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वेदों का ज्ञान विज्ञान या अनार्यों का कत्लेआम,संहार ,और विध्वंस .?....
त्वमेतान्नुदतो जक्षतश्चायोधयो रजस इन्द्र पारे । अवादहो दिव आ दस्युमुच्चा प्र सुन्वतः स्तुवतः शंसमावः । । ७ । ।
हे इन्द्रदेव ! आपने रोने या हँसने वाले इन शत्रुओं को समर में मार गिराया ,दस्यु वृत्र को दिव्य लोक से लाकर अच्छी प्रकार दग्ध किया इसी प्रकार सोम रस तैयार करने वाले प्रशंसक स्तोताओं की रक्षा की .
चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमानाः । न । ॐ हिन्वानासस्तितिरुस्त इन्द्रं परि स्पशो अदधात्सूर्येण । । ८ । ।
उन वृत्रानुचरों ने पृथिवी को आच्छादित कर डाला , और सुवर्ण और मणियों से भी वे सम्पन्न हो ,परन्तु वे इन्द्रदेव को नहीं जीत सके ,इन्द्रदेव ने उन विघ्नकर्ताओं को सूर्य द्वारा तिरोहित कर डाला था .
परि यदिन्द्र रोदसी उभे अबुभोजीर्महिना विश्वतः सीम् । अमन्यमानाँ अभि मन्यमानैर्निर्बह्मभिरधमो दस्युमिन्द्र । । ९ । । ।
हे इन्द्रदेव ! चूंकि आपने महिमा - द्वारा धुलोक और पृथ्वीलोक को सम्पूर्ण रूप से वेष्टित करके सारा भोग किया ; इसलिए आपने मन्त्रार्थ - ग्रहण करने में असमर्थ यजमानों को भी रक्षा करने में समर्थ मन्त्रों द्वारा वृत्र - रूप चोर को निःसारित किया.
न ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन् ।युजं वज्र वृषभश्चक्र इन्द्रो निज्योतिषा तमसो गा अदुक्षत् ।।१० ।।
जब दिव्य लोक से जल पृथिवी पर नहीं प्राप्त हुआ और धन - प्रद भूमि को उपकारी द्रव्य - द्वारा पूर्ण नहीं किया , तब वर्षाकारी इन्द्रदेव ने अपने हाथों में वज्र उठाया और द्युतिमान् वज्र - द्वारा अन्धकाररूप मेघ में पतनशील जल का पूर्ण रूप से दोहन कर लिया.
अनु स्वधामक्षरन्नापो अस्यावर्धत मध्य आ नाव्यानाम् ।सघ्रीचीनेन मनसा तमिन्द्र ओजिष्ठेन हन्मनाहन्नभि द्यून् ।।११ ।।
प्रकृति के अनुसार जल बहने लगा ;किन्तु वृत्र नौकागम्य नदियों के बीच में बढ़ा तब इन्द्रदेव ने महाबलशाली और प्राण - संहारी आयुध - द्वारा कुछ ही दिनों में स्थिर - मना वृत्र का वध किया
न्याविध्यदलीबिशस्य दृळ्हा वि भृङ्गिणमभिनच्छुष्णमिन्द्रः ।यावत्तरो मघवन्यावदोजो वज्रेण शत्रुमवधीः पृतन्युम् ।।१२ ।।
गुफा की भूमि पर सोये हुए वृत्र की सेना को इन्द्रदेव ने विद्ध किया और श्रृंगी तथा जगच्छोषक वृत्र को विविध प्रकार से ताड़ना दी,
इन्द्रदेव आपने सम्पूर्ण वेग और बल से शत्रुसेना का संहार किया-
अभि सिध्मो अजिगादस्य शत्रून्वि तिग्मेन वृषभेणा पुरोऽभेत् ।सं वज्रणासृजद्वत्रमिन्द्रः प्र स्वां मतिमतिरच्छाशदानः ।।१३ ।।
इन्द्रदेव का कार्य -साधक वज्र शत्रु को लक्ष्य कर गिरा था,इन्द्र ने तीक्ष्ण और श्रेष्ठ आयुध -द्वारा वृत्र के नगरों को विविध प्रकार से छिन्न - भिन्न किया,अन्त में इन्द्र ने वृत्र पर वज्र द्वारा आघात किया और उसे मारकर भली - भाँति अपना उत्साह बढ़ाया.
आवः कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चकन्प्रावो युध्यन्तं वृषभं दशद्युम् ।शफच्युतो रेणुर्नक्षत _ द्यामुच्छ्वैत्रेयो नृषाह्याय तस्थौ ।।१४ ।।
हे इन्द्रदेव !आप जिस कुत्स ऋषि की स्तुति चाहते हो , उसी कुत्स की आपने रक्षा की थी आपके घोड़ों के सुमों से पतित धूलि द्युलोक तक फैल गई थी,शत्रु भय से जल में मग्न होकर भी चैत्रेय ऋषि ,मनुष्यों में अग्रणी होने की अभिलाषा से आपके अनुग्रह से बाहर निकल आये थे .
आवः शमं वृषभं तुझ्यासु क्षेत्रजेषे मघवञ्छित्र्यं गाम् ।योक चिदत्र तस्थिवांसो अक्रज्छत्रूयतामधरा वेदनाकः ।।१५ ।।।
हे इन्द्रदेव !सौम्य ,श्रेष्ठ और जल - मग्न वैयेत्र को क्षेत्र - प्राप्ति के लिए आपने बचाया था,वहाँ जलों में ठहरकर अधिक समय तक आप शत्रुओं से युद्ध करते रहे,उन शत्रुओं को जल में गिराकर अपने मार्मिक पीड़ा पहुँचाई-
( ऋग्वेद की उपरोक्त विवेचना से आपनें देखा कि आर्यो के आक्रमणकारी इन्द्र नें किस तरह विध्वंसक उत्पात मचाकर भारतीय मुलनिवाशियों में कत्लेआम कर तबाही मचाई थी,तो क्या किसी राजा की हत्या कर देना ही वेदों का ज्ञान और विज्ञान है..?..तो क्या तमाम जनता की हत्या कर देना वेदों का ज्ञान और विज्ञान है.?..या फिर जीवन रक्षक जलसंचय के बांधो का विध्वंस कर संचित जल को फैलाकर नष्ट कर देना वेदों का ज्ञान और विज्ञान है..?.अथवा शहर के शहर तबाह कर खण्डहरों में बदल देना वेदों का ज्ञान और विज्ञान है-नहीं न,तो फिर क्या है .?.जाननें के लिए बने रहिये प्लेटफार्म पर ,दरअसल यहां वेदों में कोई ज्ञान और विज्ञान नहीं बल्कि आक्रमणकारी आर्य विदेशियों द्वारा भारतीय बहुजन मुलनिवाशियों के नरसंहार और उनके विध्वंस की काली कहानी छुपी है इन आर्यों के वेदों में ....जानिए...
क्रमशः.....
ऋग्वेद-भाग-1-
प्रष्ठ -७६-७७
-----------मिशन अम्बेडकर.
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