Thursday, 18 March 2021

अश्लीलता।

आओ शिवलnd पूजने वाले लिंगटो में तुम्हे दिखता हूं तुम्हारे मुठ मारने वाले वैदिक ऋषि 

हस्तमैथुन करने पर या नींद में वीर्य स्खलित होने पर नीचे का मंत्र बोलकर उस वीर्य को छाती पर लगाने से वो वीर्य शरीर में वापस आ जाता है 

(, बृहदारण्यक उपनिषद् 6-4-5) 

इससे साबित होता है कि वैदिक ऋषियों को हस्तमैथुन करने की आदत थी और वो हस्तमैथुन करके आपने वीर्य को छाती पर भी लगाते थे



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मेरी यह पोस्ट मत्स्य पुराण की कथा पर आधारित है, जिसके पन्ने नीचे पोस्ट कर दिए है। , यह किसी को अपमानित करने के लिए नहीं है, बल्कि पुराण कथा की सच्चाई से अवगत कराने  के लिए है। यह मेरे माता पिता के धर्म  का भी हिस्सा है। 

राम की पत्नी सीता का अपहरण हुआ, लेकिन सीता पवित्र बनी रही। लेकिन मत्स्य पुराण में कथा है कि कृष्ण की 16000 पत्नियों का ना सिर्फ अपहरण हुआ बल्कि बार बार अपहरणकर्ताओं द्वारा संभोग भी किया गया। 

ऐसा नारद और स्वय कृष्ण के शाप के कारण हुआ ।

दुखी हुई इन पत्नियों ने ऋषि दाल्भ्य के सामने विलाप किया तब ऋषि दाल्भ्य ने इस शाप से छुटकारे का को उपाय बताया वह भी बड़ा मजेदार है। यह उपाय इन्द्र ने बताया था, ऐसा लिखा गया है।

बताया गया है कि देवो ने देत्यों, असुरों, राक्षसों को जब मार दिया तब उनकी पत्नियों को वेश्यवृती का धंधा दे दिया और धंधे के लिए राजधानी और मन्दिरों में ही स्थान दे दिया ।

इन्द्र ने उन स्त्रियों को इस तरह कहा, "अब तुम वेश्यवृति स्वीकार करो, राजधानी या देवमंदिरों में निवास करें। राजा और राजा के पुत्रों को अपना पति स्वीकार करो। जो भी पैसे देकर आप के साथ संभोग करना चाहे उस का सम्मान करो। दरिद्र का भी सम्मान करो। ब्राह्मणों को गाय, सोना, अन्न वगेरह दान करो।

व्रत के लिए भी बताया जो इस प्रकार है, व्रत वाले दिन ऐसी जड़ी बूटियों से युक्त पानी से नहाना है जिससे सेक्स बड़ जाए। फिर भगवान की मूर्ति के पैर, ऐड़ी, लिंग, कटी प्रदेश से लेकर स्तनों से भी आगे सभी अंगो की क्रमवार पूजा करके ब्राह्मण को खाना खिलाना है और फिर ब्राह्मण को कामदेव समझ कर उसके साथ रती क्रिया करनी है। सोने चांदी की वस्तुएं भेट करनी है और प्रत्येक रविवार को ब्राह्मण घर पर आएगा उसके साथ संभोग करके ही फिर किसी और के साथ संभोग करना है।

मेरी भाषा से अश्लीलता लग सकती है इसलिए पुराण की भाषा में ही लिखता हूं, जिससे आप के मन में शायद श्रद्धा पैदा हो।   " उसके बाद जब कोई ब्राह्मण रती के लिए रविवार को घर आए तो उस समय उसकी भी आज्ञा माननी चाहिए, और पर्याप्त आदर करना चाहिए। इस प्रकार 13 महीने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करना चाहिए। उसके जाने के बाद अन्य पुरुषों का सेवन करना चाहिए। ब्राह्मण की आज्ञा से अगर कोई रूपवान पुरुष घर आए  उसकी भी अपने कल्याण में अगर कोई विघ्न ना हो सेवा करनी चाहिए। इस तरह दैव तथा मानव का यह अति प्रिय कर्म जो गर्भ की संभूति करने वाला है अनुरागपूर्वक करते हुए 58 बार यह व्रत करें।

दोबारा लिख रहा हूं कि इन्द्र ने इन दानवों, असुरों, दैत्यों को पत्नियों को क्या कहा, " इस तरह दैव और मानवों का यह अति प्रिय कर्म ( संभोग) को गर्भ की संभूति करने वाला है, अनुरागपुरवक 58 बार ( 58 सप्ताह ) करें। यानी ब्राह्मणों को संतुष्ट करती रहें।

अगले जनम में कैसे अच्छे कुल में जन्म लेगी यही रास्ता दाल्भ्य ऋषि ने कृष्ण की 16000 रानियों को बताया।
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ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखंड अध्याय 15 मे राधा कृष्ण के सेक्स का विस्तार से उल्लेख है 

पोस्ट मे हम कुछ हि श्लोको का उल्लेख करेंगे जिनको पुरा वर्णन पढना है वो दुसरा स्क्रिनशाॅट देखे 

कृष्ण ने हाथ से पकडकर राधा को बगल मे ले लिया. उसके कपडे ढिले कर दिये और चतुर्विध चुंबन किया(श्लोक 148) 

चुमने से होठों का रंग तथा लिपटने से पत्रावली नष्ट हो गयी (श्लोक 149) 

नये समागम से राधा रोमांचित हो गयी(श्लोक 151) 

कामशास्त्र को जानने वाले श्रीकृष्ण ने 8 प्रकार से भोग किया(152) 

कामयुद्ध कि समाप्ती पर तिरछी नजर वाली राधा मुस्कराने लगी(श्लोक 159) 

कृष्णजी युवावस्था छोड कर फिर से बालक रुप हो गये. 

वह राधा रात को हमेशा कृष्ण से भोग करती रही(श्लोक 178)


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******** इंद्र और इंद्राणी की बातचीत किस व्यक्ति को अच्छे तरीके से संभोग किया जा सकता है (ऋग्वेद में) इंद्राणी कहती है=जिसका पुरुष (लिंग) जांघ में लटका है वो व्यक्ति / पुरुष संभोग नहीं कर पा रहा है । वही व्यक्ति / पुरुष मिथुन (संभोग) करने में सक्षम होता है जिसके बालों वाला पुरुष (संभोग) सोते समय विस्तारक होता है । इंद्र कहते हैं = वह पुरुष / पुरुष मिथुन (संभोग) नहीं कर पा रहा है जिसका बाल पुरुष जैविक (लिंग) हो सोते समय व्यापक / उत्साहित हो जाता है, वही पुरुष / पुरुष संभोग करने में सक्षम है जिसका पुरुष (लिंग) जांघ में लटका हुआ है । (ऋग्वेद 10-86-16,17) देख लो, ऋग्वेद, गंगा सहाय शर्मा, पृष्ठ 1715 ऋग्वेद, आचार्य रामगोविन्द त्रिवेदी, पृष्ठ 1348

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पर्वत उड़ना।