Wednesday, 24 November 2021

कीकट।

किं ते कर्ण्वन्ति कीकटेषु गावो नाशिरं दुह्रे न तपन्तिघर्मम |
आ नो भर परमगन्दस्य वेदो नैचाशाखं मघवन्रन्धया नः ||

हे इन्द्र, अनार्य देशों के कीकट वासियों की गौओं का तुम्हे क्या लाभ है? उनका दूध सोम में मिला कर तुम पी नहीं सकते. उन गौओं को यहाँ लाओ. परमगन्द (उनके राजा), की संपत्ति हमारे पास आजाए. नीच वंश वालों का धन हमें दो. [ऋग्वेद ३/५३/१४]

पंडित जी, ये अनार्यों के धन और संपत्ति को लूटने की कैसी प्राथना वेदों में की गई है?

'कीकट' शब्द की व्याख्या करते हुए यास्क आचार्य ने अपनी पुस्तक 'निरुक्त' में लिखा है,

कीकटा नाम देशो अनार्यनिवासः [निरुक्त ६/३२]

अर्थात कीकट वह देश है जहां अनार्यों का निवास है. इस पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध आर्यसमाजी विद्वान पं. राजाराम शास्त्री ने लिखा है- "कीकट अनार्य जाती थी, जो बिहार में कभी रहती थी, जिस के नाम पर बिहार का नाम कीकट है." (निरुक्त, पृ. ३२१, १९१४ ई.). स्वामी दयानंद ने 'कीकटाः' का अर्थ करते हुए लिखा है-

"अनार्य के देश में रहने वाले मलेच्छ "

तो पंडित जी अब आप ही फेसला कीजिये कि ये दूसरों का धन लूटने की स्वार्थी प्रार्थना है या नहीं. मैंने केवल एक उदाहरण दिया अन्यथा ऐसी स्वार्थी प्रार्थनाओं के अतिरिक्त वेदों में कुछ और है भी नहीं.

No comments:

Post a Comment

पर्वत उड़ना।