भारत देश किसके नाम
इस देश का नामकरण 'भरत' नाम के एक ट्राइब्स राजा के नाम । पर हुआ है। परन्तु अधिकांश लोगों में यह प्रम है कि दुष्यंत और शकुत्तला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम 'भारत' पड़ा है। ऋग्वेद में कई 'ट्राइब्स का उल्लेख आया है, जैसे-तृस्तस, तुर्वश, दुगु, या, पुरू और अनु। ऋग्वेद के समय पुरू की कई शाखाएँ हो गई थी, जिसमें भरत, तृत्सु और कुथिक का नाम प्रसिद्ध है। भरत
रावी नदी (अब पाकिस्तान में है) के तीर पर रहते थे। रावी को ही ऋगवेद में 'परूष्णी' कहा गया है। आगे चलकर इसी भरत के नाम पर हमारे देश को 'भारत भूमि' के नाम से जाना गया। भागवत पुराण के श्लोकों के आधार पर बाबासाहब डॉ.अम्बेडकर ने लिखा। है कि “भरत नरायण का ज्येष्ठ पुत्र था, जिसके नाम पर इस भूमि को 'भारत' नाम मिला।"
प्रियवंदो नाम सुतो मनोः स्वायं भुवस्य ह।
तस्याग्नी प्रस्तो नाभि =षमश्व सुतस्ततः ।।
अवतीर्ण पुत्रशतं तस्यासीद्रय पार गम् ।
तेषां वै मारतो ज्येष्ठों नरायण परायणः ।
विख्यातं वर्षयेतद्यन्नाम्ना भारत मुक्तप्रभ ।।
अर्थात मनु, जो स्वयंभू का पुत्र था। उसके पुत्र का नाम अग्नीधरा था। अग्नीधरा का पुत्र नभी था।
नभी का पुत्र ऋषभ था। उसके 100 पुत्र थे जिसमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम भरत था। इसी 'भरत' के नाम से इस सुन्दर भूमि का नाम 'भारत' जाना गया। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने 'ऋग्वैदिक आर्य' में कहा है कि "भरत कभी परूष्णी (रावी) के तट पर रहते थे, पर आज उनके नाम पर हमारा सारा देश प्रसिद्ध है। सिन्धु ने यदि भारत से बाहर हमारे देश को अपने नाम पर प्रसिद्ध किया, तो देश, में परूष्णी में तीर वाले भरतों (भरत और उनके वंशज) ने अपना नाम हमारे देश को दिया। इसी भरत के वंशज में सुदास नाम का एक पराक्रमी ,वीर और सुन्दर दान देने वाला शूद्र राजा हुआ था जिसने ब्राह्मणों के नेता वसिष्ठ को पराजित किया था।" सुदास को 'पुरू भरत' भी कहा जाता है। वसिष्ठ के समर्थक ब्राह्मणों को अपने
पराक्रम से हरा देने के कारण ब्राह्मणों ने सुदास को उस समय की प्रचलित परम्परा- यज्ञोपवीत संस्कार कराने से इनकार कर दिया। इससे सुदास की सामाजिक प्रतिष्ठा गिर गई और वे शूद्र श्रेणी में गिने जाने लगे। सुदास और ब्राह्मणों के बीच का मुद्दा था कि क्या पुरोहित के पद के लिए वह केवल ब्राह्मणों की सेवाएँ लेने को बाध्य था। प्रसिद्ध विद्ववान एस.के.विश्वास के अनुसार 'आर्यों के भारत आक्रमण के पूर्व इस देश का नाम भारतवर्ष था।' ऋग्वेद की ऋचाओं में भी आर्य ऋषिगण मूलनिवासी असुर समुदाय को भारतीय कहकर संबोधित करते हैं (ऋग्वेद, 1/14/9,3/4/8 एवं 7/2/8)।
परन्तु आर्यों को यह नाम कभी पसन्द नहीं था। आज भी एक वर्ग इस देश को 'हिन्दुस्तान ' कहना पसंद करता है, जबकी विदेशों में न तो 'भारत' और 'न ही 'हिन्दुस्तान' का नामोनिशान है; वहाँ सिर्फ 'इंडिया' ही प्रसिद्ध है। आज हमें अपने देश के प्रचीनतम नाम 'भारत' को अन्तर्राष्टीय क्षितिज पर पहचान दिलाने की आवश्यकता
है। इस प्रकार यह पता चलता है कि गौरवशाली विश्व गुरू भारत देश का नाम भारत के मूलनिवासी राजा 'भरत' के नाम पर हुआ है, जिसे आर्यों ने ईसा पूर्व 1500 में भारत आक्रमण के बाद 'आर्यावर्त' कहा। आर्यावर्त का अर्थ होता है 'आर्य' घुमक्कड़+आवर्त =आवृति(बारंबारता) अर्थात विदेशी घुमक्कड़ (यायावार या मुसाफिर)।
आर्यों की छोटी-छोटी टोलियों में भारत आना बहुत सालों तक लगातार होता रहा। विद्वानों का कहना है कि जब फारस के लोगों ने सिन्धु आस-पास के लागों को 'हिन्दू' नाम दिया तो इस नाम को विदेशी आर्य बाहाणों ने अपना लिया और इसके बाद ' सिंधी' को 'हिंदी' तथा 'सिंघस्थान' को 'हिंदुस्थान' कहा जाने लगा। इस प्रकार देश का नाम 'हिन्दुस्तान' पड़ा। भाषा उच्चारण भेद के कारण फारस निवासी सिन्धु के 'स' को 'ह' और 'ध' को 'द' उच्चारित करते थे। परन्तु निम्नलिखित प्रश्न इस दावे को खारिज कर देता है :- 1. यदि 'सिन्धु' को ही हिन्दू' कहा गया तो 'हिन्दू' शब्द का उल्लेख ऋगवेद में अवश्य होना चाहिए क्योंकि 'सिन्धु' का वर्णन ऋग्वेद में आया है। परन्तु ऋग्वेद में हिन्दू शब्द का एक बार भी उल्लेख नहीं है, क्यों? 2. सिन्धु नदी के आसपास के लोगों द्वारा इसके परिवर्तित नाम 'हिन्दू' के रूप में उच्चारित किये
तुफानों जाने के बावजूद अभी तक सिन्धु नदी का नाम अपरिवर्तित ही है, क्यों? सिन्धु नदी 'हिन्दू नदी' के रूप में क्यों नहीं प्रचलित हुआ? 3. 'सिन्धु' शब्द से बना हिन्दू' शब्द के साथ धर्म जुड़कर 'हिन्दु धर्म' बन गया, देश का नाम 'हिन्दुस्तान' हो गया परन्तु नदी के रूप में 'सिन्धु' आज भी यथावत है, ऐसा क्यों? वास्तविकता यह है कि मध्यकाल में भारत के मुसलमान शासकों ने मुसलमानों को छोड़कर शेष भारतीयों को घृणावश 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग काला, काफिर चोर,.डाकू, गुलाम आदि के अर्थ में किया। फारस के लोग 'श' अथवा 'स' वर्ण को समुचित
उच्चारण करने में समर्थ थे। इस कथन की पुष्टि में
निम्नलिखित उद्धरण पेश किया जाता है- "हिन्दू दर मुहाविरे.फारसियाँ बमानी दुन्द व रहमान मी आयद।" अर्थात फारसी भाषा के मुहावरे में 'हिन्दू' शब्द काला, काफिर, चोर और डाकू के अर्थ में आता है। आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती के प्रसिद्ध शिष्य पं.लेखराम , जो उर्दू-फारसी के विद्वान थे, ने अपनी पुस्तक "कुलियात आर्य मुसाफिर" में 'हिन्दू' का शब्दार्थ चोर,दास और काला बताया है और आर्य समाजियों को सचेत किया है कि 'हिन्दू' शब्द एक गाली है जिसे भारतीयों को मुस्लिम शासकों ने हीन और दीन समझकर दी है। बौद्ध जगत के विख्यात विद्वान महोपासक भद्रशील रावत के अनुसार सामाजिक तथाप्रयोगात्मक रूप से 'हिन्दू' शब्द का अर्थ कुछ और ही है।
वर्ण व्यवस्था के कठोर नियमों के कारण ऊँच वर्ण के लोग है। निम्न वर्ण के लोगों को कई प्रकार से अन्याय और अत्याचार का शिकार बनाते हैं जिसका अनुमोदन हिन्दू शास्त्र भी करता है। ऋग्वेद में आर्यों द्वारा अनार्यों पर लोमहर्षक हिंसा के वर्णनों से भरा पड़ा है। स्मृती ग्रन्थों में शूदातिशूद्र वर्ग के विरूद्ध क्रूरतम दंड रखो
के विधान हैं। वर्णाश्रम धर्म अथवा ब्राह्मणी धर्म को ही हिन्दू धर्म कहा जाता है। अतःरावत साहब हिन्दू शब्द का अर्थ -विन्यास करते हुए लिखते हैं- "हिन्दू वह है जो हिंसा
(हिं हिंसा) के द्वारा सामाजिक वातावरण को दूषित
(दू-दूषित) करते हैं।" निम्नलिखित संस्कृत का श्लोक इस
कथन की पुष्टि करता है,
यथा-हिंसया यो दूषयति अन्यानां मनासि जाति अहंकार वृत्तिना सततं सो हिंदू: अर्थात
'जाति-पाति के घमंड में आकंठ डूबे जो ऊँच-नीच की
भावना से ओत-प्रोत द्वारा दूसरों की भावना को सदैव चोट पहुँचाते हैं, उसे हिंदू कहते हैं।' हिन्दू की यही परिभाषा बद - व्यावहारिक और प्रयोगात्मक है। 'हिन्दू' शब्द का उपयोग परसीपोलिस, हेम्डान और नक्श-ए-रूतम् के स्तम्भों में फारसी सम्राट डरियास
द्वारा उत्कीर्ण शिलालेखों में पाया गया है। भारत का धर्म हिन्दू धर्म के रूप में भले ही प्रसिद्ध है परन्तु हिन्दू संज्ञा की उत्पत्ति संस्कृत श्रोत से नहीं हुई है; वह फारसी भाषा से उत्पन्न हुई है।
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