हाथी का सिर गणेश के लगा और सबसे पहले उसी की पूजा होती है। (7)
वह गणेश, शिव पार्वती का बेटा है जिसकी सर्वप्रथम पूजा होती ही या वह वहीं हाथी है जिसके मस्तक पर इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि वाला फूल रख दिया था ?
अगर कोई किसी को कहे कि तेरा सिर काट कर ले जाना है और इस सिर की बहुत पूजा हुआ करेगी तो क्या कोई अपना सिर कटवाने को तैयार हो जाएगा ?
गणेश की उत्पत्ति पार्वती के मैल से। ( शिव पुराण में दी हुई कहानी के अनुसार )
पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक चेतन, विशाल और पराक्रमी पुरुष का निर्माण किया। (8) उसने शिव को अंदर जाने से रोका। इसके बाद की कहानी तो सभी जानते ही है लेकिन शिव पुराण के अनुसार शिव ने अपने गणों के द्वारा पता लगा लिया था कि यह पार्वती का बेटा है फिर भी अपने गणों और देवताओं को बुला कर गणेश से युद्ध करवाया ताकि उनका गर्व तोड़ा जा सके।(9) कोई भी गणेश को हरा नहीं सका तब शिव ने खुद आ कर गणेश का सिर काट दिया।(10) यह पता होने के बावजूद कि यह पार्वती का बेटा है फिर महादेव ने गणेश का सिर क्यों काटा ? क्या वह पार्वती के पुत्र को अपना पुत्र नहीं समझता था ? शिव के गणों ने ही शिव को बताया कि वह पार्वती का बेटा है और शिव उन्हीं गणों को पार्वती के बेटे से युद्ध करने को बोलता है। गण भी क्या सोचते होंगे कि अपनी ही पत्नी के बेटे से लड़ने के लिए बोल रहा है।
पार्वती कुपित हुई तो देवता लगे मनाने। वह मानने को तैयार तो हुई लेकिन इस शर्त पर कि गणेश को जीवित करो और फिर इसी गणेश की सर्वप्रथम पूजा होनी चाहिए।(11)
फिर ऋषि उत्तर दिशा में गए जो भी पहला जीव मिला उसी का सिर काट कर उस गणेश के साथ जोड़ दिया। वह जीव था एक दांत वाला हाथी। यानी हाथी का क्यों काटा, एक दांत क्यों हुआ कोई सफाई, कोई नई कहानी नहीं। जो जीव पहले मिला उसी का सिर काटा। अब हाथी ही मिला, एक दांत वाला ही मिला तो कोई क्या कर सकता है ? (12)
ब्रह्मवैवर्त पुराण की मेरे पास दो पुस्तके हैं। शिव का वीर्य जो बिस्तर पर गिरा उसके बालक के साथ सयुक्त होने की बात सिर्फ एक ही में है। उसका मुख पृष्ठ (13) और एक और पन्ना डाल रहा हूं जिसमें प्रकाशक ने खुद लिखा है कि परशुराम द्वारा गणेश का एक दांत के तोड़ने की कहानी मनोरंजन के लिए ही है फिर भी पाठक इसको शिक्षा के तौर पर के सकते हैं कि झगड़ा नहीं करना चाहिए। (14)
मुझे तो सभी कहानियां मनोरंजन के लिए ही बनाई हुई लगती हैं।
कुछ लोग अपना जोर यह सिद्ध करने में लगा देते है कि बिना वीर्य के खीर खाने से ही आयुर्वेद उपचार से बच्चा पैदा हो सकता है। शिव के एक तीसरे बेटे के बारे में भी कहानी है जो शिव के पसीने से पैदा हुआ। स्कन्द और गणेश तो फिर भी शिव के वीर्य से पैदा हुए लेकिन तीनों ( अगर गणेश दो हैं तो चारों) में से किसी ने भी किसी औरत के गर्भ से जन्म नहीं लिया।
कोष्ठक में जो अंक लिखे है, वहीं अंक संबंधित पन्नो पर लगे हैं।
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1. मेरी पिछली पोस्ट "शिव और गणेश" जो 02 अगस्त को डाली थी, में किसी ने कमेंट किया कि मैं भी पहले सनातन धर्म को नहीं मानता था परन्तु अब समझ आ रहा है कि जो लिखा रहा वह काल्पनिक नहीं वैज्ञानिक था और वह आज सच हो रहा है। उसने आगे बताया कि तुलसीदास ने 600 साल पहले ही पृथ्वी और सूर्य की सही सही गणना कर दी थी।
2. कैसे गणना की थी, आओ देखतें है:-
नोट :- निम्नलिखित मैने vigyanam नाम की वेबसाइट से कॉपी किया है।
"हनुमान चालीसा में एक दोहा है:
जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु. लील्यो ताहि मधुर फल जानू..
इस दोहे का सरल अर्थ यह है कि हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था।
हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था।
एक युग = 12000 वर्ष
एक सहस्त्र = 1000
एक योजन = 8 मील
युग x सहस्त्र x योजन = पर भानु
12000 x 1000 x 8 मील = 96000000 मील
एक मील = 1.6 किमी
96000000 x 1.6 = 153600000 किमी"
3. दोहे में सूर्य युग सहस्त्र योजन दूर है, ऐसा करके तुलसीदास ने लिखा और व्याख्या करने वालों ने इसको आज के विज्ञान के साथ मिला कर दिखा दिया। लेकिन दोहे का दूसरा हिस्सा जिसमें लिखा है कि इतनी दूर होने पर भी हनुमान ने इसको मीठा फल जान कर खा लिया, इस पर कोई कुछ नहीं बोलेगा। अब जो बोला रहें हैं उसकी पड़ताल भी जरूरी है कि क्या वे सच भी बोल रहे हैं।
4. (क) युग को इन्होंने बताया 12000 वर्ष का। युग का मान 12000 वर्ष कहां से लिया ? एक तो होता है सतयुग वगेरह और चतुर्युग। इनमे से किसी की भी आयु 12000 वर्ष नहीं हैै। इससे बहुत ज्यादा है। फिर "युग सहस्त्र" को इन्होंने 12000 x 1000 कर दिया जो बन गया 1 करोड़ 20 लाख। 12000 से क्यों गुना किया, 12000 वर्ष बताया जा रहा है। वर्ष के 365 से गुना क्यों नहीं किया, घंटे बनाने के लिए 24 से गुना क्यों नहीं किया, इसी तरह मिनट सेकंड, नैनो सेकंड कोन बनाएगा? क्या तुलसीदास को 1 करोड़ 20 लाख नहीं लिखना आता था ? 120 लाख भी लिख सकता था। वानर सेना की गिनती बताते समय तुलसीदास ने 18 पदम संख्या बता सकता है तो 1 करोड़ 20 लाख क्यों नहीं बता सकता था ?
(ख) "अस मैं सुना श्रवन दसकंधर । पदुम अठारह जूथप बंदर ।" सुंदर काण्ड 54
(ग) सौ करोड़ ( शत कोटि) भी लिखा।
मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।
जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ।। सुंदर काण्ड 53
भावार्थ:- मेघनाद के समान सौ करोड़ (अन गिनित) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं, परन्तु जगत् के आधार श्री शेषजी (लक्ष्मणजी) उनसे कैसे उठते? तब वे लजाकर चले गए।
(घ) इसी तरह तुलसीदास ने अरब खरब सब इस्तेमाल किए है फिर 1 करोड़ 20 लाख लिखने में परेशानी क्या थी।
5. युग का मान 12000 वर्ष ही लेना है, सतयुग, त्रेता, द्वापर या कलयुग का मान नहीं लेना यह किसने बताया। कलयुग की आयु बताई है 432000 वर्ष, द्वापर की इस से दो गुनी, त्रेता की इससे तीन गुनी और सतयुग की इससे चार गुनी।
6. आज हम सूर्य की पृथ्वी की दूरी 8 प्रकाश मिनट ( लगभग) भी बताते है। जिसका मतलब होता है 8 x 60 x 3 लाख ( मतलब 8 मिनट के सेकंड बनाओ और एक सेकंड में जितने किलोमीटर प्रकाश सफर तय करता है उससे गुना करो ।
7. 12000 वर्ष बताया तो सिर्फ 12000 से गुना क्यों?
8. तुलसीदास को दूरी या लंबाई नापने की कितनी समझ थी इन्हीं ज्ञानियों के अनुसार ही समझने की कोशिश करते हैं। इन्होंने बताया कि योजन 8 मील यानी 12.8 किलोमीटर का होता है। तुलसीदास ने लिखा :-
( क). जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥1॥ किशिकंधा कांड 28/29
भावार्थ
जो सौ योजन (चार सौ कोस) समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा, वही श्री रामजी का कार्य कर सकेगा। (निराश होकर घबराओ मत) मुझे देखकर मन में धीरज धरो। देखो, श्री रामजी की कृपा से (देखते ही देखते) मेरा शरीर कैसा हो गया (बिना पाँख का बेहाल था, पाँख उगने से सुंदर हो गया) । यानी रामेश्वरम के समुन्द्र तट से लंका कि दूरी 100 योजन यानी 800 मील यानी 1280 किलोमीटर। यह तो सरासर झूठ है।
(ख). "सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।" सुंदर काण्ड 3.5
अर्थात
जब हनुमान समुन्द्र के ऊपर से लंका जा रहा था तब सुरसा ने हनुमान को निगलने के लिए अपने मुंह को बढ़ाती रही और हनुमान उससे दुगने शरीर वाले बनते रहे। आखिर में सुरसा ने जब 100 योजन मुंह खोला तो हनुमान ने सूक्ष्म रूप लेकर मुंह में प्रवेश कर गए।
100 योजन मतलब 1280 किलोमीटर का लंबा मुंह खुल गया। यानी दिल्ली से दमन जितनी दूरी तक।
(ग). मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला॥ अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं॥ लंका काण्ड 3.3
भावार्थ बहुत तरह के मगर, नाक (घड़ियाल), मच्छ और सर्प थे, जिनके सौ-सौ योजन के बहुत बड़े विशाल शरीर थे। कुछ ऐसे भी जंतु थे, जो उनको भी खा जाएँ। किसी-किसी के डर से तो वे भी डर रहे थे।
जब समुन्द्र पर पुल बांधां जा रहा था उस समय का विवरण तुलसीदास ने लिखा कि समुन्द्र में मगरमच्छ, मछली का शरीर 100 योजन का था और कुछ तो इतने बड़े थे जो इनको भी खा जाएं। 1280 किलोमीटर का लंबा चौड़ा शरीर ? और जो इनको भी खा जाएं उनका कितना बड़ा शरीर ?
यानी तुलसीदास ने 100 योजन का रट्टा लगा रखा था ।
अब उपरोक्त 4(ख) की पड़ताल से पता लगता है कि तुलसीदास का गणित बहुत ही कमजोर था। तुलसीदास हिंदी साहित्य के सम्राट थे, इसमें कोई शक नहीं। इसी साहित्य कौशल के बल पर कितनी ही गलत धारणाएं समाज में पेश की। अब बात गणित की। 18 पदम बन्दर। यानी 1800 के बाद 13 शून्य। पूरी धरती ( समुन्द्र समेत) का क्षेत्रफल 51,00,67,420 ( 51 करोड़ 67 हजार 4 सौ 20) वर्ग किलोमीटर जिसमें समुन्द्र को छोड़ कर धरती का क्षेत्रफल 14,89,40,000 ( 14 करोड़ 89 लाख 40 हजार) वर्ग किलोमीटर. अब वर्ग मीटर बनाने के लिए उपरोक्त वर्ग किलोमीटर के पीछे 6 शून्य लग जाएंगे। 14 करोड़ 89 लाख 40 हजार को 15 करोड़ भी मान ले तो बनेंगे 15 के पीछे 13 शून्य। 18 पदम यानी 1800 के पीछे 13 शून्य को 15 के पीछे 13 शून्य से भाग करेंगे तो 120 बन्दर प्रति वर्ग मीटर आएंगे. 6 फीट x 6 फीट के बेड के बनते है 3.34450944 वर्ग मीटर।
120 को अगर इस 3.34450944 से गुणा करेंगे तो 401.34 आएगा। यानी एक डबल बेड पर 401 बन्दर। और फिर पूरी धरती तो ढक गई इन बंदरों से, तो बाकी के जानवर और आदमी कहां जाएंगे। क्या डबल बेड पर 401 बन्दर आ सकते है। क्या इतने बन्दर लंका में या संयुक्त भारत में समा सकते है ?