Tuesday, 20 April 2021

स्त्री स्तिथि।

स्त्री गुण  3 :-
बनवास के दौरान सीता जी का ऋषि अनुसुइया से मिलना हुआ। अनुसुइया ने स्त्री धर्म पर बात करते हुए यह कहा कि स्त्री  स्वभाव से ही अधम है ( सहज अपावन नारी  पुरुष मनोहर निरखत नारी).

रामचरितमानस में  राम कथा कागभुशुणडि जी गरुड़ को यह कथा सुनाते है। जब सरूपनखा का वर्णन आता है तब गरुड़ को कागभुशुण्डि जी कहते है कि स्त्री मनोहर पुरुष को देख कर चाहे वह भाई हो, पिता हो या पुत्र हो विकल हो जाती है। ( भ्राता, पिता  पुत्र  उरगारी, पुरुष मनोहर निरखत नारी  )

शबरी  श्री राम से मिलने पर बताती है कि जो अधम से भी अधम होते है, स्त्री उनसे अधम होती है और मैं उनसे भी अधम गंवार हूं। ( अधम ते अधम अधम अति नारी, तिन मह मै मतिमंध अघारी ।) तब तुलसीदास जी दोहे में कहते है  कि श्री राम ने नीच जाती को, पृथ्वी पर नीच वंश में पैदा औरत को भी  मुक्त कर दिया , है पापी मन तू ऐसे प्रभु को कैसे भुला कर सुख चाहता है। 

नारद जी ने एक बार शादी का मन बनाया और विष्णु से आशीर्वाद ले कर सव्यमबर में गए। विष्णु ने नारद को बन्दर का मुंह लगा दिया था यानी शादी नहीं करने दी थी। रामचरित मानस में नारद जी श्री राम पूछते है कि तुमने मुझे शादी क्यों नहीं करने दी तब श्री राम जी कहते है कि काम क्रोध लोभ मद और उससे भयानक है माया रूपणी नारी। यह को तप नियम आदि सब समाप्त कर देती है। यह बुद्धि बल और शील को इस तरह शिकार बनाती है जैसे मछली को मछली का कांटा। स्त्री अवगुणों की जड़ सब दुखों की खान और पीड़ा देने वाली है। इसलिए तुम्हे शादी नहीं करने दी। सुन कर नारद जी के आंसू निकल आए कि प्रभु मुझे इतना प्यार करतें हैं।

राम चरित मानस में ही पार्वती जी शिव से कहती है कि मै स्त्री होने के नाते स्वभाव से ही  मूर्ख और ज्ञान हीन हूं। ( जदपी सहज जड़ नारी अवानी  )

राम चरित मानस के संबंधित पन्ने पोस्ट कर दिए गए हैं।

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स्त्रियों के गुण ( भाग 2)

युधिस्ठिर के पूछने पर भीष्म ने नारद और अप्सरा  पंच्चचूड़ा के बीच हुए संवाद के संदर्भ से स्त्रियों के गुण यू बताएं

" यही सवाल नारद ने अप्सरा पंच्चचूड़ा से पूछा परंतु पहले तो अप्सरा ने मना किया परंतु नारद ने दोबारा प्रेरित करने पर यू बोली "

" कुलीन, रूपवती और सनाथ ( अनाथ का विपरीत अर्थ  वाला शब्द ) स्त्रियां भी मर्यादा में नहीं रहती। यह स्त्रियों का दोष है "

"स्त्री से बड़ा कोई दूसरा पापी नहीं है. स्त्रियां सभी दोषों की जड़ है. अगर स्त्री को दूसरों से मिलने का अवसर मिल जाए तो यह धनवान, रूपवान, और अपने बस में चलने वाले पति की भी  प्रतीक्षा नहीं करती।"

" हम स्त्रियां पापी से पापी पुरुष को भी लाज छोड़ कर स्वीकार कर लेती हैं। जो पुरुष किसी औरत को चाहता है, उसके नजदीक पहुंचता है, थोड़ी सी भी सेवा कर देता है उसी को चाहने लगती हैं. खुद मर्यादा का ध्यान नहीं रखती . अगर कोई पुरुष ना मिले, परिजनों का डर बना रहे, पति का साथ बना रहे तो ही मर्यादा में रहती है "

" इनके लिए कोई भी पुरुष अगम्य नहीं है, किसी भी उम्र का हो, रूपवान हो या कुरूप हो बस पुरुष हो बस इतना ही समझ कर उपयोग करती है "

" स्त्री ना तो भय से, ना दया से, ना धन के लोभ से, ना जाती कुल के लिहाज से पति के पास टिकती हैं। जो जवान स्वेच्छाचारिणी स्त्रियां सुंदर लिबास व गहने पहनती है उनको देख कर कुलीन घर की औरतें भी वैसा ही बनना चाहती हैं . कुलीन घर की सम्मानित औरतें, पति की प्यारी और जिनकी सदा रखवाली भी की जाती हो तो भी घर में आने वाले अंधे, कूबड़े, गूंगे और बोने आदमी  के साथ फंस जाती हैं, अपंग, घृणित के साथ भी इनकी आसक्ति हो जाती है, इनके लिए कोई भी पुरुष अगम्य नहीं है "

" अगर पुरुष ना मिले तो ये औरतें आपस में ही कृत्रिम तरीके से ही मैथुन करती है " 

"औरतों सभांव से ही चंचल होती हैं। इनको समझना बड़ा मुश्किल है ये किसी भी पुरुष से तृप्त नहीं होती "

" किसी भी सुंदर पुरुष को देख कर इनकी योनि गीली हो जाती है . रती संभोग के सम्मुख यह बाकी किसी को ज्यादा महत्व नहीं देती "

चलता......... ( तीसरी किस्त में)

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत के संबंधित पन्ने ( अनुशासन पर्व 38 वा अध्याय ) पोस्ट कर दिए गए हैं।


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कन्‍या विवाह के सम्‍बन्‍ध में पात्र विषयक विभिन्‍न विचार
युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! जो समस्‍त धर्मों का, कुटुम्‍बीजनों का, घर का तथा देवता, पितर और अतिथियों का मूल है, उस कन्‍यादान के विषय में मुझे कुछ उपदेश कीजिये। पृथ्‍वीनाथ! सब धर्मों से बढ़कर यही चिन्‍तन करने योग्‍य धर्म माना गया है कि पात्र को कन्‍या देनी चाहिये?

भीष्‍म जी ने कहा- बेटा! सत्‍पुरुषों को चाहिये कि वे पहले वर के शील-स्‍वभाव, सदाचार, विद्या, कुल, मर्यादा और कार्यों की जाँच करें। फिर यदि वह सभी दृष्टियों से गुणवान प्रतीत हो तो उसे कन्‍या प्रदान करें। युधिष्ठिर! इस प्रकार ब्‍याहने योग्‍य वर को बुलाकर उसके साथ कन्‍या का विवाह करना उत्तम ब्राह्मणों का धर्म-ब्राह्म विवाह है। जो धन आदि के द्वारा वर पक्ष को अनुकूल करके कन्‍यादान किया जाता है, वह शिष्‍ट ब्राह्मण और क्षत्रियों का सनातन धर्म कहा जाता है। (इसी को प्राजापत्‍य विवाह कहते हैं)। युधिष्ठिर! जब कन्‍या के माता-पिता अपने पसंद किये हुए वर को छोड़कर जिसे कन्‍या पसंद करती हो तथा जो कन्‍या को चाहता हो, ऐसे वर के साथ उस कन्‍या का विवाह करते हैं, तब वेदवेत्ता पुरुष उस विवाह को गान्‍धर्व धर्म (गान्‍धर्व विवाह) कहते हैं। नरेश्‍वर! कन्‍या के बन्‍धु-बान्‍धवों को लोभ में डालकर उन्‍हें बहुत-सा धन देकर जो कन्‍या को खरीद ले जाता है, इसे मनीषी पुरुष असुरों का धर्म (आसुर विवाह) कहते हैं। तात! इसी प्रकार कन्या के रोते हुए अभिभावाकों को मारकर, उनके मस्तक काटकर रोती हुई कन्‍या को उसके घर से बलपूर्वक हर लाना राक्षसों का काम (राक्षस विवाह) कहा जाता है।

युधिष्ठिर! इन पांच (ब्राह्म, प्राजापत्‍य, गान्‍धर्व, आसुर और राक्षस) विवाहों में से पूर्वकथित तीन विवाह धर्मानुकुल हैं और शेष दो पापमय हैं। आसुर और राक्षस विवाह किसी प्रकार भी नहीं करने चाहिये।[1]

नरश्रेष्‍ठ! ब्राह्म, क्षात्र (प्राजापत्‍य) तथा गान्‍धर्व- ये तीन विवाह धर्मानुकुल बताये गये हैं। ये पृथक हों या अन्‍य विवाहों से मिश्रित, करने ही योग्‍य हैं। इसमें संशय नहीं है। ब्राह्मण के लिये तीन भार्याएँ बतायी गयी हैं (ब्राह्मण कन्‍या, क्षत्रिय कन्‍या और वैश्‍य कन्‍या), क्षत्रिय के लिये दो भार्याएँ कही जाती हैं (क्षत्रिय कन्‍या और वैश्‍य कन्‍या)। वैश्य केवल अपनी ही जाति की कन्‍या के साथ विवाह करे। इन स्त्रियों से जो संतानें उत्‍पन्‍न होती हैं, वे पिता के समान वर्ण वाली होती हैं (माताओं के कुल या वर्ण के कारण उनमें कोई तारतम्‍य नहीं होता)। ब्राह्मण की पत्नियों में ब्राह्मण कन्‍या श्रेष्‍ठ मानी जाती है, क्षत्रिय के लिये क्षत्रिय कन्‍या श्रेष्‍ठ है (वैश्‍य की तो एक ही पत्‍नी होती है; अत: वह श्रेष्‍ठ है ही)। कुछ लोगों का मत है कि रति के लिये शूद्र जाति की कन्‍या से भी विवाह किया जा सकता है; परंतु और लोग ऐसा नहीं मानते (वे शूद्र कन्‍या को त्रैवर्णिकों के लिये अग्राह्य बतलाते हैं)। श्रेष्‍ठ पुरुष ब्राह्मण का शुद्र कन्‍या के गर्भ से संतान उत्‍पन्‍न करना अच्‍छा नहीं मानते। शूद्रा के गर्भ से संतान उत्‍पन्‍न करने वाला प्रायश्चित का भागी होता है। तीस वर्ष का पुरुष दस वर्ष की कन्‍या को, जो रजस्‍वला न हुई हो, पत्‍नी रूप में प्राप्‍त करे अथवा इक्‍कीस वर्ष का पुरुष सात वर्ष की कुमारी के साथ विवाह करे.

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मेरे मन में बार बार यह सवाल आता है कि हिन्दू लड़किया ही क्यों  कथित लव जेहाद का शिकार बनती हैं, जबकि स्त्री का हिन्दू धर्म में बहुत सम्मान हैं। क्या हिन्दू धर्मशास्त्रों में लिखा है ? हां, लिखा है। 

फिर ऐसा क्यों है ? हमारे सामाजिक व्यवहार में ऐसा किस कारण से हुआ ? बताया यह भी जाता है कि इस्लाम में स्त्री की इज्जत बहुत कम है।

धरातल पर आज की स्तिथि देखिए। पुत्रवती भव। कभी पुत्रीवती भव बोलते हुए कभी सुना है। कभी किसी औरत को आप पुत्रीवती होने का आशीर्वाद दे सकते हो ? क्या लड़कियों को लड़कों के बराबर आज़ादी है ? नहीं है। मुस्लिम शादियों में लड़कियों से रजामंदी पूछी जाती है, फिर चाहे वह फर्जी दिखावे के लिए ही हो, है तो। हिंदुओं में सरेआम कहा जाता है कि लड़की को मर्जी से शादी का अधिकार नहीं है। ( बाप का घर कोई धर्मशाला नहीं है)

महाभारत के अनुशासन पर्व ( 39 वा अध्याय) में युधिष्ठिर भीष्म से औरतों की प्रवृति पर सवाल  पूछता है तो भीष्म जो जवाब देता है वह 40, 41, 42 वे अध्याय में हैं।  क्या कहा गया है,

" स्त्री से बढ़ कर कोई पपिष्ठ नहीं है। यौवन मद्य में उन्मत रहने वाली ये औरतें  प्रज्वलित अग्नि के समान हैं।"

"छुरे की धार, विष, सांप और आग एक तरफ और दूसरी तरफ जवान लड़की बराबर।"

"पहले  ब्रह्मा ने सिर्फ मनुष्यों की ( स्त्रियों की नहीं) रचना की.  वह बहुत धार्मिक थे. अपने धर्म की वजह से सभी देवत्व को प्राप्त कर सभी देवलोक चले जाते थे और यह देवताओं को मंजूर नहीं था. इसलिए ब्रह्मा ने मनुष्यों में दोष उत्पन्न करने के लिए नारी की उत्पत्ति की "

पहले तो सभी स्त्रियां पतिव्रता थी परन्तु प्रजापति ने औरतों में कामभाव उत्पन्न किया। मतवाली स्त्रियां कामलोलुप हो कर  पुरुषों को सदा बाधा देती रहती हैं "

"ब्राह्मण, गुरु, महागुरु और राजा सभी स्त्री के साथ क्षणिक संग  की वजह से निरन्तर कामजनित  यातना सहनी पढ़ती है"

"स्त्री के लिए किसी वैदिक कर्मो के करने का विधान नहीं है. यही धर्मशास्त्र की व्यवस्था है। स्त्री इन्द्रियों को काबू में नहीं कर सकती। शास्त्र ज्ञान से रहित अस्त्य की मूर्ति हैं . प्रजापति ने इनको बस सोना, खाना, पीना, अनार्यता, दुर्वचन और  काम ( सेक्स) प्रदान किया है ."

"ब्रह्मा जैसा पुरुष भी उनकी रक्षा नहीं कर सकता, फिर साधारण पुरुष की तो बात ही क्या. "

"वाणी, वध, बन्धन और अनेक प्रकार के कलेश दे कर भी स्त्री की रक्षा नहीं की का सकती क्योंकि वह असयमशील  होती है।" ( पुरुष दोषी हो ही नहीं सकता). 
चलता......... ( दूसरी किस्त में)

गीता प्रेस गोरखपुर और सनातन धर्म  प्रेस मुरादाबाद द्वारा प्रकाशित महाभारत के संबंधित पन्ने पोस्ट कर दिए गए हैं।

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हिन्दू धर्म में स्त्री की हैसियत।

सुमाली की बेटी कैकसी ( रावण की माता ) जब जवान हुई तब उसके पिता ने  कहा बेटी से कहा  कि सम्मान कि इच्छा रखने वाले सभी लोगों के यहां कन्या का होना दुख का कारण बनती है। माता के, पिता के तथा जहां कन्या दी जाती है, तीनों कूलों को कन्या संशय में डालती है। क्योंकि यह पता ही नहीं चलता कि कोन और कैसा पुरुष कन्या का वर्ण करेगा। तुम प्रजापति कुल के श्रेष्ठ पुरुष  पुलस्त्य नन्दन विश्रवा का वरन करो। बाल्मीकि रामायण  उत्तर काण्ड 9 वा सर्ग.

दिती का पुत्र मय, मय ने हेमा नाम की अप्सरा से कन्या मन्दोदरी उत्पन्न की।  पुत्री को लेकर वन में घूम रहा है। वहां रावण मिला जो अपना परिचय ऐसे देता है कि मेरे पिता विश्रवा मुनि ब्रह्मा जी की तीसरी पीढ़ी में पैदा हुए। मंदोदरी के पिता कहते है 
" मान की अभिलाषा रखने वाले  सभी लोगों के लिए कन्या का पिता होना कष्टकारी होता है क्योंकि कन्या के पिता को दूसरों के सामने झुकना पढ़ता है। कन्या सदा माता पिता के कुल को संशय में डाले रहती हैं। बाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड 12 वा सर्ग.

सीता का विवाह 6 साल की उम्र में हुआ। (बाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड 47 वा सर्ग ) सीता जी खुद बताती है कि जब मेरे पिता ने  देखा कि मेरी अवस्था विवाह के योग्य हो गई है तो वह इसके लिए बड़ी चिंता में पढ़े। जैसे कमाए हुए धन के नष्ट होने से निर्धन पुरुष दुखी होता है, उसी प्रकार मेरे पिता को मेरे विवाह कि चिंता से दुख हुआ। संसार में कन्या के पिता को चाहे वह इन्द्र के बराबर ही क्यों ना हो और वर पक्ष के समान या निम्न हैसियत के होने पर भी कन्या पक्ष को अपमान उठाना ही पढ़ता है। वह अपमान कि घड़ी समीप अाई जान कर मेरे पिता दुखी हुए।  ( बाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड 118 वा सर्ग )

बनवास के दौरान जब राम लक्ष्मण और सीता ऋषि अगस्त्य के आश्रम में पहुंचे तब ऋषि अगस्त्य बोले कि सृष्टि काल से अब तक  स्त्रियों का स्वभाव प्राय ऐसा है कि पति अगर  धन धान्य से भरपूर और सुखी है तब तक साथ और दरिद्र होते ही साथ छोड़ देती है। स्त्रियां बिजली की तरह चपल, शस्त्रों के समान तीव्र और गरुण और वायु के समान तेज गति का अनुसरण करती हैं। लेकिन सीता ऐसी नहीं है।  ( बाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड 13 वा सर्ग )

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित बाल्मीकि रामायण के संबंधित पन्ने पोस्ट कर दिए गए है।

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पर्वत उड़ना।