Wednesday, 24 November 2021

मांस, स्त्री।

* बहरहाल कई बार वेदों में आतंक की शिक्षा और नियोग ,वेद और अश्लीलता के उद्धरण दे चुका हूं पर आज उससे भी आगे की बाते  बताने जा रहा हु जिसको सुनकर आंखे खुली की खुली रह जायेगl

 ( ऋग्वेदादिभाष्यभूमिक ग्रन्थ विषय 25 )

* किसी किसी मंत्रो में तो ऐसा भी है , मद्यपान
( शराब  , भांग , आदि नसीली चीजे ) , मांस ,
मछली खाना , सब के सब इकट्ठे बैठ के अय्यशी करना , स्वयं की कन्या से और बहन से मैथुन 
संभोग ( हमबिस्तरी , हाथों से काम ले लेना )
करना । सच मे ऐसा होता था !

* शराब का मजा लेते लेते एक घर से दूसरे घर , दूसरे घर से तीसरे घर  जाना  और फिर सब जमा होकर पी - पीकर मदहोश हो जाना और पीते रहना ।  

* और कई लोग रातों में किसी एक जगह पर जमा होकर उसे ब्राह्मण से लेकर हर कोई होता था , सब स्त्रियां व पुरुषों का मेला लग जाता फिर वे सब एक स्त्री को  नंगा करके उसी यौनि पूजा करते और इतना ही नही कभी कभी तो  पुरुषो को भी नंगा करके उसकी लिंग की पूजा करते थे 
( आज भी करते है ) 

* और फिर शराब से भरे प्याले उनको पिलाये जाते थे और फिर सब लोग मांस , शराब आदि का सेवन करते थे और इतना खाते पीते की जब तक  खा - खाकर ठेर न हो जाये फिर सब एक स्त्री के साथ सामुहिक संभोग करते थे और उसमे ब्राह्मण से लेकर सब कोई शामिल रहते थे फिर जब सब काम हो जाता तो कहते अब हम अलग अलग जाती के हो गए । यानी ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शुद्र ।

* किसी किसी मे तो ऐसा भी लिखा है कि अपनी माता को छोड़ कर सब स्त्रियों के साथ संभोग कर लेवे ( अपनी सगी बहनों , बेटियों इत्यादि )
इसमे कुछ गलत नही और किसी किसी का ये भी कहना है कि खुद की माता को भी न छोड़ें और किसी मंत्रो में ये लिखा है , की स्त्री की यौनि में लिंग फसा कर मंत्रो का जाम करने से संतान की उत्पत्ति जल्दी होती है ।

*  यज्ञशाला में यज्ञ करने वाले और यज्ञ करा ने वाले लोग कुमारी और स्त्रियों के साथ दिल्लगी कर कर के बात चीत करते है  इस प्रकार से की अपनी हाथों की उंगलियों से यौनि को दिखला कर हंसते है , जब स्त्री लोग जल्दी चलती है , जब इनकी यौनि देख कर पुरुष का गुप्त भाग हिलता है और स्त्री की यौनि और पुरुष का लिंग
से वीर्य्य निकलता है , कुमारी यज्ञ करने वाली    दिल्लगी ( हंसी से ) करती है , की जो यह तेरे लिंग के ऊपर का भाग मुह से सामान देखता है ।

Ved purana

* अब ब्रह्मा हंस के कहता है ये यजमान की स्त्री
( यज्ञ करने वाले की स्त्री  ) जब तेरे माता पिता पलंग के ऊपर चढ़ के तेरे पिता ने मुठ्ठी ( मोटे हाथ के जैसा ) लिंग तेरी माता के भग  डाला तब तेरी उतपत्ति हुई है , उसने यानी स्त्री ने भी ब्रह्मा
(वैदिक ईश्वर ) से कहा कि तेरी भी उतपत्ति ऐसी हुई है ,इस लिए दोनों  एक समान  हूए ।

* पुरुष लोग स्त्रियों की यौनि को हाथ से खेंचकर के बढ़ा लेवे जिससे स्त्रियों का पानी निकल जाता है , जब छोटा बड़ा लिंग उसकी यौनि में डाला जाता है तब यौनि के ऊपर दोनों अंडकोश नाचा करते है ।

* तू जांघो के ऊपर आ हाथ का सहारा दे और प्रसन्न  चित होकर तू पत्नी को आलीडन कर !

भावर्थ :- पति पत्नी दोनों प्रसन्न वदन होकर मुह से सामने मुह , नाक के सामने नाक  इत्यादि को  पुरूष के प्रशिप्त वीर्य को खेंचकर स्त्री की गर्भशय में  स्थिर कर । ( अथर्वेद 14 : 2 : 39 )

* ब्रह्चाये कन्या युवा पति को पाती है , बैल और घोड़ा  ब्रह्चाये ( कन्या ) के साथ घास सिंचना 
( गर्भधान करना ) चाहता है अर्थवेद 11-5-18 

* जब यज्ञशाला में यज्ञ करने वाले लोग ऐसा हंस थे है और अंडकोश नाचा करते है , जब तक घोड़े
का लिंग सम्राट की पत्नी की यौनि में काम करत है  और यज्ञ करने वाले का  भी लिंग स्त्रियों की यौनि  प्रवेश करते है और जब लिंग खड़ा होता है 
तब कमल के समान होता हैं जब उन दोनों का समगान होता है , तब पुरुष ऊपर और स्त्री नीचे होने से थक जाती है ।

* यजमान ( यज्ञ करने वाला व्यक्ति ) कहता है 
घोड़े तू मेरी स्त्री की जांघो के ऊपर आके उसकी
गुदा के ऊपर वीर्य (अपना पानी ) डाल दे उसकी
यौनि में अपना लिंग चला दे , वह  लिंग किस प्रकार का है , जिस समय यौनि में जाता हैं  उस समय उसी लिंग में स्त्रियों का जीवन होता है और  उसी से वे  भोग को  प्राप्त होती है , इससे तू उस लिंग को मेरी स्त्री की यौनि में डाल दे ।

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वेद और बलिप्रथा एंव मांस भक्षण 

*  यज्ञ के प्रयोजन करते समय 7 सामग्री की आवश्यकता होती है जिसमे में पशुबलि भी एक महत्वपूर्ण अंग है जो कि कुछ इस तरीके से है ।

 यस्मि॒न्नश्वा॑स ऋष॒भास॑ उ॒क्षणो॑ व॒शा मे॒षा अ॑वसृ॒ष्टास॒ आहु॑ताः । की॒ला॒ल॒पे सोम॑पृष्ठाय वे॒धसे॑ हृ॒दा म॒तिं ज॑नये॒ चारु॑म॒ग्नये॑ ॥
( ऋग्वेद  10 : 91 : 14 )

* अर्थात : - यज्ञ के समय जिस अग्नि में घोड़ो , बैलों ,
बिजारो , मेंढ़ों की आहूति ( बलि ) दी जाति है , उस जलपान करने वाले , सोमयुक्त पीठ वाले , व यज्ञ विधाता अग्नि के लिए में ह्रदय से साधन स्तृती बोलता हूँ । 

* अब आर्य समाजीयो को क्योंकर नाराज करे दयानन्द के भाष्य से भी कुछ प्राप्त करते है ।

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