Tuesday, 20 April 2021

समुद्र मंथन।

ब्राह्मणी धर्म में अंकित समुंद्र मंथन की सच्चाई

समुद्र मंथन का पौराणिक विवरण पढ़ने से सच्चाई तक
पहुंचने की कोशिश करते हुए मैं जिस नतीजे पर पहुंचा हूं,
यहां मैं उसी को उद्धृत कर रहा हूं, जोकि मेरे अपने स्वतंत्र
विचार हैं। मैं अपने विचारों से सहमत होने के लिए किसी को
बाध्य नहीं कर सकता और न ही अपने विचारों को किसी पर
थोपने का दुस्साहस कर सकता हूं। मैं सिर्फ अपने विचारों से
पाठक के अवगत कराना चाहता हूं। मानने अथवा न मानने
के लिए पाठक स्वतंत्र हैं। समुद्र मंथन की भूमिका उस समय
से होती है, जब महाराजा बलि के पिता विरोचन ने इन्द्र
पर आक्रमण कर उसके सिंहासन पर कब्जा कर लिया था
और इन्द्र की सारी बहु मूल्य अमानत को अपनी प्रजा में
ऋषियों, मुनियों में बांट दिया था। इन्द्र की सारी धन सम्पदा
लुटाकर उन्हें कंगाल कर दिया था। यहां तक कि उनके हाथी,
घोड़े, गाय आदि सब कुछ। उसके बाद राजाबलि ने जब
आक्रमण किया तो ब्राह्मण देवताओं की सारी सेना, बची-खुची
धन सम्पदा को अपने कब्जे में कर लिया तो देवताओं की
समस्त देवियां भी स्वतः ही राजाबलि के पास आ गई थी।
ब्राह्मण देवताओं के पास अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं
था। जब इनकी औरतें इनके पास नहीं थी, तो उन्हीं देवियों
को पाने के लिए देवताओं ने स्वंय को असुरों के समक्ष समुद्र
मंथन का षड्यत्र रचा। यहां सोचकर असुरों ने समझौते के
लिए हामी भर दी। असुरों को तैयार करने के लिए नाग राज
वासुकि की मुख्य भूमिका थी और यह सभा भी नागराज वासुकि
की अध्यक्षता में हुई थी। इसलिए वासुकि को मंथन का साधन
(रस्सी) बना दिया गया। यह सभा मंदराचल पर्वत पर हुई थी।
इस सभा में असुरों का लक्ष्य मुख्यतः विष्णु को पकड़कर बंदी
बनाना था। क्योंकि विष्णु ही आर्यो का सरवार थे, तथापि
विष्णु को भी यह पता था यदि मैं उस सभा में गया तो सबसे
पहले मैं ही मारा जाऊंगा।
क्या विष्णु सच में स्त्री हो गए थे
यदि विष्णु सच में स्त्री बना होता तो वह सभा में जाने
से क्यों डरता? परंतु उसने तो स्त्रियों जैसा नकली रूप बनाया
था। इसलिए विष्णु उस सभा में खुले रूप में नहीं गया। जब
तक सभा में गर्मा-गरर्मी बनी रही, तब तक विष्णु पानी में
छिपकर सभा की कार्यवाही देखता रहा। जब समझौते के द्वारा
कई स्त्रियां देवता ब्राह्मणों के पक्ष में आ गई तो विष्णु पूर्व
निश्वित षड्यंत्र के तहत स्त्रियों के बीच में आकर बैठ गया।
किंतु बलि के दो पुत्रों ने विष्णु के पहचान लिया और उन
दोन ने विष्णु को पकड़ने की योजना बनानी शुरू की। जिसकी
भनक चन्द्रमा को हो गई, उसने विष्णु को बता दिया कि स्थिति
बर्ड ही गम्भीर हो गई। विष्णु स्त्रियों के बीच दुबकने लगे।
राहु और केतु ने ब्राह्मणों के समूह में जाकर विष्णु को पहचानने
की कोशिश की। ब्राह्मण देवताओं ने राहु और केतु की गर्दन
की काट दी फिर क्या था, तुरंत ही हिंसा भड़क उठी। घमासान
युद्ध आरंभ हो गया, परंतु इस बार भी देवता ब्राह्मणों को
मैदान छोड़कर भागना पड़ा और महाराजा बलि का प्रभुत्व
कायम रहा। परंतु राहु और केतु समुद्र मंथन के नाम पर मारे
गए जब राहु और केतु ब्राह्मणों द्वारा मार दिए गए तो यह
देखकर शंकर जी से ब्राह्मण की उदण्डता सही नहीं गई, चूंकि
वह भी जान गए थे कि विष्णु स्त्री भेष में छिपा है। इसलिए
शंकर जी ने आर्य ब्राह्मणों के नेता विष्णु का पर्दाफाश करने
के उद्देश्य से ही उसके पीछे दौड़ पड़े। शंकर जी का क्रोध
जानकर विष्णु भी स्त्री रूप में भागा। परिस्थिति के अनुसार
शंकर जी ने अपनी वाणी का संयम खो दिया और विष्णु को
यौन संबंध बनाने की गाली भी दे डाली। यह असंभव नहीं कि
शंकर जी ने कुछ अश्लील हरकतें की हों, किन्तु यह सब करने
के पीछे शंकर जी द्वारा विष्णु (मोहिनी) पर आसक्त होना
नहीं, बल्कि विष्णु को पकड़कर सबके सामने उसे जलील करने
के उद्देश्य से किया था।
पाठकों के मन में यह संदेह हो गया होगा कि आखिर
शंकर जी ऐसा क्यों करेंगे? वह इसलिए कि उस समय का
शंकर वर्तमान की तरह ब्राह्मणवाद के कब्जे में नहीं था। शंकर
जी स्वंय नागवंशी थे और वे समुद्र मंथन के समय असुरों की
और से ही गए थे। असुरों के निवेदन पर ही उन्होंने समुद्र
मंथन के प्रथम विवाद को यानी कालकूट नामक भयंकर विष
 को ग्रहण किया था। महाराजा बलि के शासन काल तक शंकर
जी, ब्रह्मा, विष्णु की कतार में नहीं थे। उनका ब्राह्मणीकरण तो
में बाद में हिन्दू धर्म के ठेकेदारो ने कर दिया। जहां शंकर ने
विष्णु को जलील करने का प्रयास किया, वहीं विष्णु के अनुयायी
ब्राह्मणों ने शंकर के बारे में यह कह कर कि वह तो विष्णु
को मोहिनी रूप में आसक्त, कामान्ध होकर उसके पीछे-पीछे
दौड़ने लगे-उल्टा शंकर को ही जलील कर दिया गया।
इस प्रश्न का उत्तर भी हमें महाभारत में देखने को मिलता
है। महाभारत प्रथम खण्ड आदि पर्व में नागों से संबंधित एक
कथा मिलती है। हमने पहले ही बताया कि असुरों का ही
दूसरा नाम नाग था। मूलनिवासियों के समस्त पूर्वज असुर
नागवंशी हैं। महाभारत के लिखित कहानी में जिन नागों का
जिक्र आया है वे ही हमारे पूर्वज हैं। अतएव अब हम यह
जानेंगे कि हमारे पूर्वजों के सामने क्या परेशानी थीं। जिसके
कारण उन्हें आर्य ब्राह्मणों के साथ समुद्र मंथन के लिए तैयार
होना पड़ा। इस घटना का प्रारंभ इस प्रकार है- एक बार राजा
परीक्षित जंगल में शिकार खेलने गए थे, उसी जंगल में शमीक
ऋषि तपस्या कर रहे थे और समाधि में लीन थे। शिकार
करते हुए राजा परीक्षित ऋषि के पास पहुंचे, ऋषि को समाधिष्ट
देखकर राजा ने एक मरा हुआ सांप अपने धनुष से उठाकर
शमीक ऋषि के गले में डाल दिया, ऋषि का ध्यान भंग हो
गया। यह देखकर शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंग ऋषि अत्यंत क्रोधित
हो गए और उन्होंने परीक्षित को श्राप दे दिया कि मेरे पिता
के गले में सांप रखकर उनका अपमान करने वाले राजा, आज
से सात दिन बाद प्रचंड तेजस्वी पन्नगोतम तक्षक नामक नाग
मेरे कहने पर तुझे श्रमलोक पहुंचा देगा। इस प्रकार श्रृंगी ऋषि
के शाप से सुरक्षा का ध्यान रखते हुए भी राजा परीक्षित की
मृत्यु टल न सकी। परिणामस्वरूप शाप देने के सातवें दिन ही
तक्षक नाग द्वारा परीक्षित मारे गए। राजा परीक्षित का पुत्र
जनमेजय था। उसने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के
लिए तक्षक के नाग वंश को ही समाप्त करने के लिए सर्पयज्ञ
का अनुष्ठान करवाया। इस सर्पयज्ञ से नागों की रक्षा जगतकारू
के पुत्र नागवंशी राजा वासुकि के भांजे आस्तीक ने की थी।
(संदर्भ-महाभारत प्रथम खण्ड, आदि पर्व, अ. 20-25 तक,
श्लोक 12-13, पृ. 125-127)

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पर्वत उड़ना।