Tuesday, 20 April 2021

ब्रह्मकुमारी।

*क्या है ब्रह्माकुमारी संस्था?*

'ओम् शान्ति', 'ब्रह्माकुमारी'... हम लोगों ने छोटे-बड़े शहरों में आते-जाते एक साइन बोर्ड लिखा हुआ देखा होगा *'प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय'* तथा मकान के ऊपर एक लाल-पीले रंग का झंडा लगा हुआ भी देखा होगा, जिसमें अंडाकार प्रकाश निकलता हुआ चित्र अंकित होता है। इस केन्द्र में व आसपास ईसाई ननों की तरह सफेद साड़ियों में नवयुवतियाँ दिखती हैं। वे सीने पर *'ओम् शान्ति'* लिखा अंडाकार चित्र युक्त बिल्ला लगाये हुए मंडराती मिलेंगी। आप *विश्वविद्यालय* नाम से यह नहीं समझना कि वहाँ कोई छात्र-छात्राओं का विश्वविद्यालय अथवा शिक्षा केन्द्र है, अपितु *यह सनातन धर्म के विरुद्ध सुसंगठित ढ़ंग से विश्वस्तर पर चलाया जाने वाला अड्डा है।*

*स्थापना*:  इस संस्था का संस्थापक *लेखराज खूबचंद कृपलानी* था। इसने अपने जन्म-स्थान *सिन्ध* (पाकिस्तान) में दुष्चरित्रता व अनैतिकता का घोर ताण्डव किया, जिससे जनता में इसके प्रति काफी आक्रोश फैला। तब यह सिन्ध छोड़कर सन *1938 में* कराची भाग गया। इसने वहाँ भी अपना कुकृत्य चालू रखा, जिससे जनता का आक्रोश आसमान पर चढ़ गया। इस दुश्चरित्रता व धूर्तता का बादशाह लेखराज *अप्रैल सन् 1950 में* कराची से 150 सुंदर नवयुवतियों को साथ लाकर *माउण्ट आबू* (राजस्थान) की पहाड़ी पर रहने लगा और यहीं अपने व्यभिचार व पापाचार को धर्म का जामा पहनाता रहा।

सिन्ध में लेखराज की चलने वाली *ओम मंडली* की जगह माउण्ट आबू में *'प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय'* नामक संस्था चालू की गयी। इस संस्था का यहाँ तथाकथित मुख्यालय बनाया गया है, जो 28 एकड़ जमीन में बसा है। आबू पर्वत से नीचे उतरने पर आबू रोड में ही इस संस्था से जुड़े लोगों के रहने, खाने व आने वालों आदि के लिये भवन, हॉल इत्यादि हैं, जो कि 70 एकड़ के क्षेत्रफल में फैला है। 

*संचालन :* लेखराज की मृत्यु के बाद सन् 1970 में ब्रह्माकुमारी संस्था का एक विशेष कार्यालय *लंदन* (इंग्लैंड) में खोला गया और पश्चिमी देशों में जोर-शोर से इसका प्रचार किया जाने लगा। सन् 1980 में ब्रह्माकुमारी संस्था को *'संयुक्त राष्ट्र संघ' का एन.जी.ओ.* बनाया गया। ब्रह्माकुमारी संस्था का स्थाई कार्यालय अमेरिका के *न्युयार्क* शहर में बनाया गया है, जहाँ से इसका संचालन किया जाता है। इसकी भारत सहित 100 देशों में 8,500 से अधिक शाखाएँ हैं। इस संस्था को 'संयुक्त राष्ट्र संघ' द्वारा फंड, कार्य योजना व पुरस्कार दिया जाता है। 

*कार्य व उद्देश्य :* *ब्रह्माकुमारी संस्था का उद्देश्य सदियों से वैदिक मार्ग पर चलने वाले हिन्दूओं को भटकाना है, हिन्दू-धर्म में भ्रम पैदा कराना है, ताकि हिन्दू अपने ही धर्म से घृणा करने लग जाय।* ब्रह्माकुमारी संस्था के माध्यम से धर्मांतरण की भूमिका तैयार की जाती है। यह संस्था सनातन धर्म के शास्त्रों के सिद्धांतों को विकृत ढंग से पेश करनेे वाली पुस्तकें, प्रदर्शनियाँ, सम्मेलन, सार्वजनिक कार्यक्रम आदि द्वारा लोगों का नैतिक, सामाजिक, धार्मिक विकृतीकरण व पतन करने का कार्य करती है। लोगों के विरोध से बचने व अपनी काली करतूतों को छुपाने के लिये दवाईयों का वितरण व नशा-मुक्ति कार्यक्रम आदि किया जाता है। लोगों को आकर्षित करने के लिए इनकी अनेक संस्थाओं में से निम्न दो संस्थाओं का प्रचार-प्रसार तेजी से किया जा रहा है। (1) राजयोग शिक्षा एवं शोध प्रतिष्ठान (2) वर्ल्ड रिन्युवल स्प्रीच्युअल

*प्रचार-प्रसार :* इनके कार्यक्रम हमेशा चलते रहते हैं, परन्तु सुबह व शाम को इनके अड्डों पर भाषण *(मुरली)* हुआ करते हैं। ब्रह्माकुमारियां अड्डे के आसपास रहने वाली स्त्रियों को प्रभावित कर अपनी शिष्या बनाती हैं, सनातन शास्त्रों के विरुद्ध भाषण सुनाने उनके घरों पर भी जाती हैं। कहने को तो इनके सम्प्रदाय में पुरुष भी भर्ती होते हैं जिन्हें *'ब्रह्माकुमार'* कहा जाता है, परन्तुु ज्यादातर ये औरतों व नवयुवतियों को ही अपनी संस्था में रखते हैं जिन्हें *'ब्रह्माकुमारी'* कहते हैं ।

*ईसाईयत का नया रुप- ब्रह्माकुमारी:*

आजादी से पूर्व ईसाईयों की एक बड़ी टीम, जिसमें मैक्समूलर (सन् 1823-1900), अर्थर एेंथोनी मैक्डोनल (सन् 1854-1930), मौनियर विलियम्स, जोन्स, वारेन हेस्टिंग्ज, वैब, विल्सन, विंटर्निट्स, मैकाले, मिल, फ्लीट बुहलर आदि शामिल थे, इन लोगों ने भारत के इतिहास से छेड़छाड़, सनातन धर्म के शास्त्रों का विकृतीकरण, हिन्दू-धर्म के प्रति अनास्था पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसी परंपरा को ब्रह्माकुमारी संस्था आगे बढ़ा रही है। 

ब्रह्माकुमारी संस्था के साहित्य विभाग की पूरी टीम द्वारा सनातन धर्म को विकृत करने वाले 100 से अधिक साहित्य, जैसे गीता का सत्य-सार, ज्ञान-माला, ज्ञान-निधि, भारत के त्यौहार आदि बनाये व छापे गये। ब्रह्माकुमारी संस्था को ईसाईयत का नया रुप दिया गया है, जो पश्चिम से बिल्कुल भिन्न है, लेकिन मूल रूप में वही है। यह संस्था भारत के खिलाफ बहुत-बड़े गुप्त मिशन पर काम कर रही है। 25 अगस्त 1856 को मैक्समूलर द्वारा बुनसन को लिखे पत्र से ईसाईयत के नये रूप की स्वयंसिद्धि हो जाती है:

''भारत में जो कुछ भी विचार जन्म लेता है शीघ्र ही वह सारे एशिया में फैल जाता है और कहीं भी दूसरी जगह ईसाईयत की महान शक्ति अधिक शान से नहीं समझी जा सकती, जितनी कि दुनिया इसे (ईसाईयत को) दुबारा उसी भूमी पर पनपती देखे, पर पश्चिम से बिल्कुल भिन्न प्रकार से, लेकिन फिर भी मूल रूप वही हो।''

सालों से देश-विदेश में लोग ईसाईयत को छोड़ रहे हैं, चर्च बिक रहे हेैं। *ब्रह्माकुमारी संस्था के नाम पर हर जगह अपनी नई जमात खड़ी करने व हिन्दुत्व को मिटाने का यह गुप्त मिशन चलाया जा रहा है, जिसके लिए देश-विदेशों से धन लगाया जा रहा है।*

*ब्रह्माकुमारी द्वारा हिन्दुत्व को मिटाने का खुला षड्यंत्र :*

(प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय राजस्थान से प्रकाशित *'भारत के त्यौहार'* भाग -1, भाग-2 में वर्णित)

*शिवरात्रि :* प्रजापिता ब्रह्मा *लेखराज* ने कल्प के अंत मे अवतरित होकर तमोगुण, दुःख अशान्ति को हरा था। उसी की याद में *शिवरात्रि* मनायी जाती है। 

*होली :* कलियुग के अन्त में व सतयुग के शुरुआत में परमपिता ब्रह्मा *लेखराज* द्वारा सुख शान्ति के दिन शुरु किये गये थे। उसी की याद में *होली* मनाई जाती है। लकड़ी, गोबर के कंड़े जलाने से क्या होगा? देहातों में रोज जलते हैं। बहुत से शिष्ट लोगों के मन में इस त्यौहार के प्रति घृणा पैदा हो गई है। इनके मतानुसार शास्त्रों में झूठी, मनगढन्त कल्पनाएं हैं।

*रक्षाबंधन :* ब्रह्माकुमारी बहनें *लेखराज* के ज्ञान द्वारा ब्राह्मण पद पर आसीन होकर भाई को राखी बांधती है तथा बहन पवित्रत्रा के संकल्प की रक्षा करती है। रक्षाबंधन वास्तव में नारी के द्वारा नर की रक्षा का प्रतीक है, न कि नर द्वारा नारी की रक्षा का। इनके मतानुसार हिन्दू शास्त्रों में रक्षा बंधन विषयक उलटी, गड़बड़ कल्पनायें जड़कर रखी है। 

*दीपावली :* कलयुग के अन्त में परमपिता ब्रह्मा *लेखराज* ने पूर्व की भांति दुबारा इस धरा पर आकर सर्व आत्माओं की ज्योत जगाने के लिए अवतरित हुए हैं। लोग अपनी ज्योत जलाने की याद में दीपावली मनाते हैं। इनके मतानुसार शास्त्रकारों ने झूठी कल्पनाएं फैला रखी है। इसी कारण लोग मिट्टी का दीप जला कर खेल खेलते हैं।

*नवरात्रि :* लेखराज ने ब्रह्माकुमारियों को ज्ञान देकर दिव्य गुण रुपी शक्ति से सुसज्जित किया है। अन्तर्मुखता, सहनशीलता, आदि दिव्य शक्तियाँ ही इनकी अष्ट भुजायें हैं। इन्हीं शक्तियों के कारण ये आदि शक्ति अथवा शिव शक्ति बन गई हैं। ब्रह्माकुमारियां दुर्गा आदि शक्ति बनकर भारत के नर-नारियों को जगा रही हैं। इसी के याद में *नवरात्रि* मनाई जाती है। लोगों को ज्ञान देने की याद्गार में कलश स्थापना, जगाये जाने की स्मृति में *जागरण* करते है। लोग इन कन्याओं के महान कर्तव्य के कारण कन्या-पूजन करते हैं।

*दशहरा :* द्वापर युग (1250 वर्ष पूर्व) में आत्मा-रुपी सीता कंचन-मृग के आकर्षण में पड़कर माया रुपी रावण के चंगुल में फंसती है। उस समय से लेकर अब तक सारी सृष्टि *शोक-वाटिका* बन जाती है। ऐसे समय में *परमात्मा लेखराज* आकर ज्ञान के शस्त्र से माया रुपी रावण पर विजय दिलाते हैं तब सतयुगी राज्य की पुनर्स्थापना होती है। 5000 साल पहले भी *परमात्मा लेखराज* ने ऐसा किया था, अभी भी कर रहे हैं। मनुष्य रुपी राम ने भी इसी दिन दस विकार रुपी रावण पर विजय पायी थी तभी से दशहरा मनाते है। शास्त्रों में वर्णन काल्पनिक है। राम, रावण, बंदरो की सेना इत्यादि सब गप-शप व उपन्यास है।

*ब्रह्माकुमारी संस्था की धूर्तता व पाखण्ड:*

माउण्ट आबू में लेखराज अपने व्यभिचार व पापाचार को धर्म का जामा पहनाता रहा। अन्ततोगत्वा *18 जनवरी 1969* को हार्ट-अटैक से काल के गाल मेें समा गया। लेखराज ने सन् 1951 से सन् 1969 तक मृत्यु पर्यन्त जो कुछ मूर्खतापूर्ण बकवास सुनाया उसे *'ज्ञान मुरली'* कहा जाता है। ब्रह्माकुमारियों द्वारा प्रतिदिन इन्हीं पाँच वर्ष की बकवास को पढ़ाया व सुनाया जाता है तथा हर पाँच वर्ष बाद दोहराया जाता है। लेखराज के जीवन काल से ही मुरलियों में फेरबदल होता आ रहा है। उसे टैप रिकार्ड में टैप करके भी रखा जाता था। लेखराज की मृत्यु के बाद सारी रिकार्ड की गयी कैसटों को नेस्तनाबूद कर दिया गया। काट-छाँट की हुई 2 या 4 कैसटें दिखावे के लिये रखी हैं। अब लेखराज की मृत्यु के बाद एक और झूठ व अंधविश्वास का पुलिंदा जोड़ा गया है कि गुलजार दीदी के शरीर में लेखराज व शिव बाबा आते हैं। 

ब्रह्माकुमारियों द्वारा लेखराज को *ब्रह्मा* बताकर उसका ध्यान करने को कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु व महादेव के संयुक्त चित्रों में ब्रह्मा के स्थान पर लेखराज का चित्र रखते हैं, लेखराज की पत्नी *जसोदा* को आदि देवी सरस्वती बताकर इनका चित्र भी लेखराज के साथ रखते हैं। ईश्वर के विषय में इस मत की पुस्तकों में ऊटपटांग, अप्रमाणित, सनातन धर्म-विरोधी वर्णन मिलता है ।

*ब्रह्माकुमारी के संस्थापक लेखराज के काले कारनामे:*

हैदराबाद (सिन्ध) पाकिस्तान *15 दिसम्बर 1876* में जन्मा लेखराज अपनी अधेड़ उम्र तक कलकत्ते में *हीरे का व्यापार* करता रहा। उसने दस लाख रुपये कमाये जो उस जमाने में काफी अधिक राशि थी। हीरा का धन्धा बन्द कर एक बंगाली बाबा को दस हजार रुपये देकर सम्मोहन, कालाजादू आदि तंत्र-मंत्र सीखा। सन् 1932 से इसने खुद के समाज में मनगढ़न्त भाषण शुरु किया तथा *'ओम मंडली'* नामक संगठन बनाया। सन् 1938 तक इसने 300 सहयोगी बना लिये। इसके रिश्तेदार जमात बढ़ाने के लिये प्रचारित करने लगे कि दादा लेखराज के शरीर में *शिवजी* प्रवेश करके ज्ञान सुनाते हैं।

*मायावी लेखराज की पापलीला :*

लेखराज हैदराबाद में जहां रहता था उसे उसने *आश्रम* नाम दे दिया, जिससे वहाँ महिलाआें का आना-जाना शुरु हो गया। *लेखराज ने महिलाओं को उनके पति और परिवारों को छोड़ने के लिये उत्साहित किया।* महिलाएं अपने पति व घर-परिवार को छोड़ने लगीं तब *सिन्धी समाज* भड़क गया। ब्रह्माकुमारियों को उनके परिवार वालों ने अच्छी तरह पीटा। राजनैतिक पार्टियों व आर्य समाज जैसे संगठनों के हस्तक्षेप से लेखराज के जादू-टोना और भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हुआ। सम्मोहन की कला के माध्यम से लोगों को सम्मोहित करके एक विकृत पंथ बनाने की बात पायी गयी।

18 जनवरी सन् 1939 मेें 12 और 13 साल की दो लड़कियों की माताओं ने कराची के ऍडिशनल मजिस्ट्रेट के न्यायालय में *ओम मंडली* के खिलाफ एक याचिका दायर की। महिलाओं की शिकायत थी कि उनकी बेटियों को गलत तरीके से उनकी मरजी के बिना ओम मंडली ने कराची में अपने पास रखा है। अदालत ने लड़कियों को उनकी माताओं के साथ भेजने का आदेश दिया।

*लेखराज का पाखण्ड व उस पर कानूनी कार्यवाही :*

सिन्ध में *ओम मंडली* ने भयंकर पाखण्ड किया। लोगों की जवान बहन, बेटियों व पत्नियों को लेखराज अपनी गोद में बिठाने लगा। लेखराज का जवान-जवान लड़कियों के साथ सोना, बैठना, साथ में नहाना आदि देखकर जनता में काफी आक्रोश व ओम मंडली के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हुआ। उस समय सिन्ध में लेखराज की अनैतिक कारनामों के कारण धार्मिक जनता में बड़ी खलबली मच गई थी। इसके विरुद्ध *भाई बंध मंडली* के प्रमुख मुखी मेघाराम, साधु श्री टी. एल. वास्वानी आदि लोक-सेवकों ने धरना दिया। ओम मंडली में गयी सैकड़ों लड़कियों को छुड़ाकर उनके घरवालों तक पहुँचाया गया। सिन्ध प्रान्त की सरकार के दो हिन्दू मंत्रियों ने विरोध-प्रदर्शनात्मक इस्तीफा भी दे दिया था।

*सन् 1939 में ओम मंडली के विरुद्ध धरना:*

मई 1939 में सिन्ध सरकार ने सन् 1908 के आपराधिक
कानून संशोधन अधिनियम का इस्तेमाल कर ओम मंडली को गैर कानूनी संगठन घोषित किया। ओम मंडली को बंद करने व अपने परिसर को खाली करने का आदेश पारित किया गया।

लेखराज विरोध और कानून से बचने के लिए अपने कुछ साथियों के साथ कराची भाग गया। वहाँ *ओम निवास* नाम से उसने एक हाईटेक अड्डा (भवन) बनाया। कराची में कुछ समय बाद ओम मंडली में लेखराज व गुरु बंगाली के दो विभाग हुए। ओम राधे सहित तमाम महिलाओं के साथ लेखराज हैदराबाद से *माउण्ट आबू* भाग आया और यहाँ अपना पाखण्ड शुरु किया। लेखराज की जवान लड़की *'पुट्टू'* एक गैरबिरादरी वाले अध्यापक *'बोधराज'* को लेकर भाग गयी और उससे शादी भी कर लिया।

*लेखराज के बाद दूसरा शिव बना वीरेन्द्र देव दीक्षित:*

वीरेन्द्र देव दीक्षित ब्रह्माकुमारी संस्था माउण्ट आबू से लेखराज का ज्ञान सीखा और अहमदाबाद में रहकर इस पाखण्ड का प्रचार-प्रसार करने लगा। यहाँ बहुत समय बाद वीरेन्द्र खुद को *शंकर* सिद्ध करने लगा। इसके लिये वह खुद की *मुरली* (जिसे वह *नगाड़ा* कहता था) सुनाने लगा। इसके तमाम अधार्मिक कुकृत्यों के लिये अहमदाबाद की जनता ने इसे खूब पीटा। अहमदाबाद से भाग कर वह *पुष्पा माता* के पास दिल्ली चला गया। इनके घर एक गरीब चपरासी की 9 साल की लड़की *कमला दीक्षित* रहती थी। वीरेन्द्र कमला के साथ बलात्कार करता रहा और उसे रोज कहता कि मैं तुम्हें *जगदम्बा* बना रहा हूँ। पुष्पा माता का घर छोड़ दिल्ली में ही *प्रेमकान्ता* के घर चला गया। यहाँ प्रेमकान्ता का भी बलात्कार करता रहा और इसे भी कहा कि मैं तुम्हें जगदम्बा बना रहा हूँ। वीरेन्द्र लोगों को कहता था कि मैं *कामीकांता* (कामी देवता) हूँ और मेरे पास 8 पटरानियाँ हैं। सन् 1973 से सन् 1976 तक तथाकथित शिव बनकर इन लड़कियों को *पटरानी* बनाकर सहवास करता रहा।

सन् 1976 में वीरेन्द्र ने *एडवांस पार्टी* नामक संगठन खड़ा किया तथा *'आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविघालय'* चालू किया। सन् 1976 में उत्तर प्रदेश के *कम्पिल* गाँव (जिला फर्रुखाबाद) में एक आश्रम बनाया। वीरेन्द्र लोगों को कहने लगा कि लेखराज मेरे शरीर में आ गये हैं और मैं *कृष्ण की आत्मा* हूँ, इसलिए मुझे 16108 गोपियों की जरुरत है। आश्रम में आती जवान औरतों के साथ बलात्कार करना चालू किया। 

लेखराज की तरह वीरेन्द्र ने भी घोर अनैतिकता व पाखण्ड फैलाया, जिसके लिये फर्रुखाबाद की युवा शक्ति, मिसाइल फोर्स, रेड आर्मी आदि की महिला संगठनों ने इन कुकृत्यों के खिलाफ आन्दोलन किया। सन् 1998 में बलात्कार के केस में वीरेन्द्र व उसके साथियों को 6 महीने तक जेल में रहना पड़ा। इसी दौरान आयकर वालों ने इसके आश्रम में छापा मारकर 5 करोड़ रुपये जब्त किये। 

*ब्रह्माकुमारी के पाखण्डी मतों का खण्डन :*

*(1) ब्रह्माकुमारी मत*- मैं इस कलियुगी सृष्टि रुपी वेश्यालय से निकालकर सतयुगी, पावन सृष्टि रुप शिवालय में ले जाने के लिये आया हूँ । (सा.पा.पेज 170)

*खण्डन-* लेखराज अगर इस सृष्टि को नरक व वेश्यालय मानता है तो इस वेश्यालय में रहने वाली सभी ब्रह्माकुमारियां भी साक्षात् वेश्यायें होनी चाहिए। क्या यह सत्य है? 

*(2) ब्रह्माकुमारी मत-* रामायण तो एक नॉवेल (उपन्यास) है, जिसमें 101 प्रतिशत मनोमय गप-शप डाल दी गई है। मुरली सं. 65 में लेखराज कहता है कि राम का इतिहास केवल काल्पनिक है। (घोर कलह -युग विनाश, पेज सं.15)

*खण्डन-* भूगर्भशास्त्रियों को अयोध्या, श्रीलंका आदि की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं से तथा नासा का अन्वेषण समुद्र में श्रीरामसेतु का होना आदि रामायण को प्रमाणित करता है। पूरा हिन्दू इतिहास रामायण के प्रमाण से भरा हुआ है। इसे उपन्यास व गप-शप कहना और सनातन-धर्म पर अनर्गल बातें कहना ही वास्तव में गप्पाष्टक है, कमीनापन है।

*(3) ब्रह्माकुमारी मत-* जप, तप, तीर्थ, दान व शास्त्र अध्ययन इत्यादि से भक्ति मार्ग के कर्मकाण्ड और क्रियायों से किसी की सद्गति नहीं हो सकती। (सतयुग में स्वर्ग कैसे बने? पे. सं. 29)

*खण्डन -* यह बातें तथ्यों से परे, नासमझी से पूर्ण हैं। जप से संस्कार शुद्ध होते हैं। तप से मन के दोष मिटते हैं )। जहाँ संत रहते हैं उन तीर्थों में जाने से, उनके सत्संग से विचारों में पवित्रता व ज्ञान मिलता है। दान व परोपकार से पुण्य बढ़ता है। शुभ कर्म का शुभ फल मिलता है। शास्त्र अध्ययन से ज्ञान बढ़ता है, सन्मार्ग दर्शन मिलता है, विवेक, बुद्धि जागृत होती है। कर्मकाण्ड से मानव की प्रवृत्ति धर्म व परोपकार में लगी रहती है और इन सब बातों से जीवों का तथा स्वयं मानव का कल्याण होता है। ईन शुभ कर्मों की निंदा करना लेखराज एवं उसके सर्मथकों की मूर्खता प्रकट करता है। जो वेदों और शास्त्रों का विरोध करता है वह मनुष्य रुप में साक्षात असुर है।

*(4) ब्रह्माकुमारी मत-* श्रीकृष्ण ही श्री नारायण थे और वे द्वापरयुग में नहीं हुए, बल्कि पावन सृष्टि अर्थात् सतयुग में हुए थे। श्रीकृष्ण श्रीराम से पहले हुए थे। (साप्ताहिक पाठ्यक्रम, पृ.सं.140,143)

*खण्डन-* भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद भगवद्गीता के अध्याय 10 के 31 वें श्लोक में कहा 'पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्' अर्थात् मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने श्रीराम का उदाहरण देकर श्रीराम को अपने से पूर्व होना घोषित किया है, दृष्टान्त सदैव अपने से पूर्व हुई अथवा वर्तमान बात का ही दिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि इस मत का संस्थापक लेखराज पूरा गप्पी, शेखचिल्ली था जिसने पूरी श्रीमदभगवद्गीता भी नहीं पढ़ी थी।

*(5) ब्रह्माकुमारी मत-* गीता ज्ञान परमपिता परमात्मा (लेखराज के मुख से) शिव ने दिया था। (सा.पा.पेज सं.144)

*खण्डन -* गीता को लेखराज द्वारा उत्पन्न बताना यह किसी तर्क व प्रमाण पर सिद्ध नहीं होता। इतिहास साक्षी है कि 5151 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान दिया था।

*(6) ब्रह्माकुमारी मतः* आत्मा रूपी ऐक्टर तो वही हैं, कोई नई आत्मायें तो बनती नहीं हैं, तो हर एक आत्मा ने जो इस कल्प में अपना पार्ट बजाया है अगले कल्प में भी वह वैसे ही बजायेगी, क्योंकि सभी आत्माओं का अपना जन्म-जन्मान्तर का पार्ट स्वयं आत्मा में ही भरा हुआ है । जैसे टेप रिकार्डर में अथवा ग्रामोफोन रिकार्डर में कोई नाटक या गीत भरा होता है, वैसे ही इस छोटी-सी ज्योति-बिन्दु रुप आत्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट भरा हुआ है। यह कैसी रहस्य-युक्त बात है। छोटी-सी आत्मा में मिनट-मिनट का अनेक जन्मों का पार्ट भरा होना, यही तो कुदरत है। यह पार्ट हर 5000 वर्ष (एक कल्प) के बाद पुनरावृत्त होता है, क्योंकि हरेक युग की आयु बराबर है अर्थात् 1250 वर्ष है।  (सा.पा., पृ.सं. 86)

*खण्डन-* एक *कल्प* में एक हजार चतुर्युग होते हैं, इन एक हजार चतुर्युगों में चौदह *मन्वन्तर* होते हैं। एक मन्वन्तर में 71 *चतुर्युग* होते हैं, प्रत्येक चतुर्युगी में *चार युग* (कलियुग 4,32,000 वर्ष, द्वापर 8,64,000 वर्ष, त्रेता 12,96,000 वर्ष एवं सतयुग 17,28,000 वर्ष के) होते हैं। 
हर पाँच हजार साल में कर्मो की हूबहू पुनरावृत्ति होती है, इसको सिद्ध करने के लिए ब्रह्माकुमारी के पास कोई तर्क या कोई भी शास्त्रीय प्रमाण नहीं है, सिर्फ और सिर्फ इनके पास लेखराज की गप्पाष्टक है जिसे मूर्ख व कुन्द बुद्धि वाले लोग ही सत्य मानते हैं। मानों यदि व्यक्ति की ज्यों की त्यों पुनरावृत्ति हो तो वह कर्म-बंधन व जन्म-मरण से कैसे मुक्त होगा?

*(7) ब्रह्माकुमारी मत-* परमात्मा तो सर्व आत्माओं का पिता है, वह सर्वव्यापक नहीं है।...भला बताइये कि अगर परमात्मा सर्वव्यापक है तो शरीर में से आत्मा निकल जाने पर परमात्मा तो रहता ही है तब उस शरीर में चेतना क्यों नहीं प्रतीत होती? मोहताज व्यक्ति, गधे, कुत्ते आदि में परमात्मा को व्यापक मानना तो परमात्मा की निन्दा करने के तुल्य है। (साप्ताहिक पाठ्यक्रम, पृ. सं. 44, 55, 68)

*खण्डन-* ईश्वर सर्वव्यापक है क्योंकि जोे एक देश में रहता है वह सर्वान्तर्यामी, सर्वर्ज्ञ, सर्वनियन्ता, सब का सृष्टा, सब का धर्ता और प्रलयकर्ता नहीं हो सकता। अप्राप्त देश में कर्ता की क्रिया का (होना) असम्भव है।

प्राण-अपान की जो कला है जिसके आश्रय में शरीर होता है। मरते समय शरीर के सब स्थानों को प्राण त्याग जाते हैं और मूर्छा से जड़ता आ जाती है। महाभूत, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, प्राण, अन्तःकरण, अविद्या, काम, कर्म के संघातरुप पुर्यष्टक शरीर को त्यागकर निर्वाण हो जाता है। शरीर अखंडित पड़ा रहता है, जिसमें सामान्य रूप से चेतन परमात्मा स्थित रहता है। कुन्द बुद्धि लोगों को यह समझना चाहिए कि एक बल्ब बुझा देने से पूरा पॉवर हाऊस बंद नहीं हो जाता।

लेखराज व उसके सर्मथकों ने सनातन धर्म की सनातन सत्यता पर आक्षेप करने के पूर्व विधिवत अध्ययन, श्रवण, मनन व निदिध्यासन कर लिया होता तो ऐसी धूर्तता व पाखण्ड भरी बातेें नहीं करते ।

*वैदिक संस्कृति विश्व मानव संस्कृति:*

विश्व की प्राचीनतम *आर्य संस्कृति* के अवशेष किसी न किसी रूप में मिले हैं। वैदिक काल से विश्व के प्रत्येक कोने में वैदिक आर्यों की पहुँच हुई और समस्त प्रकार का ज्ञान-विज्ञान एवं सभ्यता उन्होंने ही विश्व को प्रदान की थी। नवीनतम खोज के अनुसार अमेरिका में रिचमण्ड से 70 किलोमीटर दूर केप्सहिल पर जो अवशेष पुरातत्व अन्वेषकों ने खोजे हैं, वह 17 हजार वर्ष पुरानी सभ्यता के हैं और उस समय विश्व में केवल आर्य संस्कृति ही विकसित थी तथा अपने चरमोत्कर्ष पर थी। जर्मनी आदि के विश्वविद्यालय में चरकॉलोजी, इंडोलोजी आदि के नाम से वेदों की गुह्यतम विद्याओं पर अन्वेषण हो रहे हैं। विश्व के कोने-कोने में सनातन संस्कृति के अवशेष, प्रमाण मिले है।

*ब्रह्माकुमारों के काले-कारनामे*-

*बलात्कार व जबरन गर्भपात*

छतरपुर, जिला भोपाल (म.प्र.) की एक 26 वर्षीय दलित महिला ने ब्रह्माकुमारीयों का अड्डा सिंगरौली और भोपाल में ब्रह्माकुमारों द्वारा बलात्कार करने तथा गर्भ ठहर जाने पर जबरन गर्भपात करा देने का आरोप लगाया। महिला ने बताया 17 साल की उम्र में तलाक होने के बाद 2001 में वह शांति पाने के लिए छतरपुर स्थित ब्रह्माकुमारी अड्डे में आयी जहां से उसे भोपाल भेज दिया गया। एस.पी. को लिखित शिकायती आवेदन में महिला ने कहा कि सिंगरौली और भोपाल के ब्रह्माकुमारीयों के अलग-अलग अड्डो में युवकों द्वारा बलात्कार किया गया। 
(देशबन्धु, 15 दिसम्बर 2013)

*सेक्स व व्यभिचार का अड्डा बना ब्रह्माकुमारी ध्यान-योग केन्द्र*

पुलिस के मुताबिक 'ब्रह्माकुमारी ध्यान योग केन्द्र' ट्राँस यमुना कॉलोनी आगरा, व्यभिचार एवं अय्याशी का अड्डा है, न कि ध्यान केंद्र। केन्द्र पर रहने वाले हरि भाई से सेविका भारती के अवैध संबंध ऐसे थे। पूरा केंद्र ही व्यभिचार का अड्डा बना हुआ था। भारती चाहती थी कि हरिभाई उससे शादी कर ले लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। इस पर भारती ने हरिभाई की पोल खोलने की धमकी दी। जब भारती को यह पता चला कि हरिभाई उसे सिर्फ मौजमस्ती का साधन समझता है तो वह काफी उत्तेजित हो उठी थी। उसने बड़ा हंगामा मचाया। इसी के बाद वकील की सलाह से उसे ठिकाने लगाने की योजना तैयार की गई। 27 दिसम्बर 2003 की रात को हरिभाई भारती के साथ जिस कमरे में हमबिस्तर होता था, उसी कमरे में भारती को बेहद क्रूर तरीके से और अत्यन्त रहस्यमय परिस्थितियों में जिंदा जलाकर मार दिया गया। उसकी लाश को उसी रात फरह (मथुरा) पुल के नीचे फेंक दिया गया।
(नवभारत टाइम्स 18 जनवरी 2004, पल-पल इडिया 14 दिसम्वर, 2013)

*सर्वोच्च न्यायालय की दृष्टि में हिन्दुत्व -* 

हिन्दुत्व भारतीय समाज की परम्परा, संस्कृति तथा विरासत की सामूहिक अभिव्यक्ति है। देवत्व, विश्वत्व तथा मनुष्यता का संयोग है हिन्दुत्व। हिन्दुत्व किसी के प्रति असहिष्णु का भाव नहीं रखता है, यह जीवन का एक मार्ग है।

*जनता की आवाज:*

वास्तव में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय ना तो कोई विश्वविद्यालय है और ना ही कोई धर्म, बल्कि सिर्फ और सिर्फ एक झूठ, फरेब से काम करने वाला अधार्मिक एवं गैरकानूनी काम करने वाले लोगों का संगठन है। - *डॉ. सुरेंद्रसिंह नेगी* (अधिकारी, सीमा सुरक्षा बल)

लेखराज की करतूतों को छुपाने के लिए धर्म का इस्तेमाल किया गया है। वह धर्म के बारे में कुछ भी नहीं जानता और ना ही किसी धर्म का उसने कभी पालन किया है । - *लोबो और कालुमल* (न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय हैदराबाद)

ब्रह्माकुमारियों को साक्षात् विषकन्या समझना चाहिए। ये हिन्दू-सभ्यता, इतिहास, शास्त्र, धर्म एवं सदाचार सभी की शत्रु हैं। इनके अड्डे दुराचार प्रचार के केन्द्र होते हैं । - *डा. श्रीराम आर्य* (लेखक व महान विचारक)

ब्रह्माकुमारियाँ शब्दाडम्बर में हिन्दू जनता को फँसाने के लिए गीता का नाम लेकर अनेक प्रकार के भ्रम मूलक विचार बड़ी चालाकी से फैलाने का यत्न करती हैं। - *श्री रामगोपाल शालवाले* (लेखक व वरिष्ट आर्य समाजी) 

*वेद व उपनिषदों पर विद्वानों के विचार:*

भारत वेदों का देश है। इनमें न केवल सम्पूर्ण जीवन के लिए धार्मिक विचार मौजूद हैं, बल्कि ऐसे तथ्य भी हैं जिनको विज्ञान ने सत्य प्रमाणित किया है। वेदों के सर्जकों को बिजली, रेडियम, इलेक्टॉनिक्स, हवाई जहाज, आदि सबकुछ का ज्ञान था। - *एल्ला व्हीलर विलकॉक्स* (अमेरिकी कवयित्री व पत्रकार)

पूरी दुनिया में उपनिषदों के ज्ञान जैसा लाभदायक और उन्नतिकारक और कोई अध्ययन नहीं है, यह मेरे जीवन का आश्वासन रहा है और यही मेरी मृत्यु पर भी आश्वासन रहेगा। यह उच्चतम विद्या की उपज है। - *आर्थर सोपेनहर* (जर्मनी के दार्शनिक व लेखक)

हम लोग भारतीयों के अत्यधिक ऋणी हैं जिन्होंने हमें गिनना सिखाया, जिसके बगैर कोई भी महत्वपूर्ण खोज संभव नहीं था । - *अलवर्ट आईंस्टाईन* (महान वैज्ञानिक) 

उपनिषदों की दार्शनिक धाराएँ न केवल भारत में, संभवतः सम्पूर्ण विश्व में अतुलनीय है। - *पॉल डायसन*

यूरोप के प्रथम दार्शनिक प्लेटो और पायथागोरस, दोनों ने दर्शनशास्त्र का ज्ञान भारतीय गुरुओं से प्राप्त किया। - *मोनीयर विलियम्स*

जब-जब मैंने वेदों के किसी भाग का पठन किया है, तब-तब मुझे अलौकिक और दिव्य प्रकाश ने आलोकित किया है। वेदों के महान उपदेशों में सांप्रदायिकता की गंध भी नहीं है । यह सर्व युगों के लिए, सर्व स्थानों के लिए और सर्व राष्टों के लिए महान ज्ञान प्राप्ति का राजमार्ग है । - *हेनरी डेविड थोरो*

उपनिषदों का संदेश किसी देशातीत और कालातीत स्थान से आता है । मौन से उसकी वाणी प्रकट हुई है । उसका उद्देश्य मनुष्य को अपने मूल स्वरुप में जगाना है । - *बेनेडिफ्टीन फादर ली. सो.*

*विषघातक ब्रह्माकुमारियों से सावधान :*

सुन्दर, पढ़ी-लिखीं, श्वेत वस्त्रधारिणी नवयुवतीयाँ इस मत की प्रचारिका होती हैं। इनको ईश्वर, जीव, पुनर्जन्म, सृष्टि-रचना, स्वर्ग, ब्रह्मलोक, मुक्ति आदि के विषय में काल्पनिक (जो शास्त्र-सम्मत नहीं है) बेतुकी सिद्धांत कण्ठस्थ करा दिए जाते हैं, जिसेे वे अपने अन्धभक्त चेले-चेलियों को सुना दिया करती हैं। इस मत की पुस्तकों में जो कुछ लिखा है उनका कोई आधार नहीं है। आध्यात्मिकता और भक्ति की आड़ में ये लोग सैक्स (व्यभिचार) की भावना से काम कर रहे हैं। इनके अड्डे जहां भी रहे हैं सर्वत्र जनता ने इनके चरित्रों पर आक्षेप किये हैं। अनेक नगरों में इनके दुराचारों के भण्डाफोड़ भी हो चुके हैं। 

*ब्रह्माकुमारियों का नयनयोग :*
 
लेखराज द्वारा *दृष्टिदान* अर्थात् *नयन योग* (एक दूसरे के आखों में आखें डालकर त्राटक करना) शुरु किया गया था। अब वही नयन योग ब्रह्माकुमारियाँ करती हैं। अपने यहां आने वाले युवकों से आंख लड़ाती हैं काजल लगाकर। ब्रह्माकुमारीयों का पाखण्ड तेजी से फैल रहा है। ये प्रत्येक समाज के लिए विषघातक हैं। इनके अड्डेे धूर्तता, पाखण्ड, व्यभिचार प्रचार के केन्द्र हैं। सभी को चाहिए कि इन अड्डों पर अपनी बहू-बेटियों को न जाने दें।

*इस संस्था का संस्थापक:*
 
लेखराज जिसने जीवन में सत्यता की बात नहीं कही, लोगों को धोखा दिया व झूठ बोलता रहा। उस पाखण्डी, धूर्त के मरने के बाद उसकी बातों पर विश्वास करके सम्प्रदाय चलाना बहुत बड़ा राष्टद्रोह है।

समुद्र मंथन।

ब्राह्मणी धर्म में अंकित समुंद्र मंथन की सच्चाई

समुद्र मंथन का पौराणिक विवरण पढ़ने से सच्चाई तक
पहुंचने की कोशिश करते हुए मैं जिस नतीजे पर पहुंचा हूं,
यहां मैं उसी को उद्धृत कर रहा हूं, जोकि मेरे अपने स्वतंत्र
विचार हैं। मैं अपने विचारों से सहमत होने के लिए किसी को
बाध्य नहीं कर सकता और न ही अपने विचारों को किसी पर
थोपने का दुस्साहस कर सकता हूं। मैं सिर्फ अपने विचारों से
पाठक के अवगत कराना चाहता हूं। मानने अथवा न मानने
के लिए पाठक स्वतंत्र हैं। समुद्र मंथन की भूमिका उस समय
से होती है, जब महाराजा बलि के पिता विरोचन ने इन्द्र
पर आक्रमण कर उसके सिंहासन पर कब्जा कर लिया था
और इन्द्र की सारी बहु मूल्य अमानत को अपनी प्रजा में
ऋषियों, मुनियों में बांट दिया था। इन्द्र की सारी धन सम्पदा
लुटाकर उन्हें कंगाल कर दिया था। यहां तक कि उनके हाथी,
घोड़े, गाय आदि सब कुछ। उसके बाद राजाबलि ने जब
आक्रमण किया तो ब्राह्मण देवताओं की सारी सेना, बची-खुची
धन सम्पदा को अपने कब्जे में कर लिया तो देवताओं की
समस्त देवियां भी स्वतः ही राजाबलि के पास आ गई थी।
ब्राह्मण देवताओं के पास अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं
था। जब इनकी औरतें इनके पास नहीं थी, तो उन्हीं देवियों
को पाने के लिए देवताओं ने स्वंय को असुरों के समक्ष समुद्र
मंथन का षड्यत्र रचा। यहां सोचकर असुरों ने समझौते के
लिए हामी भर दी। असुरों को तैयार करने के लिए नाग राज
वासुकि की मुख्य भूमिका थी और यह सभा भी नागराज वासुकि
की अध्यक्षता में हुई थी। इसलिए वासुकि को मंथन का साधन
(रस्सी) बना दिया गया। यह सभा मंदराचल पर्वत पर हुई थी।
इस सभा में असुरों का लक्ष्य मुख्यतः विष्णु को पकड़कर बंदी
बनाना था। क्योंकि विष्णु ही आर्यो का सरवार थे, तथापि
विष्णु को भी यह पता था यदि मैं उस सभा में गया तो सबसे
पहले मैं ही मारा जाऊंगा।
क्या विष्णु सच में स्त्री हो गए थे
यदि विष्णु सच में स्त्री बना होता तो वह सभा में जाने
से क्यों डरता? परंतु उसने तो स्त्रियों जैसा नकली रूप बनाया
था। इसलिए विष्णु उस सभा में खुले रूप में नहीं गया। जब
तक सभा में गर्मा-गरर्मी बनी रही, तब तक विष्णु पानी में
छिपकर सभा की कार्यवाही देखता रहा। जब समझौते के द्वारा
कई स्त्रियां देवता ब्राह्मणों के पक्ष में आ गई तो विष्णु पूर्व
निश्वित षड्यंत्र के तहत स्त्रियों के बीच में आकर बैठ गया।
किंतु बलि के दो पुत्रों ने विष्णु के पहचान लिया और उन
दोन ने विष्णु को पकड़ने की योजना बनानी शुरू की। जिसकी
भनक चन्द्रमा को हो गई, उसने विष्णु को बता दिया कि स्थिति
बर्ड ही गम्भीर हो गई। विष्णु स्त्रियों के बीच दुबकने लगे।
राहु और केतु ने ब्राह्मणों के समूह में जाकर विष्णु को पहचानने
की कोशिश की। ब्राह्मण देवताओं ने राहु और केतु की गर्दन
की काट दी फिर क्या था, तुरंत ही हिंसा भड़क उठी। घमासान
युद्ध आरंभ हो गया, परंतु इस बार भी देवता ब्राह्मणों को
मैदान छोड़कर भागना पड़ा और महाराजा बलि का प्रभुत्व
कायम रहा। परंतु राहु और केतु समुद्र मंथन के नाम पर मारे
गए जब राहु और केतु ब्राह्मणों द्वारा मार दिए गए तो यह
देखकर शंकर जी से ब्राह्मण की उदण्डता सही नहीं गई, चूंकि
वह भी जान गए थे कि विष्णु स्त्री भेष में छिपा है। इसलिए
शंकर जी ने आर्य ब्राह्मणों के नेता विष्णु का पर्दाफाश करने
के उद्देश्य से ही उसके पीछे दौड़ पड़े। शंकर जी का क्रोध
जानकर विष्णु भी स्त्री रूप में भागा। परिस्थिति के अनुसार
शंकर जी ने अपनी वाणी का संयम खो दिया और विष्णु को
यौन संबंध बनाने की गाली भी दे डाली। यह असंभव नहीं कि
शंकर जी ने कुछ अश्लील हरकतें की हों, किन्तु यह सब करने
के पीछे शंकर जी द्वारा विष्णु (मोहिनी) पर आसक्त होना
नहीं, बल्कि विष्णु को पकड़कर सबके सामने उसे जलील करने
के उद्देश्य से किया था।
पाठकों के मन में यह संदेह हो गया होगा कि आखिर
शंकर जी ऐसा क्यों करेंगे? वह इसलिए कि उस समय का
शंकर वर्तमान की तरह ब्राह्मणवाद के कब्जे में नहीं था। शंकर
जी स्वंय नागवंशी थे और वे समुद्र मंथन के समय असुरों की
और से ही गए थे। असुरों के निवेदन पर ही उन्होंने समुद्र
मंथन के प्रथम विवाद को यानी कालकूट नामक भयंकर विष
 को ग्रहण किया था। महाराजा बलि के शासन काल तक शंकर
जी, ब्रह्मा, विष्णु की कतार में नहीं थे। उनका ब्राह्मणीकरण तो
में बाद में हिन्दू धर्म के ठेकेदारो ने कर दिया। जहां शंकर ने
विष्णु को जलील करने का प्रयास किया, वहीं विष्णु के अनुयायी
ब्राह्मणों ने शंकर के बारे में यह कह कर कि वह तो विष्णु
को मोहिनी रूप में आसक्त, कामान्ध होकर उसके पीछे-पीछे
दौड़ने लगे-उल्टा शंकर को ही जलील कर दिया गया।
इस प्रश्न का उत्तर भी हमें महाभारत में देखने को मिलता
है। महाभारत प्रथम खण्ड आदि पर्व में नागों से संबंधित एक
कथा मिलती है। हमने पहले ही बताया कि असुरों का ही
दूसरा नाम नाग था। मूलनिवासियों के समस्त पूर्वज असुर
नागवंशी हैं। महाभारत के लिखित कहानी में जिन नागों का
जिक्र आया है वे ही हमारे पूर्वज हैं। अतएव अब हम यह
जानेंगे कि हमारे पूर्वजों के सामने क्या परेशानी थीं। जिसके
कारण उन्हें आर्य ब्राह्मणों के साथ समुद्र मंथन के लिए तैयार
होना पड़ा। इस घटना का प्रारंभ इस प्रकार है- एक बार राजा
परीक्षित जंगल में शिकार खेलने गए थे, उसी जंगल में शमीक
ऋषि तपस्या कर रहे थे और समाधि में लीन थे। शिकार
करते हुए राजा परीक्षित ऋषि के पास पहुंचे, ऋषि को समाधिष्ट
देखकर राजा ने एक मरा हुआ सांप अपने धनुष से उठाकर
शमीक ऋषि के गले में डाल दिया, ऋषि का ध्यान भंग हो
गया। यह देखकर शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंग ऋषि अत्यंत क्रोधित
हो गए और उन्होंने परीक्षित को श्राप दे दिया कि मेरे पिता
के गले में सांप रखकर उनका अपमान करने वाले राजा, आज
से सात दिन बाद प्रचंड तेजस्वी पन्नगोतम तक्षक नामक नाग
मेरे कहने पर तुझे श्रमलोक पहुंचा देगा। इस प्रकार श्रृंगी ऋषि
के शाप से सुरक्षा का ध्यान रखते हुए भी राजा परीक्षित की
मृत्यु टल न सकी। परिणामस्वरूप शाप देने के सातवें दिन ही
तक्षक नाग द्वारा परीक्षित मारे गए। राजा परीक्षित का पुत्र
जनमेजय था। उसने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के
लिए तक्षक के नाग वंश को ही समाप्त करने के लिए सर्पयज्ञ
का अनुष्ठान करवाया। इस सर्पयज्ञ से नागों की रक्षा जगतकारू
के पुत्र नागवंशी राजा वासुकि के भांजे आस्तीक ने की थी।
(संदर्भ-महाभारत प्रथम खण्ड, आदि पर्व, अ. 20-25 तक,
श्लोक 12-13, पृ. 125-127)

भारत नाम।

भारत देश किसके नाम

इस देश का नामकरण 'भरत' नाम के एक ट्राइब्स राजा के नाम । पर हुआ है। परन्तु अधिकांश लोगों में यह प्रम है कि दुष्यंत और शकुत्तला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम 'भारत' पड़ा है। ऋग्वेद में कई 'ट्राइब्स का उल्लेख आया है, जैसे-तृस्तस, तुर्वश, दुगु, या, पुरू और अनु। ऋग्वेद के समय पुरू की कई शाखाएँ हो गई थी, जिसमें भरत, तृत्सु और कुथिक का नाम प्रसिद्ध है। भरत
रावी नदी (अब पाकिस्तान में है) के तीर पर रहते थे। रावी को ही ऋगवेद में 'परूष्णी' कहा गया है। आगे चलकर इसी भरत के नाम पर हमारे देश को 'भारत भूमि' के नाम से जाना गया। भागवत पुराण के श्लोकों के आधार पर बाबासाहब डॉ.अम्बेडकर ने लिखा। है कि “भरत नरायण का ज्येष्ठ पुत्र था, जिसके नाम पर इस भूमि को 'भारत' नाम मिला।"

प्रियवंदो नाम सुतो मनोः स्वायं भुवस्य ह।
तस्याग्नी प्रस्तो नाभि =षमश्व सुतस्ततः ।।
अवतीर्ण पुत्रशतं तस्यासीद्रय पार गम् ।
तेषां वै मारतो ज्येष्ठों नरायण परायणः ।
विख्यातं वर्षयेतद्यन्नाम्ना भारत मुक्तप्रभ ।।

अर्थात मनु, जो स्वयंभू का पुत्र था। उसके पुत्र का नाम अग्नीधरा था। अग्नीधरा का पुत्र नभी था।
नभी का पुत्र ऋषभ था। उसके 100 पुत्र थे जिसमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम भरत था। इसी 'भरत' के नाम से इस सुन्दर भूमि का नाम 'भारत' जाना गया। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने 'ऋग्वैदिक आर्य' में कहा है कि "भरत कभी परूष्णी (रावी) के तट पर रहते थे, पर आज उनके नाम पर हमारा सारा देश प्रसिद्ध है। सिन्धु ने यदि भारत से बाहर हमारे देश को अपने नाम पर प्रसिद्ध किया, तो देश, में परूष्णी में तीर वाले भरतों (भरत और उनके वंशज) ने अपना नाम हमारे देश को दिया। इसी भरत के वंशज में सुदास नाम का एक पराक्रमी ,वीर और सुन्दर दान देने वाला शूद्र राजा हुआ था जिसने ब्राह्मणों के नेता वसिष्ठ को पराजित किया था।" सुदास को 'पुरू भरत' भी कहा जाता है। वसिष्ठ के समर्थक ब्राह्मणों को अपने
पराक्रम से हरा देने के कारण ब्राह्मणों ने सुदास को उस समय की प्रचलित परम्परा- यज्ञोपवीत संस्कार कराने से इनकार कर दिया। इससे सुदास की सामाजिक प्रतिष्ठा गिर गई और वे शूद्र श्रेणी में गिने जाने लगे। सुदास और ब्राह्मणों के बीच का मुद्दा था कि क्या पुरोहित के पद के लिए वह केवल ब्राह्मणों की सेवाएँ लेने को बाध्य था। प्रसिद्ध विद्ववान एस.के.विश्वास के अनुसार 'आर्यों के भारत आक्रमण के पूर्व इस देश का नाम भारतवर्ष था।' ऋग्वेद की ऋचाओं में भी आर्य ऋषिगण मूलनिवासी असुर समुदाय को भारतीय कहकर संबोधित करते हैं (ऋग्वेद, 1/14/9,3/4/8 एवं 7/2/8)।
परन्तु आर्यों को यह नाम कभी पसन्द नहीं था। आज भी एक वर्ग इस देश को 'हिन्दुस्तान ' कहना पसंद करता है, जबकी विदेशों में न तो 'भारत' और 'न ही 'हिन्दुस्तान' का नामोनिशान है; वहाँ सिर्फ 'इंडिया' ही प्रसिद्ध है। आज हमें अपने देश के प्रचीनतम नाम 'भारत' को अन्तर्राष्टीय क्षितिज पर पहचान दिलाने की आवश्यकता
है। इस प्रकार यह पता चलता है कि गौरवशाली विश्व गुरू भारत देश का नाम भारत के मूलनिवासी राजा 'भरत' के नाम पर हुआ है, जिसे आर्यों ने ईसा पूर्व 1500 में भारत आक्रमण के बाद 'आर्यावर्त' कहा। आर्यावर्त का अर्थ होता है 'आर्य' घुमक्कड़+आवर्त =आवृति(बारंबारता) अर्थात विदेशी घुमक्कड़ (यायावार या मुसाफिर)।
आर्यों की छोटी-छोटी टोलियों में भारत आना बहुत सालों तक लगातार होता रहा। विद्वानों का कहना है कि जब फारस के लोगों ने सिन्धु आस-पास के लागों को 'हिन्दू' नाम दिया तो इस नाम को विदेशी आर्य बाहाणों ने अपना लिया और इसके बाद ' सिंधी' को 'हिंदी' तथा 'सिंघस्थान' को 'हिंदुस्थान' कहा जाने लगा। इस प्रकार देश का नाम 'हिन्दुस्तान' पड़ा। भाषा उच्चारण भेद के कारण फारस निवासी सिन्धु के 'स' को 'ह' और 'ध' को 'द' उच्चारित करते थे। परन्तु निम्नलिखित प्रश्न इस दावे को खारिज कर देता है :- 1. यदि 'सिन्धु' को ही हिन्दू' कहा गया तो 'हिन्दू' शब्द का उल्लेख ऋगवेद में अवश्य होना चाहिए क्योंकि 'सिन्धु' का वर्णन ऋग्वेद में आया है। परन्तु ऋग्वेद में हिन्दू शब्द का एक बार भी उल्लेख नहीं है, क्यों? 2. सिन्धु नदी के आसपास के लोगों द्वारा इसके परिवर्तित नाम 'हिन्दू' के रूप में उच्चारित किये
तुफानों जाने के बावजूद अभी तक सिन्धु नदी का नाम अपरिवर्तित ही है, क्यों? सिन्धु नदी 'हिन्दू नदी' के रूप में क्यों नहीं प्रचलित हुआ? 3. 'सिन्धु' शब्द से बना हिन्दू' शब्द के साथ धर्म जुड़कर 'हिन्दु धर्म' बन गया, देश का नाम 'हिन्दुस्तान' हो गया परन्तु नदी के रूप में 'सिन्धु' आज भी यथावत है, ऐसा क्यों? वास्तविकता यह है कि मध्यकाल में भारत के मुसलमान शासकों ने मुसलमानों को छोड़कर शेष भारतीयों को घृणावश 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग काला, काफिर चोर,.डाकू, गुलाम आदि के अर्थ में किया। फारस के लोग 'श' अथवा 'स' वर्ण को समुचित
उच्चारण करने में समर्थ थे। इस कथन की पुष्टि में
निम्नलिखित उद्धरण पेश किया जाता है- "हिन्दू दर मुहाविरे.फारसियाँ बमानी दुन्द व रहमान मी आयद।" अर्थात फारसी भाषा के मुहावरे में 'हिन्दू' शब्द काला, काफिर, चोर और डाकू के अर्थ में आता है। आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती के प्रसिद्ध शिष्य पं.लेखराम , जो उर्दू-फारसी के विद्वान थे, ने अपनी पुस्तक "कुलियात आर्य मुसाफिर" में 'हिन्दू' का शब्दार्थ चोर,दास और काला बताया है और आर्य समाजियों को सचेत किया है कि 'हिन्दू' शब्द एक गाली है जिसे भारतीयों को मुस्लिम शासकों ने हीन और दीन समझकर दी है। बौद्ध जगत के विख्यात विद्वान महोपासक भद्रशील रावत के अनुसार सामाजिक तथाप्रयोगात्मक रूप से 'हिन्दू' शब्द का अर्थ कुछ और ही है।
वर्ण व्यवस्था के कठोर नियमों के कारण ऊँच वर्ण के लोग है। निम्न वर्ण के लोगों को कई प्रकार से अन्याय और अत्याचार का शिकार बनाते हैं जिसका अनुमोदन हिन्दू शास्त्र भी करता है। ऋग्वेद में आर्यों द्वारा अनार्यों पर लोमहर्षक हिंसा के वर्णनों से भरा पड़ा है। स्मृती ग्रन्थों में शूदातिशूद्र वर्ग के विरूद्ध क्रूरतम दंड रखो
के विधान हैं। वर्णाश्रम धर्म अथवा ब्राह्मणी धर्म को ही हिन्दू धर्म कहा जाता है। अतःरावत साहब हिन्दू शब्द का अर्थ -विन्यास करते हुए लिखते हैं- "हिन्दू वह है जो हिंसा
(हिं हिंसा) के द्वारा सामाजिक वातावरण को दूषित
(दू-दूषित) करते हैं।" निम्नलिखित संस्कृत का श्लोक इस
कथन की पुष्टि करता है, 

यथा-हिंसया यो दूषयति अन्यानां मनासि जाति अहंकार वृत्तिना सततं सो हिंदू: अर्थात

'जाति-पाति के घमंड में आकंठ डूबे जो ऊँच-नीच की
भावना से ओत-प्रोत द्वारा दूसरों की भावना को सदैव चोट पहुँचाते हैं, उसे हिंदू कहते हैं।' हिन्दू की यही परिभाषा बद - व्यावहारिक और प्रयोगात्मक है। 'हिन्दू' शब्द का उपयोग परसीपोलिस, हेम्डान और नक्श-ए-रूतम् के स्तम्भों में फारसी सम्राट डरियास
द्वारा उत्कीर्ण शिलालेखों में पाया गया है। भारत का धर्म हिन्दू धर्म के रूप में भले ही प्रसिद्ध है परन्तु हिन्दू संज्ञा की उत्पत्ति संस्कृत श्रोत से नहीं हुई है; वह फारसी भाषा से उत्पन्न हुई है।

कुम्भ, अम्बेडकर।

कुंभ और बाबा साहब डॉ. आंबेडकर (1954): “कुंभ के मेले में नंगे साधुओं के पैरों तले कुचलकर हज़ारों नागरिक मर गए। धर्म के प्रति इतना अंधविश्वास और पागलपन विश्व के किसी देश में हमें दिखाई नहीं देगा...मैं अगर मंत्री होता और अगर अधिकार होते तो मैं उन साधुओं को सेना भेजकर भगा देता.”

“ज़रूरत पड़ने पर गोलियाँ भी बरसाता। पहाड़ों पर रहने वाले साधुओं को अगर लोगों के बीच आना हो, तो उन्हें कपड़े पहन कर ढंग से आना चाहिए। लेकिन हमारे शासकों ने ऐसे समय में क्या किया? लोगों के अंधविश्वास को धार्मिक लोकप्रियता के लिए भुनाया।”

बाबा साहब ने यह वक्तव्य 14 नवम्बर, 1954 को हैदराबाद में दिया था। इससे पहले प्रयाग कुंभ में मची भगदड़ में हज़ार के आसपास लोग मरे थे। - बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वांगमय, खंड -40, भाग- 3, पेज -359, प्रकाशक-भारत सरकार (मराठी में भी प्रकाशित) 

चूँकि चुनाव सिर पर हैं और प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी हर दूसरे दिन बाबा साहब का नाम लेकर वोट माँग रहे हैं तो उन्हें देखना और पढ़ना चाहिए कि बाबा साहब के, राजकाज के बारे में विचार क्या था। फ़ोटो को फूल चढ़ाना बेहद सस्ता काम है।

Dilip C Mandal सर की वाल से

औरंगज़ेब।

मंदिर-मस्जिद पर औरंगजेब का अनोखा पहलू
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निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाणित होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढहा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि यदि यह क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा नदी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी। औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडा़व से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बड़ी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने मंदिर में देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। उन्होंने मूर्ति हटवा कर देखा तो तहखाने की सीढ़ी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोध प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्वनाथ की मूर्ति को कहीं और ले जाकर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाय और महंत को गिरफ्तार कर लिया जाए। डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डॉ. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुष्टि की है।
  गोलकुण्डा (हैदराबाद) की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह ने यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में दबा कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए और गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों में ख़र्च किया गया। यह दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। ‘‘दुर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़- मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी स्वार्थी एवं सांप्रदायिक तत्व इतिहास को तोड़ने -मरोड़ने व उसे गलत रंग देने में लगे हुए हैं।
   [साभार: इतिहास के साथ यह अन्याय!!: प्रकाशक - E -20 मधुर संदेश संगम, अबुल फज़्ल इन्कलेव, नई दिल्ली- 25, लेखक - प्रो. बिशम्भर नाथ (बी.एन.) पाण्डेय, पूर्व राज्यपाल उडीसा, (17.08. 1983- 20.11.1988), राज्य सभा सदस्य (25.11. 1988- 24.11. 1994 : मनोनीत), पूर्व चेयरमैन - इलाहाबाद नगरपालिका (1948- 1953), पद्मश्री पुरस्कृत -1976 (समाज कार्य) एवं इतिहासकार]
https://youtu.be/CvSTMDx1QjU

स्त्री स्तिथि।

स्त्री गुण  3 :-
बनवास के दौरान सीता जी का ऋषि अनुसुइया से मिलना हुआ। अनुसुइया ने स्त्री धर्म पर बात करते हुए यह कहा कि स्त्री  स्वभाव से ही अधम है ( सहज अपावन नारी  पुरुष मनोहर निरखत नारी).

रामचरितमानस में  राम कथा कागभुशुणडि जी गरुड़ को यह कथा सुनाते है। जब सरूपनखा का वर्णन आता है तब गरुड़ को कागभुशुण्डि जी कहते है कि स्त्री मनोहर पुरुष को देख कर चाहे वह भाई हो, पिता हो या पुत्र हो विकल हो जाती है। ( भ्राता, पिता  पुत्र  उरगारी, पुरुष मनोहर निरखत नारी  )

शबरी  श्री राम से मिलने पर बताती है कि जो अधम से भी अधम होते है, स्त्री उनसे अधम होती है और मैं उनसे भी अधम गंवार हूं। ( अधम ते अधम अधम अति नारी, तिन मह मै मतिमंध अघारी ।) तब तुलसीदास जी दोहे में कहते है  कि श्री राम ने नीच जाती को, पृथ्वी पर नीच वंश में पैदा औरत को भी  मुक्त कर दिया , है पापी मन तू ऐसे प्रभु को कैसे भुला कर सुख चाहता है। 

नारद जी ने एक बार शादी का मन बनाया और विष्णु से आशीर्वाद ले कर सव्यमबर में गए। विष्णु ने नारद को बन्दर का मुंह लगा दिया था यानी शादी नहीं करने दी थी। रामचरित मानस में नारद जी श्री राम पूछते है कि तुमने मुझे शादी क्यों नहीं करने दी तब श्री राम जी कहते है कि काम क्रोध लोभ मद और उससे भयानक है माया रूपणी नारी। यह को तप नियम आदि सब समाप्त कर देती है। यह बुद्धि बल और शील को इस तरह शिकार बनाती है जैसे मछली को मछली का कांटा। स्त्री अवगुणों की जड़ सब दुखों की खान और पीड़ा देने वाली है। इसलिए तुम्हे शादी नहीं करने दी। सुन कर नारद जी के आंसू निकल आए कि प्रभु मुझे इतना प्यार करतें हैं।

राम चरित मानस में ही पार्वती जी शिव से कहती है कि मै स्त्री होने के नाते स्वभाव से ही  मूर्ख और ज्ञान हीन हूं। ( जदपी सहज जड़ नारी अवानी  )

राम चरित मानस के संबंधित पन्ने पोस्ट कर दिए गए हैं।

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स्त्रियों के गुण ( भाग 2)

युधिस्ठिर के पूछने पर भीष्म ने नारद और अप्सरा  पंच्चचूड़ा के बीच हुए संवाद के संदर्भ से स्त्रियों के गुण यू बताएं

" यही सवाल नारद ने अप्सरा पंच्चचूड़ा से पूछा परंतु पहले तो अप्सरा ने मना किया परंतु नारद ने दोबारा प्रेरित करने पर यू बोली "

" कुलीन, रूपवती और सनाथ ( अनाथ का विपरीत अर्थ  वाला शब्द ) स्त्रियां भी मर्यादा में नहीं रहती। यह स्त्रियों का दोष है "

"स्त्री से बड़ा कोई दूसरा पापी नहीं है. स्त्रियां सभी दोषों की जड़ है. अगर स्त्री को दूसरों से मिलने का अवसर मिल जाए तो यह धनवान, रूपवान, और अपने बस में चलने वाले पति की भी  प्रतीक्षा नहीं करती।"

" हम स्त्रियां पापी से पापी पुरुष को भी लाज छोड़ कर स्वीकार कर लेती हैं। जो पुरुष किसी औरत को चाहता है, उसके नजदीक पहुंचता है, थोड़ी सी भी सेवा कर देता है उसी को चाहने लगती हैं. खुद मर्यादा का ध्यान नहीं रखती . अगर कोई पुरुष ना मिले, परिजनों का डर बना रहे, पति का साथ बना रहे तो ही मर्यादा में रहती है "

" इनके लिए कोई भी पुरुष अगम्य नहीं है, किसी भी उम्र का हो, रूपवान हो या कुरूप हो बस पुरुष हो बस इतना ही समझ कर उपयोग करती है "

" स्त्री ना तो भय से, ना दया से, ना धन के लोभ से, ना जाती कुल के लिहाज से पति के पास टिकती हैं। जो जवान स्वेच्छाचारिणी स्त्रियां सुंदर लिबास व गहने पहनती है उनको देख कर कुलीन घर की औरतें भी वैसा ही बनना चाहती हैं . कुलीन घर की सम्मानित औरतें, पति की प्यारी और जिनकी सदा रखवाली भी की जाती हो तो भी घर में आने वाले अंधे, कूबड़े, गूंगे और बोने आदमी  के साथ फंस जाती हैं, अपंग, घृणित के साथ भी इनकी आसक्ति हो जाती है, इनके लिए कोई भी पुरुष अगम्य नहीं है "

" अगर पुरुष ना मिले तो ये औरतें आपस में ही कृत्रिम तरीके से ही मैथुन करती है " 

"औरतों सभांव से ही चंचल होती हैं। इनको समझना बड़ा मुश्किल है ये किसी भी पुरुष से तृप्त नहीं होती "

" किसी भी सुंदर पुरुष को देख कर इनकी योनि गीली हो जाती है . रती संभोग के सम्मुख यह बाकी किसी को ज्यादा महत्व नहीं देती "

चलता......... ( तीसरी किस्त में)

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत के संबंधित पन्ने ( अनुशासन पर्व 38 वा अध्याय ) पोस्ट कर दिए गए हैं।


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कन्‍या विवाह के सम्‍बन्‍ध में पात्र विषयक विभिन्‍न विचार
युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! जो समस्‍त धर्मों का, कुटुम्‍बीजनों का, घर का तथा देवता, पितर और अतिथियों का मूल है, उस कन्‍यादान के विषय में मुझे कुछ उपदेश कीजिये। पृथ्‍वीनाथ! सब धर्मों से बढ़कर यही चिन्‍तन करने योग्‍य धर्म माना गया है कि पात्र को कन्‍या देनी चाहिये?

भीष्‍म जी ने कहा- बेटा! सत्‍पुरुषों को चाहिये कि वे पहले वर के शील-स्‍वभाव, सदाचार, विद्या, कुल, मर्यादा और कार्यों की जाँच करें। फिर यदि वह सभी दृष्टियों से गुणवान प्रतीत हो तो उसे कन्‍या प्रदान करें। युधिष्ठिर! इस प्रकार ब्‍याहने योग्‍य वर को बुलाकर उसके साथ कन्‍या का विवाह करना उत्तम ब्राह्मणों का धर्म-ब्राह्म विवाह है। जो धन आदि के द्वारा वर पक्ष को अनुकूल करके कन्‍यादान किया जाता है, वह शिष्‍ट ब्राह्मण और क्षत्रियों का सनातन धर्म कहा जाता है। (इसी को प्राजापत्‍य विवाह कहते हैं)। युधिष्ठिर! जब कन्‍या के माता-पिता अपने पसंद किये हुए वर को छोड़कर जिसे कन्‍या पसंद करती हो तथा जो कन्‍या को चाहता हो, ऐसे वर के साथ उस कन्‍या का विवाह करते हैं, तब वेदवेत्ता पुरुष उस विवाह को गान्‍धर्व धर्म (गान्‍धर्व विवाह) कहते हैं। नरेश्‍वर! कन्‍या के बन्‍धु-बान्‍धवों को लोभ में डालकर उन्‍हें बहुत-सा धन देकर जो कन्‍या को खरीद ले जाता है, इसे मनीषी पुरुष असुरों का धर्म (आसुर विवाह) कहते हैं। तात! इसी प्रकार कन्या के रोते हुए अभिभावाकों को मारकर, उनके मस्तक काटकर रोती हुई कन्‍या को उसके घर से बलपूर्वक हर लाना राक्षसों का काम (राक्षस विवाह) कहा जाता है।

युधिष्ठिर! इन पांच (ब्राह्म, प्राजापत्‍य, गान्‍धर्व, आसुर और राक्षस) विवाहों में से पूर्वकथित तीन विवाह धर्मानुकुल हैं और शेष दो पापमय हैं। आसुर और राक्षस विवाह किसी प्रकार भी नहीं करने चाहिये।[1]

नरश्रेष्‍ठ! ब्राह्म, क्षात्र (प्राजापत्‍य) तथा गान्‍धर्व- ये तीन विवाह धर्मानुकुल बताये गये हैं। ये पृथक हों या अन्‍य विवाहों से मिश्रित, करने ही योग्‍य हैं। इसमें संशय नहीं है। ब्राह्मण के लिये तीन भार्याएँ बतायी गयी हैं (ब्राह्मण कन्‍या, क्षत्रिय कन्‍या और वैश्‍य कन्‍या), क्षत्रिय के लिये दो भार्याएँ कही जाती हैं (क्षत्रिय कन्‍या और वैश्‍य कन्‍या)। वैश्य केवल अपनी ही जाति की कन्‍या के साथ विवाह करे। इन स्त्रियों से जो संतानें उत्‍पन्‍न होती हैं, वे पिता के समान वर्ण वाली होती हैं (माताओं के कुल या वर्ण के कारण उनमें कोई तारतम्‍य नहीं होता)। ब्राह्मण की पत्नियों में ब्राह्मण कन्‍या श्रेष्‍ठ मानी जाती है, क्षत्रिय के लिये क्षत्रिय कन्‍या श्रेष्‍ठ है (वैश्‍य की तो एक ही पत्‍नी होती है; अत: वह श्रेष्‍ठ है ही)। कुछ लोगों का मत है कि रति के लिये शूद्र जाति की कन्‍या से भी विवाह किया जा सकता है; परंतु और लोग ऐसा नहीं मानते (वे शूद्र कन्‍या को त्रैवर्णिकों के लिये अग्राह्य बतलाते हैं)। श्रेष्‍ठ पुरुष ब्राह्मण का शुद्र कन्‍या के गर्भ से संतान उत्‍पन्‍न करना अच्‍छा नहीं मानते। शूद्रा के गर्भ से संतान उत्‍पन्‍न करने वाला प्रायश्चित का भागी होता है। तीस वर्ष का पुरुष दस वर्ष की कन्‍या को, जो रजस्‍वला न हुई हो, पत्‍नी रूप में प्राप्‍त करे अथवा इक्‍कीस वर्ष का पुरुष सात वर्ष की कुमारी के साथ विवाह करे.

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मेरे मन में बार बार यह सवाल आता है कि हिन्दू लड़किया ही क्यों  कथित लव जेहाद का शिकार बनती हैं, जबकि स्त्री का हिन्दू धर्म में बहुत सम्मान हैं। क्या हिन्दू धर्मशास्त्रों में लिखा है ? हां, लिखा है। 

फिर ऐसा क्यों है ? हमारे सामाजिक व्यवहार में ऐसा किस कारण से हुआ ? बताया यह भी जाता है कि इस्लाम में स्त्री की इज्जत बहुत कम है।

धरातल पर आज की स्तिथि देखिए। पुत्रवती भव। कभी पुत्रीवती भव बोलते हुए कभी सुना है। कभी किसी औरत को आप पुत्रीवती होने का आशीर्वाद दे सकते हो ? क्या लड़कियों को लड़कों के बराबर आज़ादी है ? नहीं है। मुस्लिम शादियों में लड़कियों से रजामंदी पूछी जाती है, फिर चाहे वह फर्जी दिखावे के लिए ही हो, है तो। हिंदुओं में सरेआम कहा जाता है कि लड़की को मर्जी से शादी का अधिकार नहीं है। ( बाप का घर कोई धर्मशाला नहीं है)

महाभारत के अनुशासन पर्व ( 39 वा अध्याय) में युधिष्ठिर भीष्म से औरतों की प्रवृति पर सवाल  पूछता है तो भीष्म जो जवाब देता है वह 40, 41, 42 वे अध्याय में हैं।  क्या कहा गया है,

" स्त्री से बढ़ कर कोई पपिष्ठ नहीं है। यौवन मद्य में उन्मत रहने वाली ये औरतें  प्रज्वलित अग्नि के समान हैं।"

"छुरे की धार, विष, सांप और आग एक तरफ और दूसरी तरफ जवान लड़की बराबर।"

"पहले  ब्रह्मा ने सिर्फ मनुष्यों की ( स्त्रियों की नहीं) रचना की.  वह बहुत धार्मिक थे. अपने धर्म की वजह से सभी देवत्व को प्राप्त कर सभी देवलोक चले जाते थे और यह देवताओं को मंजूर नहीं था. इसलिए ब्रह्मा ने मनुष्यों में दोष उत्पन्न करने के लिए नारी की उत्पत्ति की "

पहले तो सभी स्त्रियां पतिव्रता थी परन्तु प्रजापति ने औरतों में कामभाव उत्पन्न किया। मतवाली स्त्रियां कामलोलुप हो कर  पुरुषों को सदा बाधा देती रहती हैं "

"ब्राह्मण, गुरु, महागुरु और राजा सभी स्त्री के साथ क्षणिक संग  की वजह से निरन्तर कामजनित  यातना सहनी पढ़ती है"

"स्त्री के लिए किसी वैदिक कर्मो के करने का विधान नहीं है. यही धर्मशास्त्र की व्यवस्था है। स्त्री इन्द्रियों को काबू में नहीं कर सकती। शास्त्र ज्ञान से रहित अस्त्य की मूर्ति हैं . प्रजापति ने इनको बस सोना, खाना, पीना, अनार्यता, दुर्वचन और  काम ( सेक्स) प्रदान किया है ."

"ब्रह्मा जैसा पुरुष भी उनकी रक्षा नहीं कर सकता, फिर साधारण पुरुष की तो बात ही क्या. "

"वाणी, वध, बन्धन और अनेक प्रकार के कलेश दे कर भी स्त्री की रक्षा नहीं की का सकती क्योंकि वह असयमशील  होती है।" ( पुरुष दोषी हो ही नहीं सकता). 
चलता......... ( दूसरी किस्त में)

गीता प्रेस गोरखपुर और सनातन धर्म  प्रेस मुरादाबाद द्वारा प्रकाशित महाभारत के संबंधित पन्ने पोस्ट कर दिए गए हैं।

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हिन्दू धर्म में स्त्री की हैसियत।

सुमाली की बेटी कैकसी ( रावण की माता ) जब जवान हुई तब उसके पिता ने  कहा बेटी से कहा  कि सम्मान कि इच्छा रखने वाले सभी लोगों के यहां कन्या का होना दुख का कारण बनती है। माता के, पिता के तथा जहां कन्या दी जाती है, तीनों कूलों को कन्या संशय में डालती है। क्योंकि यह पता ही नहीं चलता कि कोन और कैसा पुरुष कन्या का वर्ण करेगा। तुम प्रजापति कुल के श्रेष्ठ पुरुष  पुलस्त्य नन्दन विश्रवा का वरन करो। बाल्मीकि रामायण  उत्तर काण्ड 9 वा सर्ग.

दिती का पुत्र मय, मय ने हेमा नाम की अप्सरा से कन्या मन्दोदरी उत्पन्न की।  पुत्री को लेकर वन में घूम रहा है। वहां रावण मिला जो अपना परिचय ऐसे देता है कि मेरे पिता विश्रवा मुनि ब्रह्मा जी की तीसरी पीढ़ी में पैदा हुए। मंदोदरी के पिता कहते है 
" मान की अभिलाषा रखने वाले  सभी लोगों के लिए कन्या का पिता होना कष्टकारी होता है क्योंकि कन्या के पिता को दूसरों के सामने झुकना पढ़ता है। कन्या सदा माता पिता के कुल को संशय में डाले रहती हैं। बाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड 12 वा सर्ग.

सीता का विवाह 6 साल की उम्र में हुआ। (बाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड 47 वा सर्ग ) सीता जी खुद बताती है कि जब मेरे पिता ने  देखा कि मेरी अवस्था विवाह के योग्य हो गई है तो वह इसके लिए बड़ी चिंता में पढ़े। जैसे कमाए हुए धन के नष्ट होने से निर्धन पुरुष दुखी होता है, उसी प्रकार मेरे पिता को मेरे विवाह कि चिंता से दुख हुआ। संसार में कन्या के पिता को चाहे वह इन्द्र के बराबर ही क्यों ना हो और वर पक्ष के समान या निम्न हैसियत के होने पर भी कन्या पक्ष को अपमान उठाना ही पढ़ता है। वह अपमान कि घड़ी समीप अाई जान कर मेरे पिता दुखी हुए।  ( बाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड 118 वा सर्ग )

बनवास के दौरान जब राम लक्ष्मण और सीता ऋषि अगस्त्य के आश्रम में पहुंचे तब ऋषि अगस्त्य बोले कि सृष्टि काल से अब तक  स्त्रियों का स्वभाव प्राय ऐसा है कि पति अगर  धन धान्य से भरपूर और सुखी है तब तक साथ और दरिद्र होते ही साथ छोड़ देती है। स्त्रियां बिजली की तरह चपल, शस्त्रों के समान तीव्र और गरुण और वायु के समान तेज गति का अनुसरण करती हैं। लेकिन सीता ऐसी नहीं है।  ( बाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड 13 वा सर्ग )

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित बाल्मीकि रामायण के संबंधित पन्ने पोस्ट कर दिए गए है।

Friday, 2 April 2021

अनार्य नरसंघार।

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वेदों का ज्ञान विज्ञान या अनार्यों का कत्लेआम,संहार ,और विध्वंस .?....

त्वमेतान्नुदतो जक्षतश्चायोधयो रजस इन्द्र पारे । अवादहो दिव आ दस्युमुच्चा प्र सुन्वतः स्तुवतः शंसमावः । । ७ । । 

हे इन्द्रदेव ! आपने रोने या हँसने वाले इन शत्रुओं को समर में मार गिराया ,दस्यु वृत्र को दिव्य लोक से लाकर अच्छी प्रकार दग्ध किया इसी प्रकार सोम रस तैयार करने वाले प्रशंसक स्तोताओं की रक्षा की .

 चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमानाः । न । ॐ हिन्वानासस्तितिरुस्त इन्द्रं परि स्पशो अदधात्सूर्येण । । ८ । । 

उन वृत्रानुचरों ने पृथिवी को आच्छादित कर डाला , और सुवर्ण और मणियों से भी वे सम्पन्न हो ,परन्तु वे इन्द्रदेव को नहीं जीत सके ,इन्द्रदेव ने उन विघ्नकर्ताओं को सूर्य द्वारा तिरोहित कर डाला था .

परि यदिन्द्र रोदसी उभे अबुभोजीर्महिना विश्वतः सीम् । अमन्यमानाँ अभि मन्यमानैर्निर्बह्मभिरधमो दस्युमिन्द्र । । ९ । । । 

हे इन्द्रदेव ! चूंकि आपने महिमा - द्वारा धुलोक और पृथ्वीलोक को सम्पूर्ण रूप से वेष्टित करके सारा भोग किया ; इसलिए आपने मन्त्रार्थ - ग्रहण करने में असमर्थ यजमानों को भी रक्षा करने में समर्थ मन्त्रों द्वारा वृत्र - रूप चोर को निःसारित किया.

न ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन् ।युजं वज्र वृषभश्चक्र इन्द्रो निज्योतिषा तमसो गा अदुक्षत् ।।१० ।।

जब दिव्य लोक से जल पृथिवी पर नहीं प्राप्त हुआ और धन - प्रद भूमि को उपकारी द्रव्य - द्वारा पूर्ण नहीं किया , तब वर्षाकारी इन्द्रदेव ने अपने हाथों में वज्र उठाया और द्युतिमान् वज्र - द्वारा अन्धकाररूप मेघ में पतनशील जल का पूर्ण रूप से दोहन कर लिया.

अनु स्वधामक्षरन्नापो अस्यावर्धत मध्य आ नाव्यानाम् ।सघ्रीचीनेन मनसा तमिन्द्र ओजिष्ठेन हन्मनाहन्नभि द्यून् ।।११ ।।

प्रकृति के अनुसार जल बहने लगा ;किन्तु वृत्र नौकागम्य नदियों के बीच में बढ़ा तब इन्द्रदेव ने महाबलशाली और प्राण - संहारी आयुध - द्वारा कुछ ही दिनों में स्थिर - मना वृत्र का वध किया 

न्याविध्यदलीबिशस्य दृळ्हा वि भृङ्गिणमभिनच्छुष्णमिन्द्रः ।यावत्तरो मघवन्यावदोजो वज्रेण शत्रुमवधीः पृतन्युम् ।।१२ ।।

गुफा की भूमि पर सोये हुए वृत्र की सेना को इन्द्रदेव ने विद्ध किया और श्रृंगी तथा जगच्छोषक वृत्र को विविध प्रकार से ताड़ना दी,
इन्द्रदेव आपने सम्पूर्ण वेग और बल से शत्रुसेना का संहार किया-

अभि सिध्मो अजिगादस्य शत्रून्वि तिग्मेन वृषभेणा पुरोऽभेत् ।सं वज्रणासृजद्वत्रमिन्द्रः प्र स्वां मतिमतिरच्छाशदानः ।।१३ ।।

इन्द्रदेव का कार्य -साधक वज्र शत्रु को लक्ष्य कर गिरा था,इन्द्र ने तीक्ष्ण और श्रेष्ठ आयुध -द्वारा वृत्र के नगरों को विविध प्रकार से छिन्न - भिन्न किया,अन्त में इन्द्र ने वृत्र पर वज्र द्वारा आघात किया और उसे मारकर भली - भाँति अपना उत्साह बढ़ाया.

आवः कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चकन्प्रावो युध्यन्तं वृषभं दशद्युम् ।शफच्युतो रेणुर्नक्षत _ द्यामुच्छ्वैत्रेयो नृषाह्याय तस्थौ ।।१४ ।।

हे इन्द्रदेव !आप जिस कुत्स ऋषि की स्तुति चाहते हो , उसी कुत्स की आपने रक्षा की थी आपके घोड़ों के सुमों से पतित धूलि द्युलोक तक फैल गई थी,शत्रु भय से जल में मग्न होकर भी चैत्रेय ऋषि ,मनुष्यों में अग्रणी होने की अभिलाषा से आपके अनुग्रह से बाहर निकल आये थे .

आवः शमं वृषभं तुझ्यासु क्षेत्रजेषे मघवञ्छित्र्यं गाम् ।योक चिदत्र तस्थिवांसो अक्रज्छत्रूयतामधरा वेदनाकः ।।१५ ।।।

हे इन्द्रदेव !सौम्य ,श्रेष्ठ और जल - मग्न वैयेत्र को क्षेत्र - प्राप्ति के लिए आपने बचाया था,वहाँ जलों में ठहरकर अधिक समय तक आप शत्रुओं से युद्ध करते रहे,उन शत्रुओं को जल में गिराकर अपने मार्मिक पीड़ा पहुँचाई-

  ( ऋग्वेद की उपरोक्त विवेचना से आपनें देखा कि आर्यो के आक्रमणकारी इन्द्र नें किस तरह विध्वंसक उत्पात मचाकर भारतीय मुलनिवाशियों में कत्लेआम कर तबाही मचाई थी,तो क्या किसी राजा की हत्या कर देना ही वेदों का ज्ञान और विज्ञान है..?..तो क्या तमाम जनता की हत्या कर देना वेदों का ज्ञान और विज्ञान है.?..या फिर जीवन रक्षक जलसंचय के बांधो का विध्वंस कर संचित जल को फैलाकर नष्ट कर देना वेदों का ज्ञान और विज्ञान है..?.अथवा शहर के शहर तबाह कर खण्डहरों में बदल देना वेदों का ज्ञान और विज्ञान है-नहीं न,तो फिर क्या है .?.जाननें के लिए बने रहिये प्लेटफार्म पर ,दरअसल यहां वेदों में कोई ज्ञान और विज्ञान नहीं बल्कि आक्रमणकारी आर्य विदेशियों द्वारा भारतीय बहुजन मुलनिवाशियों के नरसंहार और उनके विध्वंस की काली कहानी छुपी है इन आर्यों के वेदों में ....जानिए...
    क्रमशः.....
   ऋग्वेद-भाग-1-
    प्रष्ठ -७६-७७
   -----------मिशन अम्बेडकर.

स्तूप।

🌷धम्म नास्तिक है और धर्म आस्तिक🌷
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धम्म का अर्थ धर्म से उल्टा है, जैसे नास्तिक का अर्थ आस्तिक से उल्टा है। प्रचलित परिभाषा के अनुसार धम्म नास्तिक है, धर्म आस्तिक है। धम्म अपने सही अर्थ में "धर्म" का पर्यायवाची नहीं बल्कि विलोम शब्द है। बुद्ध के "धम्म" का अनुवाद रिलिजन (Religion) करना भाषा के दृष्टिकोण से गलत है। खुद अशोक ने "धम्म" का अनुवाद ग्रीक में कराया है। यह अनुवाद उसके द्विभाषीय कंधार शिलालेख पर अंकित है। उसने "धम्म" का अनुवाद ग्रीक में "युसेबेइया" कराया है, जबकि ग्रीक में "रिलिजन" को "थ्रिस्किया" कहा जाता है। "रिलिजन" में ईश्वर या देवताओं के अस्तित्व में विश्वास जरूरी होता है, जबकि "धम्म" या "युसेबेइया" में यह जरूरी नहीं है।धम्म मूलतः धर्म का विपरीतार्थक शब्द है। थ्रिस्कीया - बिना जाने मान लेना - अंधश्रद्धा - धर्म और यूसेबेइया - जानकर मानना - श्रद्धा - धम्म। इस अर्थ में भी धम्म और धर्म एक दूसरे के उलट हैं। यदि आप सोच रहे हैं कि आस्तिक का अर्थ ईश्वर में विश्वास करना और नास्तिक का अर्थ ईश्वर में विश्वास नहीं करना है तो आप भ्रम में हैं। हिंदू दर्शन में जो वेदों पर विश्वास करे, वह आस्तिक है और जो वेदों पर विश्वास नहीं करे, वह नास्तिक है। "मीमांसा" और "सांख्य" दर्शन ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, मगर वे वेदों में करते हैं, इसीलिए उन्हें आस्तिक दर्शन माना गया है। वेदों में विश्वास का मतलब, वही वर्ण व्यवस्था में विश्वास। इसीलिए जो वर्ण व्यवस्था में विश्वास करे, वह आस्तिक है और जो वर्ण व्यवस्था में विश्वास नहीं करे, वह नास्तिक है। यदि आपने ठीक से ध्यान नहीं दिए होगा तो डिक्शनरी खोलकर देखिएगा कि "सेक्युलर" का वास्तविक अर्थ "लौकिक" होता है। जो "परलोक" में विश्वास करता है, वह "सेक्युलर" नहीं हो सकता। दुनिया के सभी बड़े धर्मों में से सिर्फ बौद्ध धम्म की जीवन दृष्टि ही लौकिक है, सेक्युलर है। बाकी सब परलोक में विश्वास करते हैं, इसलिए वे सेक्युलर नहीं हो सकते।
     कौत्स वेद विरोधी थे और उन्होंने वेद को बकवास बताया है। उन्हीं के नाम पर कुत्सित विचारधारा या कुत्सित आदमी का प्रचलन है। वेदों में जो स्तूप का विवरण है, रामायण में जो चैत्यों का विवरण है, आखिर वे किस सभ्यता के प्रतीक हैं, जबकि माना जाता है कि बौद्ध सभ्यता से वैदिक सभ्यता प्राचीन है। यह तो बहुत बताया जाता है कि ऋग्वेद में गंगा का एक बार और यमुना का तीन बार वर्णन है, मगर यह बहुत कम बताया जाता है कि ऋग्वेद में स्तूप का वर्णन दो बार है। ॠग्वेद के 1/24/7 में स्तूप का वर्णन है, स्तूप में बुद्ध के वास का भी वर्णन है। बताइए कौन-सा पुराना है बुद्ध या वेद ? पुरातात्विक रूप से स्तूप सिंधु घाटी सभ्यता में मिलता है और लिखित रूप में स्तूप वैदिक साहित्य में मिलता है। सिंधु घाटी की सभ्यता प्राचीन हो चाहे वैदिक युग, स्तूप तो दोनों में है। श्रमण बनाम ब्राह्मण संस्कृति की लड़ाई शब्दों की तलवार से भी लड़ी गई है। पालि में भद्द का अर्थ आदरणीय होता है। इसीलिए गौतम बुद्ध की पत्नी को भद्द कच्चाना कहा जाता था। आप्त से, आस्था से ज्ञान प्राप्त करना वेद है। विवेक से, विवेचन - पद्धति से ज्ञान प्राप्त करना थेर है। यही थेरवाद अंग्रेजी में थ्योरी (सिद्धांत) है। इसीलिए बुद्ध की शिक्षाओं को सिद्धांत (थ्योरी) कहा जाता है। भद्द का विस्तृत रूप भदन्त और संक्षिप्त रूप भन्ते है। हिंदी का भद्दा और भोंदू इसी भद्द से बदनाम हुए शब्द हैं। जैसे मूर्ख के अर्थ में बुद्ध से बुद्धू बना, वैसे सीधा-सादा बेवकूफ के अर्थ में भद्द से भोंदू बना। सम्राट अशोक का सिंहचतुर्मुख ने सबसे पहले बौद्ध कला को प्रभावित किया और गौतम बुद्ध की चार मुख वाली मूर्ति को जन्म दिया, फिर ब्रह्मा के चार मुख की परिकल्पना की गई।
      जब सम्राट अशोक के किसी भी शिलालेख में बुद्ध को छोड़कर किसी देवी - देवता का नाम है ही नहीं तो फिर सम्राट अशोक को देवताओं के प्रिय कहने का क्या मतलब ? बुद्ध का प्रिय सम्राट अशोक कहने से संदर्भ जुड़ता है। देवानांपिय का देव/देवा संदर्भ के अनुसार बुद्ध का सूचक है। शिलालेख को आगे पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। अशोक ने कहा है कि पहले मैं (बौद्ध) उपासक था और अब बौद्ध संघ की संगति में हूँ। ऐसे में देवानांपिय का देव/देवा खुद ही बुद्ध से जुड़ जाता है। शायद इसीलिए फाहियान ने हर जगह बुद्ध को देव ही कहा है - बुद्ध देव! मगध क्षेत्र में "लिबिर लिबिर" किसी को चिढ़ाने के लिए बदनाम शब्द है। ये कौन था लिबिर ? वही, अशोक के अभिलेखों को लिखने वाले लिपिकार जिन्हें "लिबिर" कहा जाता था। जिन्हें लिखने का ज्ञान नहीं था, वे लिखने वाले को "लिबिर लिबिर" कहते थे। प्राचीन काल में "पाखंड" परिव्राजकों की एक नास्तिक विचारधारा थी। इसके अनुयायी पाखंडी कहे जाते थे। पाखंडियों का मौर्य काल में काफी सम्मान था। ये परिव्राजक लोग ईश्वर, ढोंग आदि के विरोधी थे। मगर आज पाखंड जैसे सम्मानित श्रमण संप्रदाय को बेइज्जत करने के लिए पाखंडी का अर्थ ढोंगी कर दिया गया है। समय होत बलवान। इतिहास सिर्फ वो नहीं है, जिसे शासकों ने लिखवाया है बल्कि इतिहास वो भी है जिसे शासितों ने सहा, मगर लिखा नहीं।
     डा0 राजमल बोरा (ब्राह्मण) उस खेमे के बड़े भाषा वैज्ञानिक रहे हैं जिनका साफ मानना था कि भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत नहीं है। संस्कृत का विकास प्राकृत से हुआ है इसलिए संस्कृत की पूरी शब्दावली प्राकृत का तद्भव है  या कहें संस्कृत वास्तव में प्राकृत का अपभ्रंश है। उनकी "प्राकृत का इतिहास और भूगोल" पूरी किताब इसी सिद्धांत पर आधारित है, इसे मिलिंद प्रकाशन हैदराबाद ने छापा है। हर भाषा किसी दूसरी भाषा के संपर्क में आती है तो उनके बीच शब्दों का आदान - प्रदान होता है। मध्य काल में फारसी आई तो हिंदी में फारसी के शब्द आ गए। आधुनिक काल में अंग्रेजी आई तो अंग्रेजी के शब्द हिंदी में आ गए। मगर अशोक कालीन प्राकृत में एक भी शब्द संस्कृत के नहीं आए। ऐसा हो नहीं सकता कि अशोक काल में संस्कृत मौजूद हो और संस्कृत के एक भी शब्द अशोक के अभिलेखों में न आए। पालि पहले की भाषा है। इसीलिए त्रिपिटकों, धम्मपद आदि का संस्कृत में अनुवाद हुआ। संस्कृत बाद की है, इसीलिए वेद, पुराणों आदि का पालि में अनुवाद नहीं हुआ। जैसे हिंदी साहित्य में भक्ति काल है, वैसे ही संस्कृत साहित्य में वैदिक काल है। भक्ति काल और वैदिक काल दोनों मूल रूप से साहित्य के विषय हैं, गौण रूप से इतिहास के। (Rajendra Prasad Singh, PROF. - V.K.S. University Ara, Sasaram, Bihar, India की फेसबुक वॉल का संग्रहण)

पर्वत उड़ना।