पुराणों
मे कई जगह ऐसा लिखा है कि पौराणिक-काल मे ऋषि-मुनि इतने सामर्थ्यवान होते
थे कि अपने तपोबल से कोई भी असाध्य-कार्य क्षणमात्र मे कर डालते थे।
पुराण
कहते हैं कि प्राचीन ऋषियों ने संकल्पमात्र से ऐसे-ऐसे कार्य कर दिये जो
सम्भव ही नही थे। जैसे कि माण्डव ऋषि का सशरीर यमलोक जाना और अगस्त्य ऋषि
पूरा समुद्र पी जाना, इत्यादि!
वैसे इन कथाओं को सुनने
के बाद साधारण-बुद्धि से भी यही लगता है कि ये बातें झूठी हैं। अब मै आपको
मनुस्मृति से कुछ ऐसे श्लोक दे रहा हूँ जो यह प्रमाणित कर देंगी कि
ऋषि-मुनि कोई भी चमत्कार करने मे समर्थ नही थे।
मनुस्मृति काफी प्राचीन ग्रंथ है इसमे कोई शक नही है। मनुस्मृति मे कहीं भी
शिव और विष्णु तक का उल्लेख नही है। मतलब यह ग्रंथ इतना तो प्राचीन है ही
कि शिव और विष्णु वाली कथाऐं इस ग्रंथ के बाद हिन्दू समाज आयी। इसी
मनुस्मृति के दसवें अध्याय मे मनु ने यह बताने का प्रयास किया है कि मांस
खाना विषम परिस्थिति मे पापाचार नही है।
मनु ने लिखा है
कि यदि आप भूख से व्याकुल हो, और आपके पास खाने की कोई दूसरी सामाग्री नही
है तो आप मांस खा सकते हो, इससे तनिक भी पाप नही लगेगा! अपनी इसी बात को
प्रमाणित करने के लिये मनु ने कुछ उदाहरण भी दिये हैं, जिसमे उन्होने बताया
है कि प्राचीनकाल मे किस तरह बड़े-बड़े ऋषि भी भूख से व्याकुल होने के बाद
कुत्ते तक का मांस खाने के लिये विवश हो गये थे, लेकिन फिर भी उन्हे पाप
नही लगा।
इसी कड़ी मे मनु ने मनुस्मृति-10/105-108 (चित्र देखें) मे
लिखा है कि पूर्वकाल मे ऋषि विश्वामित्र और वामदेव ने भूख से अपने प्राणों
की रक्षा करने के लिये कुत्ते के भांस का भक्षण किया, फिर भी वे पापरहित
बने रहे।
अब मेरा सवाल यह है कि यदि ऋषि-मुनि अपने
तपोबल से कुछ भी करने मे समर्थ थे तो क्या इसी तपोबल से वे अपने लिये
स्वादिष्ट भोजन या फल की व्यवस्था नही कर पाये? तब उनका तपोबल कहाँ चला गया
था जब वे प्राणरक्षा हेतु कुत्ते जैसे जीव का मांसाहार करने को विवश हुये?
वामदेव
के चमत्कारों को तो सभी जानते हैं, ये दशरथ के पूज्य भी थे। विश्वामित्र
के बारे मे जितना कहा जाये कम ही होगा, इन्होने तो अपने पतोबल से राजा
त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। ऐसे महातपस्वी भी अपने लिये न तो
भोजन एकत्र कर पाये और न ही अपने तप से अपनी भूख को नियंत्रित कर पाये।
बात
स्पष्ट है, ये तपोबल वाली सारी कहाँनिया भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाने
के लिये गढ़ी गयी हैं, अन्यथा वेद-वेदान्त के ज्ञाता और इतने बड़े तपस्वी
ऋषियों ने कुत्ते का मांस खाना क्यों स्वीकार किया?
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पिछले एक अध्याय में इस प्रश्न का उत्तर दिया जा चुका है कि अस्पृश्य सड़ा - गला मांस क्यों खाते हैं ? यदि ताजा मांस उपलब्ध हो तो कोई भी सड़ा - गला मांस खाना पसंद नहीं करेगा । अस्पृश्य सड़ा - गला मांस खाकर जिंदा रहते हैं , इसका कारण यह नहीं है कि वे उससे पसंद करते हैं । वे सड़ा - गला मांस इसलिए खाते हैं कि उनके पास जिंदा रहने के लिए और कोई साधन नहीं है । अस्पृश्यता के कारण उनके पास जीवन - निर्वाह बाबासाहेब डॉ . अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय का अन्य कोई उपाय नहीं होता । जो लोग इसे अनुभव करते हैं , उन्हें इस बात को समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी । सभी धंधों के द्वार उनके लिए बंद होते हैं । उनके पास न तो भूमि होती है , जिनकी पैदावार पर वे जिंदा रहे सकें । वे कोई व्यापार भी नहीं कर सकते । अतः उनके जीवन का मुख्य आधार वह भोजन होता है , जो वे गांव वालों से एकत्र करते हैं । इसके अलावा तो सड़ा - गला मांस ही उनके लिए शेष रहता है । सड़े - गले मांस के अभाव में तो वस्तुतः भूखे ही मर जाएंगे । अतः यह स्पष्ट है कि दोष अस्पृश्यों का नहीं है । यदि वे सड़ा - गला मांस खाते हैं , तो उसका कारण यह है कि हिंदुओं ने रोजी - रोटी कमाने का कोई सम्मानजनक रास्ता उनके लिए छोड़ा ही नहीं है ।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, संपूर्ण वाड़मय हिंदी, खंड 10, पृष्ठ 151,152


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त्रिपीठक में चिकित्सा पद्धति की आलोचना करने वालों को जवाब
त्रिपिठक में 1-2 समाप्त चिकित्सा पद्धतियों की आलोचना करते कई हिंदुत्ववादी (ब्राह्मणवादी) नजर आ रहे हैं
लेकिन चरक के संहिताओं में और भी अजीब चिकित्सा पद्धति देखी जा रही है, संहिताओं के संहिता
वह इस प्रकार है
मोर, तीतर, कोंबडा, हंस, डुक्कर, उंट, गाढव, गाय, म्हैस यांचं मांस यक्ष्मा रोगी (क्षय रोगी) साठी उत्तम आहे
(चरक कोड, मेडिकल प्लेस 8/158)
घोड़ा, गाय, गधा, ऊंट, बकरी, भेड़ गांव के जानवर हैं ।
उनका मांस दुष्ट हत्यारा है, शरीर में वृद्धि, शक्ति बढ़ाने वाला है ।
(सुश्रुत कोड, सूत्र स्टेशन 46/85,86)
गाय का मांस सांस रोग, खांसी जुकाम, बुखार, भूख को धीमा करने के लिए फायदेमंद है ।
(चरक कोड, सूत्र स्टेशन 27/79,80)
पोटांच्या आजारासाठी जंगली मृग, पक्षी यांचं मांस खावे
(चरक कोड, मेडिकल प्लेस 13/97,98)
बकरी अंडकोष खाने वाला 100 महिलाओं के साथ यौन संबंध बना सकता है
(सुश्रुत कोड, मेडिकल प्लेस 26/20)
काले साँप को जला कर उसकी राख को बहे हुए तेल में मिलाकर लेप लगाने से फूलगोभी रोग खत्म होते हैं (त्वचा पर सफेद दाग)
(सुश्रुत कोड, मेडिकल प्लेस 9/17)
(क्या बालू की भित पर खड़ा है हिन्दू धर्म, सुरेंद्र कुमार शर्मा 'अज्ञात' पृष्ठ 770 पासुन पुढे)






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