Friday, 19 March 2021

बाइबल

 कहा छुपकर बैठे हो मसीहि पादरियों


आप सब ने ईसाइयों द्वारा आयोजित चंगाई सभा या उन चंगाई सभाओं का वीडियो सोसियल मीडिया में जरूर देखा होगा। ईसाई मिसनरी, मसीहि, बिसप, पादरी इन चंगाई सभाओं में गावठी, गरीब, अनपढ़, बीमार दीखने वाले लोगो की अति गम्भीर बीमारियों, लूले, लंगड़े, कोढ़ी, भूत-पिशाच के शाये वाले आदि को येशु के नाम की प्रार्थना करने मात्र से ठीक कर देते है। काफी वीडियो में तो ये ईसाई पादरी मेरे हुए इंसानों को भी जिंदा कर देते है। इन पादरियों ने इस तरह के रोग ठीक करने की कोई ट्रेनिंग नही ली होती, न ये डॉक्टर होते है। इनका मूल "बाइबल" है। ईसाई बाइबल को ईश्वरीय ग्रंथ मानते है। बाइबल का एक एक वचन ईश्वर के वचन है। इसमें जो लिखा वह सत्य है इसे कोई मिटा नही सकता। इसी "बाइबल की बकवास" को लेकर ईसाई मिसनरी चंगाई सभाओं का आयोजन करते है और बहोत बड़े षड्यंत्र के तहत गैर ईसाइयों को ईसाइयत में कन्वर्ट करते है।

चंगाई सभाओं का सच इसी बाइबल में "योहन्ना" के १४ वे अध्याय के वचन नम्बर १२ से १४ तक मे दिया है। इसमें साफ़ साफ़ येशु कह रहा है कि "में सच सच कह रहा हु, जो मुझपर ईमान रखेगा यानी जो मुजे सच्चा मसीही परमेश्वर का एक लौता पुत्र मानेगा, वह में जो कार्य करता हु, जैसे लूले लंगड़े को ठीक करना, अंधे को आंख देना, कोढ़ी को छूकर ठीक कर देना, स्त्रीरोग को ठीक कर देना, मुर्दो को जिंदा कर देना ये सब कार्य तुंम भी करोगे। इतना ही नही मुझसे भी बड़े कार्य करोगे। अगर मेरा नाम लेकर मुझसे जो चाहोगे में तुम्हे दूंगा"।

बाइबल के इसी वचनो के आधार पर ईसाई मिशनरी, पादरी वगैरा चंगाई सभाओं में लोगो की बीमारी ठीक करते है। आज दुनिया भर में चीनी कोरोना वायरस से लाखो लोग संक्रमित होकर तड़प रहे है। हज़ारो लोग मर चुके है। चीनी वायरस का प्रकोप अपने गर्दिश पर है। ऐसी परिस्थिति में आज ऐसे पादरी जो येशु के नाम की प्रार्थना करने भर से लोगो को गंभीर बीमारियों से मुक्त कर देते है। मुर्दो को फिर से जिंदा कर देते है। जिनकी जरूरत आज सबसे ज्यादा दुनिया को हे, तब सब पादरी किसी बिल में छुपकर बैठ गए है। ईसाई धर्म मे जिसे सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त है वैसे पॉप भी कमरों में छुपकर बैठे है। किसीको मिलने को तैयार नही। जो कोई भी ऐसे ईसाई मिसनरी, पादरियों को जानते हो, या उनको कही भी देखो तब उनको पकड़कर बाइबल के यह वचन दिखाइए और कहिए येशु से प्रार्थना करो दुनिया मे चाइनीज़ वायरस से संक्रमित मरीज जो तड़प रहे है उनको ठीक करें और वायरस को येशु अपने मे समा ले। बस और कुछ हमे नही चाहिये। आमीन..


 
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1 जनवरी अंग्रेजी नववर्ष
आज भारत सहित पूरी दुनिया मे धूमधाम से मनाया जाता है। भारत में जो लोग 1 जनवरी को नया साल धामधुम से मनाते है उनको ख़ुदको नववर्ष के पीछे का कारण नही पता होता है। वह दूसरों का देख अंधे की पूछ पकड़कर पीछे पीछे चलते रहते है। 1 जनवरी नववर्ष के साथ हिन्दुओ या भारतीयों का या हमारी संस्कृति का कोई लेना देना नही है, ना ये साइंटिफिक है। ईसाई और दुनिया के सभी ईसाई देशों में 1 जनवरी को नववर्ष मनाने के पीछे का कारण ईसा मसीह का ख़तना है। आज ही के दिन ईसा मसीह का ख़तना हुआ था, इसी खुशी में ईसाई आज का दिन धूमधाम से मनाते है।

25 दिसंबर ईसा मसीह का जन्मदिन होता है। बीलकुल उससे 8वे दिन यानी 1 जनवरी ईसा मसीह जब 8 दिन का होता है उसका ख़तना कर दिया जाता है। इस बात का ज़िक्र बाइबल के नए नियम में भी मिलता है। लुका की इंजील के अध्याय 2 के वचन नम्बर 21 में। बाइबल का स्क्रीनशॉट पोस्ट में दिया है आप पढ़ सकते है।

अब आप खुद सोचो आज के दिन ईसा का ख़तना दिवस है, जिसे ईसाई धामधुम से मनाते है, उसका हिन्दू, भारतीयों का, हमारी संस्कृति का लेना देना? एक नवजात बच्चा जो अभी आठ दिन का ही हुआ है किसी औजार से उसके शिश्न का आगे का भाग काट दिया जाता है यह आज की तारीख में साइंटिफिक है? गूगल सर्च करे आपको सैकड़ो रिपोर्ट मिल जाएगी नवजात बच्चे के खतने से हज़ारों बच्चों की मौत हो गई है। इसी दिन को अंग्रेज नववर्ष के रूप में हमारे ऊपर थोपकर चले गए है।
 

 
**** ओल्ड टेस्टामेंट ( पुरानी बाइबिल) की तुलना में वेदों का ऐतिहासिक महत्व बहुत कम है क्यो की बाइबिल को उन लोगो ने सदा ही एक इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया जो अपनी उस विशेष भूमि से संपर्क बनाए हुए थे जो उनकी मूल थी। फिलिस्तीन का पुरातात्विक अध्ययन भारत की अपेक्षा कंही अधिक उन्नत और अधिक वैज्ञानिक ढंग से है जिससे बाईबिल की अनेक घटनाओं की पर्याप्त पुष्टि होती है। दूसरी ओर आर्य हमेशा ही स्थान बदलते रहते थें । जंहा वे जाते वंहा की नदियों और पर्वतों के नाम अक्सर वे अपनी यादों में बसे नामो के आधार पर रख लेते थे। वेदों में वर्णित आर्यो की पवित्र नदी सरस्वती कभी अफगानिस्तान की हेलमंद नदी थी बाद में जब आर्य आगे बढ़ें तो फिर पूर्वी पंजाब की किसी नदी को सरस्वती कहा जो ऋग्वेद लिखे जाने के बाद ( संभवतः दूसरी सदी ) सूख गई। सरस्वती नाम का भेद अब्राहम की पत्नी सारा के सम्बन्ध में छुपा है। कोसंबी के अनुसार भारतीय आर्यो के भाई बन्धु ईरान से थें, ईरान और मीडिया के लोग भी संस्कृत से मिलती जुलती भाषा बोलते थे। ईसा पूर्व 1000 के आस पास के मितन्नी अभिलेखों से पता चलता है कि भारतीय आर्य देवताओं उपासना करने वाले लोग ईरान की उरमिया झील के समीप बसे हुए थे। वेदों में वर्णित अप्सरा उर्वशी उर की ही रहने वाली थी।उर का आर्य ग्रन्थो में विशेष स्थान है। सन 1930 की खुदाई में उर में आर्यो के मंदिरों के समान वंहा ढांचे मिले है जो संभवत: सूर्य /अग्नि मंदिर रहे होंगे। ईरान में इन्ही इंद्र ,वरुण ,मित्र आदि देवताओं की उपासना होती थी । किन्तु ईसा पूर्व 6-7 सदी में गिडियानो और मिडियानो का जबरदस्त युद्ध हुआ जिसमें ज़रथुश्त (Zoroaster) ने इन्हें वंहा से बहिष्कृत कर दिया ,उसके बाद मिडियानो(आर्यो) का पलायन भारत की तरफ हुआ । -संजय

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पर्वत उड़ना।