👉रामायण है ब्राह्मणों की मार्गदर्शक👈
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ब्राह्मण ग्रंथों को किसी मूलनिवासी के द्वारा सुन लेने पर उसके कानो में पिघला शीशा डालने, पढ़ लेने पर जीभ काटने और स्मरण कर लेने पर वध करने जैस नियम इसलिए बनाये गये थे ताकि मूलनिवासियो के खिलाफ उनमें सांकेतिक रूप से रचे गये षडयंत्रों का पर्दाफाश ना हो।
👉राम और रावण :- राम और रावण का उल्लेख इतिहास के पन्नों पर नहीँ बल्कि हमारे आपके बीच मिलता है। राम और रावण असल मे कोई इंसान है ही नही बल्कि सिर्फ दो अलग अलग विचारधारायें हैं। वाल्मीकि रामायण के प्रथम खण्ड के अयोध्या काण्ड में 109वें सर्ग के 34वें श्लोक में तथागत बुद्ध को चोर बताया गया है तथा ऋग्वेद में स्तूप का दो बार वर्णन है और जिसमें बुद्ध के वास का भी वर्णन है। राम, मूलनिवासियों पर आर्यो के द्वारा राज करने की विचारधारा को दर्शाता है जबकि रावण, उनके हक़ अधिकार के लिए आर्यो से लड़ाई लड़ने की विचारधारा को दर्शाता है।
👉शूर्पणखा के नाक कान काटना :- हिंदी में नाक काटना और कान काटना/कतरना दो अलग अलग मुहावरे है जिनका अर्थ क्रमशः शर्मसार करना और चालाकी करके अपना स्वार्थ सिद्ध करना या उल्लू सीधा करना है। शूर्पणखा, यहां मूलनिवासियो की बहन बेटी के तौर पर है और राम की विचारधारा आर्यो को यह आदेश देती है कि मूलनिवासियो की बहन-बेटियों से 'रेप' करके उन्हें शर्मसार करो।
👉रावण के दस सिर :- अलग अलग भाषाओं का अपना अलग अलग अंदाज़ होता है । जैसे कभी कभी अरबी में सात, सात सौ, सत्तर हज़ार और ऐसे ही हिंदी में दसों, सैकड़ों, लाखों के शब्द किसी चीज़ की संख्या न बताकर बल्कि 'बहुत से' के अर्थ में प्रयोग किये जाते हैं। इसी कारण यहां पर 'रावण के दस सिर' का अर्थ ये है कि आर्यो के खिलाफ बहुत से मूल निवासीयो का अपने हक़-अधिकार की लड़ाई के लिए एक जुट हो जाना। दूसरे शब्दों में, रावण की विचारधारा वाले लोगो का एक जुट हो जाना ही रावण के दस सिर होने को दर्शाता है।
👉रावण कौन :- जो ब्राह्मणों की सच्चाई से परिचित है, अपने पूर्वजों के बलिदानों से परिचित है और रात-दिन मूलनिवासियो को जगाने और एक जुट करने में लगा हुआ है। उसी से राम को डर है और इतना डर है कि वो सिर्फ दूर से ही तीर मरता है रावण के पास तक आने की उसकी हिम्मत नही पड़ती।
👉विभीषण कौन :- आज मूलनिवासियों में से कुछ लोग विभीषण की भूमिका निभा रहे हैं उन्हें गुलामी का एहसास ही नही हो रहा, वे अभी भी राम को मित्र और रावण को शत्रु समझ रहे हैं। रावण इसलिए नही हारा कि राम शक्तिशाली था बल्कि विभीषण के धोखे के कारण जो ज़रा सी लालच में आकर नमक हरामी कर बैठा। ऐसे विभीषण आपको बड़े स्तर से लेकर निचले स्तर तक मिलेंगे। इनसे रावण की विचारधारा को सबसे ज़्यादा खतरा है और ब्राह्मण ऐसे ही विभीषणों की तलाश में रहते हैं।
👉कुम्भकरण कौन :- हमारे समाज में कुछ लोग पढ़े लिखे होने के बावजूद निष्क्रिय है। उन्हें बस अपने खाने-पीने और सुख-चैन से रहने की ही पड़ी रहती है और समाज के हक़ की लड़ाई के लिए उनके पास समय नही होता। लेकिन ऐसे लोग जूते खाकर समझते हैं। जब युद्ध छिड़ जाएगा तब इस समाज के कुछ कुम्भकरण की भूमिका निभा रहे लोग भी मैदान में उतर आएंगे लेकिन इस सोते हुए समाज से भी रावण को बहुत नुकसान हो रहा है।
👉कुबेर कौन :- कुबेर हालांकि रावण का सौतेला भाई था मगर ये चोरी-चकारी किया करता था जिससे इसके पास ख़ज़ाने जमा हो गये थे। आज के दौर में कुबेर उनको कह सकते है जिनको मूलनिवासियो के हक़ के लिए लड़ना चाहिए था पर वो तो सिर्फ सबसे पैसा खीचने में लगे हैं तो रावण को कुबेर जैसों को हटाकर शासन अपने हाथ मे लेना ही था।
👉बालि कौन :- चूंकि बालि राम की सच्चाई जान चुका था इसलिए राम ने उसकी छुपकर हत्या कर दी और ब्राह्मणों को इसका मार्गदर्शन किया कि अगर किसी को तुम्हारी सच्चाई पता चल जाये तो उसकी छुप कर हत्या करवा दो। इसी मार्गदर्शन पर करकरे, जस्टिस लोया आदि की रहस्यमयी तरीके से हत्यायें कार्रवाई गई।
👉वानर सेना कौन :- राम की वानर सेना की तरह ही ब्राह्मणों को सेना बल बनाने का आदेश देती है, जो आपको आज समाज मे बजरंग दल, करणी सेना आदि के रूप में देखने को मिलते हैं।
👉लंका में लगी आग :- लंका में हनुमान द्वारा आग लगाय जाने से तात्पर्य ईर्ष्या की आग है सरल शब्दों में कहें तो ब्राह्मणों के आरएसएस, बजरंग दल आदि द्वारा मूलनिवासियो के बीच दंगा करवाना, जिसमे नुकसान सिर्फ और सिर्फ रावण के लोगो का अर्थात मूलनिवासियो का होता है राम की विचारधारा वाले आर्यो का नही।
👉रावण नाभि में तीर लगने से मरा :- रावण का शाब्दिक अर्थ 'दहाड़ना' या 'आवाज़ बुलंद करना' है। यहाँ इस का तात्पर्य मूलनिवासियो का अपने हक़ के लिए आर्यो के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना है या सरल शब्दों में इसको 'आंदोलन' कह सकते हैं।आर्य ये जानते है कि आंदोलन में किसी आवाज़ उठाने वाले को अगर वे मार देंगे तो उसकी जगह दूसरा खड़ा हो जायेगा, दूसरे को मार देंगे तो उसकी जगह तीसरा खड़ा हो जाएगा, इसलिए जब राम अपने बाण से रावण का एक सिर काटता है तो उसकी जगह दूसरा आ जाता, जब दूसरा सिर काटता तो तीसरा आ जाता, तो फिर रावण को मारा कैसे जाए ? अब वाल्मीकि ने ब्राह्मणों को इसका उपाय बताया कि रावण की नाभि पर वार किया जाए। मतलब ये कि मूलनिवासियो के पेट भरने के स्रोत खत्म किये जांए जब खाने को ही नहीं होगा तो मूलनिवासी अपने बच्चों को नही पढ़ा सकेंगे जिससे उनके बच्चे अपने इतिहास से परिचित नहीं हो पायेंगे और जब वे अपने इतिहास से परिचित ही नहीं हो पायेंगे तो भविष्य में कोई आंदोलन भी नहीं कर पायेंगे और अंततः बिना मारे ही रावण की मृत्यु अपने आप हो जाएगी।
वाल्मीकि ने सब कुछ लिखा लेकिन वो ये भूल गये कि आसमान के उस पार भी कोई लिख रहा है और आसमान के उस पार वाला आज "बामसेफ" ही है जो वर्तमान में हलक़ की हड्डी बन चुका है।
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श्रीराम की अयोध्या में वेश्याओं गणिकाओं का स्थान और बाल्मीकि रामायण का प्रमाण!
मोरारी बापू रामकथा के एक गंभीर अध्येता हैं। वे अगर सेक्स वर्कर्स के पुनर्वास को लेकर अयोध्या में कुछ कर रहे हैं तो उनके इरादे पर प्रश्न उठाया जा सकता है लेकिन उनके कार्यक्रम को रोकने का कोई औचित्य नहीं बनता।
कोई नगर किसी मनुष्य से बढ़कर पवित्र नहीं। यह भारत का संवैधानिक लोकतंत्र भी किसी को कहीं भी होने कुछ सार्थक करने की छूट देता है। अगर विरोध करनेवालों ने बाल्मीकि की रामायण पढ़ी होती तो शायद वे ऐसे आयोजन का दृष्टिहीन विरोध न करते।
गीध गणिका उद्धारक श्रीराम का प्रसंग प्रभुताई का एक मार्मिक आख्यान है।स्वयं श्रीराम के जीवन प्रसंगों में हर बड़े मंके पर वेश्याओं की उपस्थिति रही है। बाल्मीकि रामायण इसका बड़ा प्रमाण देता है। श्रीराम का अभिषेक होना है। मुनि वशिष्ठ प्रबंधक हैं। किसको क्या दिया जाना है कहाँ रुकना है सबकी विस्तृत सूची बना रहे हैं वे। दशरथ के आग्रह पर । उस सूची में अभिषेक को पूर्ण करने के लिए गणिकाएं विशेष उपस्थित हैं और उनके प्रसाधन साज-सिंगार के लिए महाराज दशरथ राजकोष से धन दे रहे हैं। उन गणिकाओं वेश्याओं के रुकने के लिए भवन बनाए जा रहे हैं।
संदर्भ के लिए देखें अयोध्या कांड का युवराज्य अभिषेक की तैयारी वाला सर्ग। अयोध्या कांड का तीसरा अध्याय। सत्रहवाँ श्लोक। बाल्मीकि रामायण खंड एक। पृष्ठ 185। गीताप्रेस। गोरखपुर।
"आबध्यन्तां पताकाश्च राजमार्गश्च सिच्यताम्।
सर्वे च तालापचरा गणिकाश्च स्वलंकृता:।
कक्ष्यां द्वितीयामासाद्य तिष्ठन्तु नृपवेश्मन:।"
अर्थ: नगर में सब ओर पताकाएँ फहराई जाएँ तथा राजमार्गों पर छिड़काव कराया जाए। समस्त तालजीवी (संगीत निपुण) और सुंदर वेष-भूषा से विभूषित गणिकाएँ ( वारांगनाएँ-नर्तकियाँ) राजमहल की दूसरी कक्षा (ड्योढ़ी) में पहुँचकर खड़ी रहें।
ऐसा अनुमान है कि वे गणिकाएँ अयोध्या की ही निवासिनी थीं और वे सदैव अयोध्या में वास करती रहीं। उन्हें भगाया नहीं गया। क्योंकि वे समाज का सम्मानित भाग थीं।
आगे भी चौदह साल का वनवास पूर्ण करके श्रीराम जब अयोध्या लौटते हैं तब भी अयोध्या की सब गणिकाएँ उनका स्वागत करने के लिए भरत जी द्वारा नियुक्त की जाती हैं। और वे सभी अयोध्या और राज्य की सन्मान्या नागरिक मानी जाती हैं।
श्रीराम के स्वागत में गणिकाएँ राजरानियों के साथ खड़ी होने की अधिकारिणी और पात्र हैं।
युद्ध कांड का 127 वाँ अध्याय। तीसरा और चौथा श्लोक। बाल्मीकि रामायण खंड दो। पृष्ठ 585। गीताप्रेस। गोरखपुर।
"सूता: स्तुति पुराणग्या: सर्वे वैतालिकास्तथा।
सर्वे वादित्रकुशला गणिकाश्चैव सर्वश:।"
अर्थ:
स्तुति और पुराणों के जानकार सूत, समस्त वैतालिक (भाँट) बाजे बजाने वाले कुशल। सब लोग, सभी गणिकाएँ....।
हम भूल जाते हैं कि किसी स्त्री का गणिका या वेश्या होना हमारे समाज की देन है। वे न रामयुग में मंगलग्रह से आई थीं न आज ही वे पराए देशों से बुलाई गई हैं। वे हमारी ही बेटियाँ बहनें परिचिताएँ हैं। अगर हम सामाजिक हैं तो हम ही उनके जनक हैं। वे हमारी ही खोई जानकी या सीताएँ हैं। उनका पुनर्वास एक अहम मुद्दा है। यह एक कठिन सामाजिक समस्या है और इसका निदान मोरारी बापू जैसे अनेक सत्प्रयासों से ही संभव है। लेकिन एक हठी और लगभग मतिहीन समुदाय के लिए मोरारी बापू ही नहीं श्रीराम के विचार और नीति अब निरर्थक और अमान्य हैं। आज राम भी होते तो गणिका उद्धार उनको भारी पड़ता।
राम की अयोध्या और समाज में गणिकाओं वेश्याओं वारांगनाओं नर्तकियों के लिए स्थान था लेकिन आज श्रीराम के मूढ़ पवित्र भगतों के लिए तो ये सब भक्ति में बाधक तत्व हैं। और बाधा सहना अंधभक्तों की शक्ति और सोच के बाहर है।यह बात रामकथा के अनन्य मर्मज्ञ मोरारी बापू को भी समझनी होगी।
बोधिसत्व, मुंबई
नोट: वेश्याओं के रामायण में संदर्भ के लिए दोनों संलग्न फोटो देखी जा सकती है।
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उसने अपने पिता को मूर्ख और पागल कहा। (अयोध्याकांड 53 सर्ग स्लोक 10)
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कोई समझा दो
बालकांड 14 सर्ग 🙄
घोड़े कटे गए थे यज्ञ में 🥺
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बाल्मिकी रामायण
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कौए ने सिता के स्तनो पर चोंच मारी थी ऐसा मै नही कह रहा हु वाल्मिकी रामायण मे लिखा है.
सिता हनुमान से कहती है,
छाती(स्तन) पर चोंच मारने के कारण उनके छाती(स्तन) से रक्त कि बुंदे झरने लगी थी.
कौए के रुप मे सिता के छाती(स्तन) पर चोंच मारने वाला इंद्र का पुत्र जयंत था.
(देखे : वाल्मिकी रामायण,सुंदर कांड 38)
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राम ने शुर्पणखा पर अत्याचार उसके अनार्य होने के कारण किये थे.
रामचरित्र भाग-2
अरण्यकांड के 18 वे सर्ग मे अनार्य शुर्पणखा पर हुये अत्याचार का वर्णन है.
दोनो भाई मिलकर अपने विवाहित जिवन कि गलत जानकारी देकर शुर्पणखा का मजाक उडाते है जिससे वो गुस्से मे आकर सिता पर हमला कर देती है.
फिर राम कहता है.
इन अनार्यो के साथ मजाक नही करना चाहिए(श्लोक 19)
इसको किसी अंग से हिण कर देना चाहिये(श्लोक 20)
उसके बाद लक्ष्मण ने तलवार निकाली और शुर्पणखा के नाक-कान काट दिये. (श्लोक 21)
(देखे संपुर्ण कथा अरण्यकांड सर्ग 18)
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रामायण के कुछ खतरनाक आंकडे
आओ शिवलnd पुजने वाले लिंगटो अब मै तुम्हे दिखाता हु तुम्हारे वाल्मिकी रामायण के कुछ खतरनाक आंकडे
वाल्मिकी रामायण मे लिखा है कि,
राम 11 हजार वर्षो तक अयोध्या पर राज करेगा
(बालकांड 1/ 97)
दशरथ ने 60 हजार वर्षो से ज्यादा समय तक अयोध्या पर राज किया
(बालकांड सर्ग 20, श्लोक 10,11)
शुद्र शंबुक के तपस्या से जिस ब्राह्मण बच्चे कि मृत्यू हुई थी वो 5 हजार साल का था
(उत्तरकांड सर्ग 73, श्लोक 5)
राम ने अपने धनुष्य बाण से 14000 भयंकर राक्षसो को कुछ हि मिनट मे मारा
(अरण्यकांड सर्ग 30, श्लोक 30,31)
जन्म होते हि कुंभकर्ण को बहोत भुख लगने के कारण उसने हजारो लोगों को खा लिया था
(युद्धकांड सर्ग 61, श्लोक 13)
हनुमान ने 800 मिल चौडे समुद्र को छलांग लगाकर पार किया था
(सुंदर कांड सर्ग 1)
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तो ये थे वाल्मिकी रामायण के कुछ मजेदार आंकडे
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सहायक ग्रंथ
रामायण या सितायण, सुरेंद्र अज्ञात, पृष्ठ 66,67,68
सम्यक प्रकाशन दिल्ली
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कौशल्या कि घोडे के साथ एक रात और खिर पिने से राम का जन्म
अश्वमेध यज्ञ के बार मे तो बहोत सारे लोग पहले से हि जानते है.
जिसमे राणी को मृत घोडे के साथ सेक्स करना पडता था.
ऐसा अश्वमेध यज्ञ दशरथ ने भी किया था
जिसका उल्लेख वाल्मिकी रामायण के बालकांड सर्ग 14 मे है.
देखे......
यज्ञ के लिए 300 पशु और राजा दशरथ का श्रेष्ठ घोडा बांधा था(श्लोक 32)
राणी कौशल्या ने घोडे कि प्रदिक्षीणा करके तिन वार मे घोडे को मारा(श्लोक 33)
धर्मपालन के लिए कौशल्या ने घोडे के साथ एक रात निवास किया(श्लोक 34)
उसके बाद श्लोक 36,37,38 मे घोडे कि चरबी का हवन करने का उल्लेख है.
इस यज्ञ के बाद पुत्रेष्टि यज्ञ का उल्लेख है.
जिसमे तिनो राणीया खिर पिकर गर्भवती हुई थी.
देखे....
बालकांड सर्ग 16
यज्ञ से एक विशाल पुरुष प्रकट हुआ(श्लोक 11)
प्रकट हुये पुरुष ने दशरथ से कहा....
ये देवताओ द्वारा बनायी खिर है इससे संतान प्राप्ती होगी और धन आरोग्य कि वृद्धी होगी(श्लोक 19)
ये खिर अपनी पत्नीओं को खाने के लिए दो जिससे उनकी गर्भधारना होगी(श्लोक 20)
वो खिर खाणे से तिनो राणीया गर्भवती हो गयी(श्लोक 31)
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देखे : वाल्मिकी रामायण बालकांड सर्ग 14 और 16
दोनो कथाओ के ss निचे 👇
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बाल्मीकि रामायण में दशरथ द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ किया गया था । यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य पुरुष खीर का पात्र लेे कर प्रगट हुआ था और वहीं खीर कौशल्या, सुमित्रा और कैकई ने खाई थी तब राम और उसके भाई पैदा हुए। (1) लेकिन इसी यज्ञ से एकदम पहले अश्वमेघ यज्ञ हुआ था जिसमें अश्व समेत 300 पशुओं का वध करके अग्नि भेट किया गया था। कौशल्या व बाकी की दोनों रानियों को घोड़े के साथ नियोजित किया(2 से 4) गीता प्रेस गोरखपुर ने अपनी बाल्मीकि रामायण से अर्थ बदल कर अश्व या किसी पशु की हत्या नहीं दिखाई है। (5) जबकि यही गीता प्रेस गोरखपुर महाभारत में अश्वमेघ यज्ञ में अश्व हत्या की बात छुपाने में नाकाम रही। युधिष्ठर ने भी यज्ञ किया उसमे पशु बली का बिल्कुल वहीं वर्णन है जो बाल्मीकि रामायण में है। यहां भी घोड़े के साथ द्रोपदी को बैठाया गया था। (6 और 7) लेकिन उसको गलत बता कर अपनी बाल्मीकि रामायण को बदल दिया गया है । लेकिन अभी का हमारा विषय पुत्रेष्टि यज्ञ से संतान प्राप्त करने के बारे में है।
कौशल्या द्वारा खीर खाने से राम पैदा हुए यह तो सब जानते है, टीवी सीरियल में भी था। लेकिन महाभारत के 2 महत्वपूर्ण पात्र पुत्रेष्टि यज्ञ से सीधे सीधे संतान के रूप में प्रगट हुए थे। ये थे द्रोपदी और उसका भाई धृष्टद्युम्न।
क्या यह छोटे नन्हे बालक पैदा हुए ?
नहीं।
द्रोपदी के लिए तो लिखा है कि प्रगट होते समय उरोज स्थूल और मनोहर थे । यानी स्तन भारी और मन को हर लेने वाले थे। नितम्ब ( चूतड़) मनोहर थे। और उसका भाई तो प्रगट होते ही सीधे रथ पर सवार हो गया। पढ़े आदीपर्व का 67 वा और 166 वा अध्याय। (8 से 10)
अश्वमेघ यज्ञ के समय स्त्री को घोड़े के साथ एक रात क्यों छोड़ दिया जाता है ? महाभारत खिल भाग के भविष्य पर्व के अन्तर्गत 5 वे अध्याय में राजा जनमेजय ( अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित का बेटा) द्वारा अश्वमेघ यज्ञ में जब उसकी पत्नी घोड़े के साथ थी तब जनमेजय ने देख लिया कि घोड़ा संभोग कर रहा है। पहले तो जनमेजय यज्ञ करवाने वाले पंडितों से नाराज़ हुए की घोड़ा मरा नहीं है। लेकिन उन्होंने बताया कि गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या से संभोग करने वाले इन्द्र घोड़े में
प्रविष्ट हो गए है और यह उसी काम है। तब राजा जनमेजय ने सभी ब्राह्मणों को राज्य छोड़ने का आदेश लिया, इन्द्र को श्राप दिया और अपनी पत्नी को छोड़ने का एलान किया। (11)
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09 सितंबर 2021
मार्च महीने में मैने एक पोस्ट लिखी थी जिसमे ब्राह्मण रूप धारी रावण और सीता का संवाद था और इसी संवाद में सीता ने बताया था कि उसकी शादी 6 वर्ष की उम्र में हुई थी। ब्राह्मण रूप धारी रावण के संवाद अश्लील होने के बावजूद सीता उसको अपनी शादी की बातें और ससुर की बुराई करती दिखाई देती है। यह सब बाल्मीकि रामायण का हिस्सा है। ज्यादातर धार्मिक लोगों ने सिर्फ कथा वाचकों के मुंह से सिर्फ रामायण महाभारत की कहानियां ही सुनी होती है, खुद से कभी पढ़ा नहीं होता, इसलिए रामायण महाभारत की सच्चाई से वह झल्ला जाते है और बोलने लगते है कि यह मिलावटी है, नकली है इत्यादि इत्यादि। उस पोस्ट का लिंक यह है :-
https://m.facebook.com/groups/701072587417760/permalink/829756807882670/
उसके जवाब में मैने उससे बताया था कि उस संवाद में भी अश्लीलता है और उस पर भी आर्टिकल लिखूंगा।
पोस्ट ज्यादा बड़ी ना हो और उसमें कथावाचकों की तरह फ़ालतू की बातें ना हों इसलिए बाल्मीकि रामायण की सिर्फ मतलब वाली बात ही लिखूंगा और बाल्मीकि रामायण के संबंधित पन्ने भी पोस्ट करूंगा।
सीता हनुमान की परीक्षा लेने के लिए कि वह सच में राम दूत है राम का और लक्ष्मण का हुलिया इस प्रकार पूछती है, " उनके शरीर का गठन कैसा है। लक्ष्मण जी भी भुजाएं और जंघा ( पट) कैसी हैं? जबकि कथा वाचकों के मुंह से यह सुन कर की लक्ष्मण ने राम को यह कहा था कि मै तो कभी सीता का मुंह देखा ही नहीं सिर्फ चरण ही देखे है, झूमने लगते हैं। लेकिन सीता तो लक्ष्मण के जांघ का विवरण हनुमान से सुनना चाहती हैं। और हनुमान जी सिर्फ राम का विवरण बता कर यह कहते है कि लक्ष्मण का विवरण अपने भाई राम ही की तरह हैं। सुंदर काण्ड 35 वा सर्ग बाल्मीकि रामायण।
हनुमान जी राम के हुलिए का विवरण बताते बताते हुए राम के लिंग और अंडकोष का विवरण भी देता है।
इसके बाद जब हनुमान राम को देने के लिए कुछ निशानी मांगता है तो सीता उसको एक घटना की कहानी सुनाती है जिसको सिर्फ राम ही जानते थे। कहानी यूं है :-
एक बार राम जलक्रीड़ा कर के भीगे बदन है सीता की गोद में सो गए। उसी समय एक कौआ सीता को चोंच मारने लगा। उसके भगाने के चक्कर में सीता की करघनी खिसक गई और उसको ठीक करने की कोशिश में मेरा कपड़ा खिसक गया और तभी राम की आंख खुल गई, और इस हालत में देखकर राम हस पढ़े। सीता क्रोध में होने पर भी लज्जा से घिर गई। और फिर सीता राम की गोद में सो गई। उसके बाद फिर से मेरे उठने पर मेरी गोद में सो गए। तब फिर कौए ने सीता के स्तनों पर चोंच मारी जिससे घाव का खून राम पर भी गिर गया। राम कव्वे पर कुपित हो कर उसको मारने के लिए अस्त्र का प्रहार किया। ( सुंदर काण्ड 38 वा सर्ग बाल्मीकि रामायण)
उपरोक्त कहानी सीता ने हनुमान को बताई ताकि इस घटना को हनुमान राम को सुना कर विश्वास दिला सके कि हनुमान सीता के बारे में सही ही बता रहा है।
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सीता के सुडौल स्तन और जांघें 👉 रामायण में
July 15, 2021
धर्म ग्रंथ और उसके आदर्श पात्रों बारे में आम बामन धर्मी लोगों को बस इतना ही पता है जितना उन्हें टीवी पर दिखाया गया है या किसी कथावाचक बाबा पंडेने उन्हें बताया है, और ऐसी ही सुनी सुनाई कथाओं से वो उन पात्रों का अती भावनिक होकर आदर करते हैं
लेकिन जब हम मूल ग्रंथों को खोल कर देखते है तब बहुत सारी ऐसी सच्चाई निकल कर सामने आती है जिसे आम लोगों से छुपाया गया हो
जैसे वाल्मीकि रामायण में 6 अलग अलग जगहों पर सीता के स्तन जांघें, नाभि, कमर, नितंब (गां#) का अलंकारिक वर्णन आया है
1. पहला प्रसंग सीता हरण का है
जब रावण उसके पास आता है तब कहता है
तुम्हारे दोनों स्तन पुष्ट गोलाकार, मोटे , उठे हुए, ताड़फल के आकार के है (श्लोक 19,20)
तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी में आ जाए, केश चिकने मनोहर है, दोनों स्तन परस्पर सटे हुए है
(श्लोक 22)
(अरण्य काण्ड, 46)
2. सीता हरण के बाद राम दुखी होकर कहता है
मेरी प्रिया के दोनों गोल गोल स्तन जो सदा लाल चंदन से चर्चित होने योग्य थे निश्चित की रक्त की किच में सन गए होंगे
(अरण्य काण्ड 63/8)
3. हनुमान जब सीता को खोजते खोजते लंका पोहचता है तब सीता उसे चित्रकूट पर्वत का प्रसंग बताती है
कथा के अनुसार इन्द्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप लेकर सीता के स्तन पर चोच मारी थी
उस काक(कौवे) ने अचानक आकर मेरे स्तनों पर चोंच मारी और उछल उछल कर मुझे घायल कर दिया
राम कहता है सुंदरी तेरे स्तनों कर बीच किसने प्रहार कर दिया (श्लोक 23,24,26)
देखे सम्पूर्ण कथा वाल्मीकि रामायण, सुंदर काण्ड 38
4. हनुमान लंका में आने पर सीता के सौन्दर्य का वर्णन करता है
सीता का मुख मनोहर था, दोनों स्तन गोलाकार थे, कटिभाग बहुत ही सुंदर था (श्लोक 28,29)
(कटिभाग याने नितंब/ गां#)
देखे वाल्मीकि रामायण सुंदर काण्ड 15
5. अगले प्रसंग मे है कि लंका में जहां सीता को रखा होता है वहां रावण आता है
रावण को देख कर सीता अपनी जांघों को सिकुड़ लेती है और उठे हुए दोनों स्तनों को हाथ से ढक लेती है
(सुंदर काण्ड 58/66)
6. जब सीता हरण के बाद सीता पहली बार राम लक्ष्मण को देखती है तब अपने बारे में बताती है
मेरी जांघे गोल है, दोनों स्तन परस्पर सटे हुए स्थूल है, नाभि गहरी है, पार्श्वभाग(गां#) और छाती मांसल है
(,युद्ध कांड 48/9,10,11)
इस तरह से रामायण में अलग अलग जगह पर सीता के स्तन,जांघे, नितंब, नाभि, कमर का मादक वर्णन आया है
आज के बामन धर्मी लोगो के लिए सीता भले ही आदर्श माता, आदर्श पत्नी हो लेकिन वाल्मीकि रामायण के लेखक के लिए सीता केवल एक मादक वस्तु थी
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सहायक ग्रंथ
1. वाल्मिकी रामायण, गीता प्रेस
2. वाल्मिकी रामायण, राम प्रसाद शर्मा अनुवाद
(संस्करण 1927)