Friday, 2 April 2021

स्तूप।

🌷धम्म नास्तिक है और धर्म आस्तिक🌷
××××××××××××××××××××××××××
धम्म का अर्थ धर्म से उल्टा है, जैसे नास्तिक का अर्थ आस्तिक से उल्टा है। प्रचलित परिभाषा के अनुसार धम्म नास्तिक है, धर्म आस्तिक है। धम्म अपने सही अर्थ में "धर्म" का पर्यायवाची नहीं बल्कि विलोम शब्द है। बुद्ध के "धम्म" का अनुवाद रिलिजन (Religion) करना भाषा के दृष्टिकोण से गलत है। खुद अशोक ने "धम्म" का अनुवाद ग्रीक में कराया है। यह अनुवाद उसके द्विभाषीय कंधार शिलालेख पर अंकित है। उसने "धम्म" का अनुवाद ग्रीक में "युसेबेइया" कराया है, जबकि ग्रीक में "रिलिजन" को "थ्रिस्किया" कहा जाता है। "रिलिजन" में ईश्वर या देवताओं के अस्तित्व में विश्वास जरूरी होता है, जबकि "धम्म" या "युसेबेइया" में यह जरूरी नहीं है।धम्म मूलतः धर्म का विपरीतार्थक शब्द है। थ्रिस्कीया - बिना जाने मान लेना - अंधश्रद्धा - धर्म और यूसेबेइया - जानकर मानना - श्रद्धा - धम्म। इस अर्थ में भी धम्म और धर्म एक दूसरे के उलट हैं। यदि आप सोच रहे हैं कि आस्तिक का अर्थ ईश्वर में विश्वास करना और नास्तिक का अर्थ ईश्वर में विश्वास नहीं करना है तो आप भ्रम में हैं। हिंदू दर्शन में जो वेदों पर विश्वास करे, वह आस्तिक है और जो वेदों पर विश्वास नहीं करे, वह नास्तिक है। "मीमांसा" और "सांख्य" दर्शन ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, मगर वे वेदों में करते हैं, इसीलिए उन्हें आस्तिक दर्शन माना गया है। वेदों में विश्वास का मतलब, वही वर्ण व्यवस्था में विश्वास। इसीलिए जो वर्ण व्यवस्था में विश्वास करे, वह आस्तिक है और जो वर्ण व्यवस्था में विश्वास नहीं करे, वह नास्तिक है। यदि आपने ठीक से ध्यान नहीं दिए होगा तो डिक्शनरी खोलकर देखिएगा कि "सेक्युलर" का वास्तविक अर्थ "लौकिक" होता है। जो "परलोक" में विश्वास करता है, वह "सेक्युलर" नहीं हो सकता। दुनिया के सभी बड़े धर्मों में से सिर्फ बौद्ध धम्म की जीवन दृष्टि ही लौकिक है, सेक्युलर है। बाकी सब परलोक में विश्वास करते हैं, इसलिए वे सेक्युलर नहीं हो सकते।
     कौत्स वेद विरोधी थे और उन्होंने वेद को बकवास बताया है। उन्हीं के नाम पर कुत्सित विचारधारा या कुत्सित आदमी का प्रचलन है। वेदों में जो स्तूप का विवरण है, रामायण में जो चैत्यों का विवरण है, आखिर वे किस सभ्यता के प्रतीक हैं, जबकि माना जाता है कि बौद्ध सभ्यता से वैदिक सभ्यता प्राचीन है। यह तो बहुत बताया जाता है कि ऋग्वेद में गंगा का एक बार और यमुना का तीन बार वर्णन है, मगर यह बहुत कम बताया जाता है कि ऋग्वेद में स्तूप का वर्णन दो बार है। ॠग्वेद के 1/24/7 में स्तूप का वर्णन है, स्तूप में बुद्ध के वास का भी वर्णन है। बताइए कौन-सा पुराना है बुद्ध या वेद ? पुरातात्विक रूप से स्तूप सिंधु घाटी सभ्यता में मिलता है और लिखित रूप में स्तूप वैदिक साहित्य में मिलता है। सिंधु घाटी की सभ्यता प्राचीन हो चाहे वैदिक युग, स्तूप तो दोनों में है। श्रमण बनाम ब्राह्मण संस्कृति की लड़ाई शब्दों की तलवार से भी लड़ी गई है। पालि में भद्द का अर्थ आदरणीय होता है। इसीलिए गौतम बुद्ध की पत्नी को भद्द कच्चाना कहा जाता था। आप्त से, आस्था से ज्ञान प्राप्त करना वेद है। विवेक से, विवेचन - पद्धति से ज्ञान प्राप्त करना थेर है। यही थेरवाद अंग्रेजी में थ्योरी (सिद्धांत) है। इसीलिए बुद्ध की शिक्षाओं को सिद्धांत (थ्योरी) कहा जाता है। भद्द का विस्तृत रूप भदन्त और संक्षिप्त रूप भन्ते है। हिंदी का भद्दा और भोंदू इसी भद्द से बदनाम हुए शब्द हैं। जैसे मूर्ख के अर्थ में बुद्ध से बुद्धू बना, वैसे सीधा-सादा बेवकूफ के अर्थ में भद्द से भोंदू बना। सम्राट अशोक का सिंहचतुर्मुख ने सबसे पहले बौद्ध कला को प्रभावित किया और गौतम बुद्ध की चार मुख वाली मूर्ति को जन्म दिया, फिर ब्रह्मा के चार मुख की परिकल्पना की गई।
      जब सम्राट अशोक के किसी भी शिलालेख में बुद्ध को छोड़कर किसी देवी - देवता का नाम है ही नहीं तो फिर सम्राट अशोक को देवताओं के प्रिय कहने का क्या मतलब ? बुद्ध का प्रिय सम्राट अशोक कहने से संदर्भ जुड़ता है। देवानांपिय का देव/देवा संदर्भ के अनुसार बुद्ध का सूचक है। शिलालेख को आगे पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। अशोक ने कहा है कि पहले मैं (बौद्ध) उपासक था और अब बौद्ध संघ की संगति में हूँ। ऐसे में देवानांपिय का देव/देवा खुद ही बुद्ध से जुड़ जाता है। शायद इसीलिए फाहियान ने हर जगह बुद्ध को देव ही कहा है - बुद्ध देव! मगध क्षेत्र में "लिबिर लिबिर" किसी को चिढ़ाने के लिए बदनाम शब्द है। ये कौन था लिबिर ? वही, अशोक के अभिलेखों को लिखने वाले लिपिकार जिन्हें "लिबिर" कहा जाता था। जिन्हें लिखने का ज्ञान नहीं था, वे लिखने वाले को "लिबिर लिबिर" कहते थे। प्राचीन काल में "पाखंड" परिव्राजकों की एक नास्तिक विचारधारा थी। इसके अनुयायी पाखंडी कहे जाते थे। पाखंडियों का मौर्य काल में काफी सम्मान था। ये परिव्राजक लोग ईश्वर, ढोंग आदि के विरोधी थे। मगर आज पाखंड जैसे सम्मानित श्रमण संप्रदाय को बेइज्जत करने के लिए पाखंडी का अर्थ ढोंगी कर दिया गया है। समय होत बलवान। इतिहास सिर्फ वो नहीं है, जिसे शासकों ने लिखवाया है बल्कि इतिहास वो भी है जिसे शासितों ने सहा, मगर लिखा नहीं।
     डा0 राजमल बोरा (ब्राह्मण) उस खेमे के बड़े भाषा वैज्ञानिक रहे हैं जिनका साफ मानना था कि भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत नहीं है। संस्कृत का विकास प्राकृत से हुआ है इसलिए संस्कृत की पूरी शब्दावली प्राकृत का तद्भव है  या कहें संस्कृत वास्तव में प्राकृत का अपभ्रंश है। उनकी "प्राकृत का इतिहास और भूगोल" पूरी किताब इसी सिद्धांत पर आधारित है, इसे मिलिंद प्रकाशन हैदराबाद ने छापा है। हर भाषा किसी दूसरी भाषा के संपर्क में आती है तो उनके बीच शब्दों का आदान - प्रदान होता है। मध्य काल में फारसी आई तो हिंदी में फारसी के शब्द आ गए। आधुनिक काल में अंग्रेजी आई तो अंग्रेजी के शब्द हिंदी में आ गए। मगर अशोक कालीन प्राकृत में एक भी शब्द संस्कृत के नहीं आए। ऐसा हो नहीं सकता कि अशोक काल में संस्कृत मौजूद हो और संस्कृत के एक भी शब्द अशोक के अभिलेखों में न आए। पालि पहले की भाषा है। इसीलिए त्रिपिटकों, धम्मपद आदि का संस्कृत में अनुवाद हुआ। संस्कृत बाद की है, इसीलिए वेद, पुराणों आदि का पालि में अनुवाद नहीं हुआ। जैसे हिंदी साहित्य में भक्ति काल है, वैसे ही संस्कृत साहित्य में वैदिक काल है। भक्ति काल और वैदिक काल दोनों मूल रूप से साहित्य के विषय हैं, गौण रूप से इतिहास के। (Rajendra Prasad Singh, PROF. - V.K.S. University Ara, Sasaram, Bihar, India की फेसबुक वॉल का संग्रहण)

No comments:

Post a Comment

पर्वत उड़ना।