यदि क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र ब्राह्मण बनना चाहे तो क्या ऐसा हो सकता है ? ऐसा सवाल युधिष्ठर ने भीष्म से पूछा। भीष्म ने मतंग ऋषि की कथा सुना कर उदाहरण से समझाया कि ऐसा संभव ही नहीं है। पुरुषार्थ से दैव का विधान नहीं बदल सकता अर्थात वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित नही जनम आधारित है।
रथ और वह भी तीव्रगामी, खींचने वाले घोड़े नहीं गधियां जी हां गधे। सिर्फ इसी प्रकरण को हरी रंग से underline कर दिया है बाकी सब को लाल रंग से ।
यह कथा है महाभारत के अनुशासन पर्व के 27 - 28 व 29 वे अध्याय में।
मतंग ब्राह्मण उचित काम यानी यजमानों के यज्ञ करवाने का काम करता ही था। पिता ने यज्ञ करवाने के लिए भेजा।
मतंग बैठ गया गधों द्वारा खींचे जाने वाले तीव्रगामी रथ पर। रथ को खींचने वाले छोटी उम्र के गधे को उसकी माता के सम्मुख ही चाबुक से मार कर नाक में घाव कर दिया। उसकी माता बोली यह ब्राह्मण नहीं चांडाल है। मतंग से गधी से पूछा कि मैं तो ब्राह्मण हूं फिर मुझे चांडाल क्यों बोला ? मेरी माता किससे कलंकित हुई है ? ( इसका अर्थ हुआ उसको अपने पिता पर तो कोई शक नहीं, माता पर ही शक हुआ ) गधी ने बताया कि सेक्स की मारी ( यौवन के मद से मतवाली हुई ) ब्राह्मणी के पेट से तू नाई का बेटा है।
मतंग वापिस घर आ गया, यज्ञ करवाने नहीं गया। पिता ने कारण पूछा। मतंग अपने पिता से बोला कि जिसे ऐसी माता मिली हो वह कुशल हो ही नहीं सकता। बोला में तप करूंगा ब्राह्मण बनने के लिए और लगा तप करने।
इन्द्र ने खुश हो कर उससे कहा कि कुछ भी वर मांग लो। मतंग ने ब्राह्मणत्व मांगा इन्द्र बिगड़ गया, बोला तू मूर्ख है। ब्राह्मणत्व मिल ही नहीं सकता, असंभव है। तू ऐसे ही मर जाएगा पर ब्राह्मणत्व नहीं मिल सकता।
तब 100 साल फिर कठोर तप किया। दोबारा इन्द्र ने फिर समझाया कि ब्राह्मणत्व मिलना असंभव है।
आगे पढ़ने से पता चलता है कि ब्राह्मण भी कई प्रकार के है और उनको भी पूर्व जनम के कर्मो के आधार पर ही प्राप्त होता है।
सबसे निम्न कोटि का ब्राह्मण नीच कर्म करने वाला ब्राह्मण, उससे ऊपर क्षत्रिय उचित काम करने वाला, उससे ऊपर गायत्री मंत्र पाठ करने वाला, उससे ऊपर वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण।
सबसे पहले पशु योनि से शूद्र जाती में, फिर बहुत योनियों के बाद 30 गुना समय बाद वैश्य वर्ण में, फिर 60 गुना समय के बाद क्षत्रिय में, फिर पहले के 60 गुना समय बाद नीच कर्म करने ब्राह्मण के घर , इस तरह फिर ऊपर वाले ब्राह्मण के घर जन्म होता है। ऐसा विधान बनाया हुआ है ईश्वर का और बता रहा है इन्द्र।
एक हजार साल फिर तप किया। फिर दोबारा 1000 वर्ष तप किया। पहले और फिर दोबारा इन्द्र ने समझाया। फिर 100 साल पैर के अंगूठे पर खड़े हो कर तप किया।
पर इन्द्र ने उसको ब्राह्मणत्व प्रदान नहीं किया।
यानी जितनी मरजी कोशिश कर लो, यज्ञ करवाने के कर्म भी करने लग जाओ ब्राह्मण नहीं बन सकता। ब्राह्मण वहीं जिसने ब्राह्मण कुल में जन्म लिया हो। ब्राह्मण तो क्या शूद्र या चांडाल वैश्य या क्षत्रिय भी नहीं बन सकता। किसी के बनाने से, काम के आधार पर नहीं बनता, जनम से बनता है।
गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत के पन्ने नीचे पोस्ट है। कुछ पंडित यह बोल कर निकल लेते है कि यह महाभारत मिलावटी है। असली पूछो तो उनको खुद नहीं पता। मेरा कहना यह है कि अगर अलग तरह की दो या तीन महाभारत हों तो असली का निर्धारण कैसे होगा ? गीता प्रेस ने भी सच्चाई को छुपाने की पूरी कोशिश की हुई है। संस्कृत से हिंदी अनुवाद बदल दिय गए हैं। 7200 पन्नो से भी बड़ी रामायण है। खुद भी ब्राह्मण इसको पढ़ते नहीं है। बस उनका विश्वास बना हुआ है कि पवित्र बातें ही लिखी हुई है। इसीलिए जब इसको अब देखेंगे तो मिलावटी बोलना ही पढ़ता है उनको।
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आरक्षण को भीख बताने वाले विदेशी भिखारियों को मुंहतोड़ जवाब Part 2
वानप्रस्थियों की भिक्षा.
वानप्रस्थी के लिए भी भिक्षा मांग कर खाने का विधान है. मनुस्मृति में भिक्षा संबंधी विविध आदेश देते हुए कहा गया है:
तापसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्षमाहरेत्.
गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु..
ग्रामादाहृत्य वाश्नीयादष्टौ ग्रासान् वने वसन्.
प्रतिगृह्य पुटेनैव पाणिना शकलेन वा..
-मनु. 6/27-28
अर्थात जीवननिर्वाह के लिए वानप्रस्थी अन्य वानप्रस्थियों से भिक्षा मांगे. (एक भिखारी दूसरे से मांगे), उन का अभाव होने पर वन में रहने वाले दूसरे गृहस्थों से भिक्षा मांग कर खाए. वनवासी गृहस्थों के अभाव में ग्राम से पत्रों या सकोरों या हाथ में भिक्षा ला कर खाए. वानप्रस्थ के बाद संन्यास संस्कार का क्रम आता है. यह अंतिम संस्कार से पहला संस्कार है. संन्यासियों का हिंदू धर्म में बहुत आदरणीय स्थान है. इसी से इस संस्कार
की महत्ता स्पष्ट है. मनु का कथन है:
वनेषु च विहत्यैवं तृतीयं भागमायुषः.
चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा संगान् परिव्रजेत्..
-मनु. 6/33
अर्थात अपनी उमर के तीसरे भाग को इस प्रकार वानप्रस्थ आश्रम में बिता कर चौथे भाग में सब विषयों को त्याग कर संन्यास ग्रहण करे. शंख-रचित स्मृति में कहा गया है:
'वनवासादूर्ध्वं शान्तस्य परिगतवयसः परिव्राज्यम्.'
अर्थात वानप्रस्थ के बाद बुढ़ापे में शांतचित्त हो कर संन्यास ग्रहण करना चाहिए. संन्यासियों की भिक्षा
संन्यासी (बूढ़ों) के लिए भी भिक्षा मांग कर खाने का विधान है-चरेद् भैक्षम्
(मनु. 6/55). मनु ने संन्यासी को भिक्षा मांगने का नुस्खा बताते हुए लिखा है:
विधूमे सन्नमुशले व्यंगारे भुक्तवज्जने.
वृत्ते शरावसंपाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत्
-मनु. 6/56
अर्थात घरों में जब खाना पकाने के कारण पैदा हुआ धुआं समाप्त हो जाए, जब धान आदि कूटते समय होने वाला मूसल का शब्द बंद हो जाए, जब आग बुझ जाए, जब सब लोग भोजन कर चुके हों, जब खाने के पात्र-दोने, पत्तल आदि बाहर फेंक दिए गए हों, तब प्रतिदिन संन्यासी भिक्षा मांगने के लिए जाए. एक अन्य धर्मशास्त्रीय कथन है कि संन्यासी के हाथ पर पहले जल दे, फिर भिक्षा दे बाद में पुनः जल दे. इस प्रकार दी गई थोड़ी सी भिक्षा भी पर्वत के समान विशाल बन जाती है और इस तरह दिया गया जल सागर दान करने के समान फल देता है:
यतिहस्ते जलं दद्यात् भिक्षादद्यात्पुनर्जलम्.
भैक्ष्म पर्वतमात्र स्यात्तज्जलं सागरोपमम्..
-पराशर स्मृति 1/53
नारद का कथन है कि भिक्षा मांगना आदि छः काम संन्यासी को उसी तरह अवश्य करने चाहिए जैसे साधारण व्यक्ति राजाज्ञा का पालन करता है:
भिक्षाटनं कर्तव्यानि षडेतानि सर्वथा नृपदण्डवत्
-धर्मसिंधु, पृ. 1003 पर उद्धृत
पराशर ने ऐसे गृहस्थों को धार्मिक अपराधी कहा है जो संन्यासी और ब्रह्मचारी को भिक्षा नहीं देतेः
यतिश्च ब्रह्मचारी च पक्वान्नस्वामिनावुभौ,
तयोरन्नमदत्वा च भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्
-पराशर 1/51
अर्थात संन्यासी और ब्रह्मचारी-ये दोनों पकाए हुए अन्न की भिक्षा के अधिकारी हैं. इन दोनों को अन्न न दे कर स्वयं भोजन करने वाले का पाप चांद्रायण व्रत से दूर होता है. (शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन एक ग्रास भोजन उत्तरोत्तर
कम कर के 15वें दिन निराहार रहना. कृष्णपक्ष के पहले दिन से एक ग्रास भोजन खाना शुरू कर के उत्तरोत्तर एक ग्रास बढ़ाते हुए 30वें दिन पूर्ण भोजन करना, यह महीने का चक्कर है) लगभग यही बात सूतसंहिता (ज्ञानयोग खंड,
4/15-16) में कही गई है.
अन्य धर्मों में भिक्षा
ऐसा नहीं है कि केवल ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म में ही भिक्षा मांग कर खाने को जीविका के साधन के रूप में अपनाया गया हो. मध्याह्न भिक्षा का विधान जैन, बौद्ध तथा ब्राह्मण-तीनों संप्रदायों के भिक्षुओं के लिए समान रूप से किया गया है. बौद्ध एवं जैन भिक्षुओं के आचार में उल्लेखनीय साम्य है. दोनों के ही नियमित भिक्षाटन
करने संबंधी विचारों में समानता है. (जैन) श्रवण को भिक्षापात्र भी उपासक (गृहस्थ) से ही मांगना पड़ता है, (देखें, बुद्धकालीन समाज और धर्म, पृ. 150,54,58).
बौद्धों के भिक्षा संबंधी पक्ष पर प्रकाश डालते हुए डा. भीमराव अंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'बुद्ध और उन का धम्म' में लिखा है, “भिक्षु के पास इन आठ चीजों
के अतिरिक्त और कुछ नहीं होना चाहिए.... (5) भिक्षापात्र...उसे मुख्य रूप से भिक्षा मांग कर खाना चाहिए. उसे 'भिक्षाजीवी' होना चाहिए...केवल भिक्षा ही वह डोरी थी जिस से भिक्षु और गृहस्थ परस्पर बंधे थे. भिक्षु भिक्षा पर आश्रित थे और गृहस्थ उन्हें
भिक्षा देते थे.” (पृ. 336, 338 ).
बौद्ध धर्म में दीक्षित होने वाला व्यक्ति 'भिक्षु' कहलाता था. आज भी गृहस्थ जीवन न जीने वाले बौद्ध, 'भिक्षु' ही कहलाते हैं. यह बड़ी अजीब बात है कि उन का नामकरण बौद्ध धर्म के किसी उच्च सिद्धांत या धर्म संबंधी किसी अन्य शिक्षा के आधार पर न कर के केवल उन की भोजन प्राप्त करने की विधि
के आधार-भिक्षा-पर किया गया है, मानो वही बौद्धधर्म का सारतत्त्व हो: जो भिक्षा मांग कर खाए वह भिक्षु. यह किसी श्रेष्ठ धार्मिक शिक्षा के स्थान पर परोपजीविता को ही महिमा मंडित करने जैसा है. जैसे बुद्ध का अर्थ ज्ञानी है, वैसे ही बुद्धि या बौद्ध धर्म के किसी विशिष्ट गुण के आधार पर उस के पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं का नामकरण करना कहीं ज्यादा श्रेयस्कर रहता. भिक्षु शब्द से तो ऐसे लगता है मानो भीख मांगना ही मुख्य और सब कुछ है; शेष कुछ भी नहीं. जीवन निर्वाह के लिए भिक्षा
अपना जीवननिर्वाह करने के लिए ही भिक्षा मांगना
धार्मिक तौर पर वैध नहीं बल्कि अन्य कई उद्देश्यों के लिए मांगना भी वैध है. विभिन्न धर्मशास्त्रों ने इस विषय
में विधान किए हैं, उदाहरणार्थ निम्नलिखित कुछ स्थल देखे जा सकते हैं. आपस्तंब गृह्यसूत्र का मत है कि निम्नलिखित कार्यों के लिए भिक्षा मांगी जा सकती है-आचार्य के लिए, अपने विवाह के लिए, यज्ञ करने के लिए, मातापिता के रक्षण के लिए, योग्य पुरुष के कर्तव्यों के विलोप को दूर करने के लिए. इन उद्देश्यों के लिए लोगों को यथाशक्ति भिक्षा देनी चाहिए:
भिक्षणे निमित्तमाचार्यों विवाहो यज्ञोमातापित्रोर्बुभूोऽर्हतश्च नियमविलोपः,
तत्र गुणान् समीक्ष्य यथाशक्ति देयम्.
-आपस्तम्ब 2/5/10/1-2
यहां विवाह करवाने के लिए भी भिक्षा मांगने की अनुमति दी गई है.
धर्मशास्त्रकार ने यह नहीं सोचा कि जो विवाह के लिए भिक्षा मांगता है, वह पत्नी और बच्चों का पेट कहां से पालेगा.
मनु का निर्देश
मनु का कथन है कि गुरु, नौकर तथा स्त्री की भूख मिटाने और देवताओं की पूजा के लिए भीख मांगेः
गुरुन् भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन् देवतातिथीन्
सर्वतः प्रतिगृहणीयात्.
-मनु. 4/251
आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन् गृहणीयात् साधुतः सदा.
-मनु. 4/252, याज्ञ. 1/216
अर्थात अपनी आजीविका की इच्छा करता हुआ सर्वदा सज्जनों से भिक्षा मांगे. मनु ने निम्नलिखित नौ प्रकार के लोगों द्वारा भिक्षा मांगने को भी धर्मसम्मत कहा है: संतानार्थ विवाह का इच्छुक, यज्ञ करने का इच्छुक, पथिक, विश्वजित, जो यज्ञों में सारी संपत्ति दान कर चुका हो, गुरु एवं मातापिता को भोजन देने का इच्छुक, पढ़ने
के लिए भोजनवस्त्र का इच्छुक, रोगी.
सान्तानिक यक्ष्यमाणमध्वगं सर्ववेदसम् गुर्वर्थं, पितृमात्रर्थं स्वाध्यायायुंपतापिन:, नवैतान् स्नातकान् विद्याद् ब्राह्मणान् धर्मभिक्षुकान्
-मनु. 11/1-2
यहां मनु ने संतानार्थ विवाह के चाहवान के अतिरिक्त पथिकों को भी भिक्षा मांगने का अनुमतिपत्र दे दिया है.
'सर्ववेदांतगश्च'
- महाभारत, शांतिपर्व, 165/1-2
महाभारत में यह कह कर सब उपनिषदों या वेदांतों के ज्ञाता को भी भीख मांगने की छूट दी गई है.
उपर्युक्त विधान अन्यान्य धर्म ग्रंथों में भी मिलते हैं, जैसे, याज्ञ. 1/216, गौतमधर्मसूत्र 5/19-20, अंगिरा स्मृति, गृहस्थरत्नाकर आदि.
#अनार्य_भारत क्रमशः
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शूद्र स्पर्श से अपवित्रता। Part 2
हिंदू धर्म ग्रंथों का कथन है कि शूद्र से स्पर्श हो जाने पर उच्च जाति का हिंदू अपवित्र हो जाता है, अत: उस की छाया तक से दूर रहना चाहिए. संवर्त स्मृति में कहा गया है कि भंगी, पतित, मुर्दा, अंत्यज, मासिक धर्म वाली स्त्री और दस दिन के भीतर सूतिका स्त्री (जच्चा) का स्पर्श करने से आदमी अपवित्र हो जाता है. अतः वस्त्रों सहित स्नान करेंचांडालं पतितं स्पृष्ट्वा शवमन्त्यजमेव च. उदक्यां सूतिका नारी सवासः स्नानमाचरेत्..
यहीं बस नहीं, शूद्रों को देख कर भी उच्च जातीय हिंदू अपवित्र हो जाते हैं., ऐसा धर्मशास्त्रीय विधान है, पराशर स्मृति में कहा गया है:
चाण्डालदर्शने सद्य आदित्यमवलोकयेत्.
- पराशर स्मृति, 6/24
अर्थात भंगी/चांडाल को देख कर सूर्य के दर्शन करें, तब शुद्धि होती है.
व्यास स्मृति का कथन है:
वणिक् किरात कायस्थ मालाकार कुटुम्बिनः.
वेरट मेह चाण्डाल दास श्वपच कोलका:.
एतेऽन्त्यजा: समाख्याता ये चान्ये च गवाशनाः.
एषां संभाषणात्स्नानं दर्शनादर्कवीक्षणम्..
- व्यास स्मृति 1/11-12
अर्थात वणिक् ( बनिया?), किरात, कायस्थ, माली, कुनबी, स्यारमार, कंजर, चांडाल, दास, श्वपच और कोली- ये सब अंत्यज हैं. इन से बातचीत करने पर स्नान
से और इन्हें देखने पर सूर्यदर्शन से शुद्धि होती है.
शूद्रों के कई उपवर्गों के विषय में तो हिंदू धर्मग्रंथकारों के वचन बहुत ही ज्यादा आपत्तिजनक हैं. उदाहरण के लिए चांडाल और श्वपच नामक शूद्रों के उपविभागों
के विषय में मनुस्मृति (अ. 10) के निम्नलिखित श्लोक पढ़ें:
चांडालश्वपचानां तु
बहिर्गामात्प्रतिश्रयः.
अपपात्राश्च कर्तव्या धनमेषां श्वगर्दभम्..
वासांसि मृतचेलानि भिन्नभांडेषु भोजनम्.
कार्णायसमलंकारः परिव्रज्या च नित्यशः..
न तैः समयमन्विच्छेत्पुरुषोधर्ममाचरन्..
व्यवहारो मिथस्तेषां विवाहः सदृशैः सह..
अन्नमेषां पराधीनं देयं स्याद् भिन्नभाजने.
रात्रौ न विचरेयुस्ते ग्रामेषु नगरेषु च..
दिवा चरेयुः कार्यार्थं चिह्निता राजशासनैः.
अबांधवं शवं चैव निरहरेयुरिति स्थितिः..
वध्यांश्च हन्युः सततं यथाशास्त्रं नृपाज्ञया.
वध्यवासांसि गृह्णीयुः शय्याश्चाभरणानि च..
-मनु 10/51-56
अर्थात चांडाल और श्वपच का निवास गांव के बाहर हो. इन के पात्रों को छुआ न जाए. कुत्ते और गधे इन का धन हों. मृतकों के वस्त्र इन के पहनने के वस्त्र हों. फूटे बरतनों में ये भोजन खाएं. कांसे के आभूषण पहनें. बाजार में न बैठें, काम के लिए आएं और काम कर के चले जाएं. धार्मिक व्यक्ति इन का स्पर्श न करें. इन के
विवाह आदि अपनी जाति में ही हों. इन्हें टूटेफूटे बरतन में सेवक के हाथ से अन्न दिलाया जाए. ये लोग रात्रि में ग्राम और नगर में न घूमें. दिन में सरकारी चिह्नों से चिह्नित हो कर अपने कार्य के लिए जाएं. लावारिस लाशों को उठाएं. फांसी देने योग्य मनुष्यों को शास्त्रोक्त विधि और राजाज्ञा से फांसी पर लटकाएं. उन के वस्त्र, शय्या और आभूषण ये सब ले लें. शूद्र के स्पर्श से न सिर्फ उच्च जातीय हिंदू अपवित्र होते हैं, बल्कि उन के देवता तक इस से नहीं बच पाते. वृद्ध हरीत स्मृति में कहा गया है:
प्रासाददेवहाणां चाण्डालपतितादिषु.
अंतः प्रविष्टेषु तथा शुद्धिः स्यात् केन कर्मणा..
गोभिः संक्रमणं कृत्वा गोमूत्रेणैव लेपयेत्..
अर्थात मंदिर, देवस्थान आदि के बाहर के आंगन में यदि चांडाल व पतित का प्रवेश हो जाए तो किस कर्म से शुद्धि होगी? गौओं के संक्रमण से अर्थात वहां गौएं बांधने, उन के फिरने तथा बाद में गोमूत्र से लेपन करने पर उस की शुद्धि होती है. यहां शूद्रों-मानव-की अपेक्षा पशु-गाय-के मूत्र को ज्यादा गरिमा दी गई है. कारिकावृत्ति (प्रायश्चित कांड) का कथन है कि यदि चांडाल शंकर या विष्णु के
मंदिर की चारदीवारी में आ जाए तो उस का चारों ओर से सौसौ हाथ तक मार्जन करें. ग्राम के उत्सव में भी चांडाल का प्रवेश निषिद्ध है. यदि यह प्रायश्चित न किया गया.तो देवमूर्ति की शक्ति की हानि होगी, राजा की मृत्यु होगी, ग्राम का नाश होगा और अन्न व चारा नष्ट होगाः
रुद्रस्य वाथ विष्णोर्वा प्राकाराभ्यंतरे यदि.
रजस्वलावधूश्चैव चांडालश्च समागत:..
ततो ग्रामोत्सवे हस्तशताभ्यंतरतो यदि.
तद् देवस्य कलाहानिः राज्ञो मरणमेव च..
तद् ग्रामस्य क्षयः प्रोक्तः सस्यानां नाशनं धुवम्..
शूद्र के द्वारा मंदिर के भीतर के भाग को छूने से न केवल राजा का नाश होता.है, बल्कि देश का भी नाश हो जाता है. लेकिन यदि वहां गोबर का लेप कर के.दूसरी क्रियाएं की जाएं तो बचाव हो सकता है. यहां फिर इनसान की अपेक्षा पशु के मल को गरिमा दी गई है. श्री पांचरात्र
(पद्मतंत्र, चर्यापाद, अ. 18 ) में इस अनुष्ठान का
विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है:
स्पृष्टभागधनांगं चेत्स्पृष्टं वा कौतुकं यदि.
क्रियासमभिहारेण प्रायश्चितमिहोच्यते..
शोधयेन्मंदिरं पूर्व गोमयालेपनादिभिः.
पुण्याहं वाचयित्वाथ ब्राह्मणांस्तत्र भोजयेत्..
स्वाध्यायं परिकुर्वीरन् ब्राह्मणा वेदपारगाः.
इतिहासपुराणानि पठेयुश्च दिवानिशम्..
कपिलाश्च प्रदेशेषु तत्र तत्राभिवासयेत्.
एवं मासादिकालेषु दोषगौरवलाघवम्..
अवेक्ष्य शोधिते धाम्नि ब्राह्मणांस्तोषयेद् धनैः.
प्रतिमानां यथायोगमुद्धारो वा नवीकृते..
कुर्यात्ततो यथापूर्वं निमित्ते वा नवीकृते.
प्रतिष्ठाप्य यथाशास्त्रं स्नापयेत्कलशैरपि..
सहस्रेण पुरावृत्तदोषाणामपनुत्तये.
अंते महोत्सवः कार्यो न चेद्राष्ट्रनृपक्षय:..
अर्थात चांडाल, श्वपच और इन के तुल्य जो पुल्कस आदि तथा प्रतिलोम अंत्यज जातियां हैं, उन में से यदि कोई जगमोहन या मंदिर के भीतर के भाग को स्पर्श कर ले तो उस का क्रिया सहित प्रायश्चित यहां बताया जाता है. पहले मंदिर को गोबर आदि से लीप कर शुद्ध करें, फिर पुण्याह वाचन करवाएं. तत्पश्चात उस स्थान में ब्राह्मण भोजन हो. वेदपाठी ब्राह्मण फिर वहां वेद का स्वाध्याय (पाठ) करें और साथ ही इतिहास पुराण का अखंड पाठ हो. उस मंदिर के आसपास योग्य स्थान में गौओं का निवास हो. इस प्रकार दोष के न्यूनाधिक होने से दो या चार मास
तक ये सब क्रियाएं होती रहें. फिर उस मंदिर के इस प्रकार पवित्र होने पर पाठ करने वाले ब्राह्मणों को धन से संतुष्ट करें. यथायोग्य स्थापित प्रतिमाओं का उद्धार
करें या नवीन प्रतिमाएं मंगवाएं. जैसे पूर्वकाल में प्रतिष्ठा हुई थी वैसे ही इन मूर्तियों की स्थापना करें और सहस्र घड़ों से मूर्तियों को स्नान करवाएं जिस से दोषों की
निवृत्ति हो. इतना काम करने पर फिर महोत्सव करें. यदि ऐसा न किया जाएगा तो देश और राजा दोनों का क्षय होगा. ( देखें पं. कालूराम शास्त्री रचित 'लीडरी पर
प्लेग' पृ. 218/220).
क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म पृष्ठ 81- 82 -83
क्रमशः
#अनार्य_भारत पेज
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भारतीय संस्कृति और भिक्षावृत्ति. Part 1
भिक्षावृत्ति उन्मूलन कानून बने वर्षों हो चुके हैं, लेकिन भारत में प्रायः सर्वत्र बेरोकटोक भिक्षा मांगी जाती है और पुण्य अर्जन के लोभ में सर्वत्र श्रद्धापूर्वक दी.जाती है. ये भिक्षा मांगने वाले तरहतरह के स्वांग रचते हैं, जिस से लोगों की करुणा, भावना को जाग्रत किया जा सके. हिंदू लोग न केवल उन से प्रभावित हो कर भिक्षा प्रदान करते हैं, बल्कि हिंदू धर्म के संस्कारों के वशीभूत हो कर भी
ऐसा करते हैं.
पवित्र धर्म
हिंदू धर्म में भिक्षा को बहुत पवित्र कार्य कहा गया है. संपूर्ण जीवन में द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) के लिए जो सोलह संस्कार माने जाते हैं उन में से तीनसंस्कारों-उपनयन, वानप्रस्थ और संन्यास-में तो भिक्षा मांगने की शिक्षा दी जाती है. उपनयन संस्कार बचपन में विद्यारंभ करने से पहले करने का विधान है. इस संस्कार के आरंभ से 25 वर्ष की अवस्था तक विद्यार्थी के लिए भिक्षा मांगने का विधान है. 50वें वर्ष में वानप्रस्थ है, 75वें वर्ष में संन्यास ग्रहण करने का विधान है. दोनों में फिर भिक्षावृत्ति अपनाने का आदेश है. संक्षेप में, जीवन के पहले 25 वर्षों तक और फिर 50 वें से मृत्युपर्यंत भीख मांग.कर जीवन निर्वाह करने का हिंदू धर्मशास्त्रों में विधान है. केवल गृहस्थाश्रम के 25
वर्षों में अन्य साधन अपनाने का नियम है. (यह शूद्रों पर लागू नहीं होता, केवल द्विजों के लिए है, शूद्र काम न करें तो जीवन ही न चले.) विभिन्न धर्मशास्त्रों-स्मृतियों, धर्मसूत्रों, गृह्यसूत्रों और संस्कार विधियों-में पूर्वोक्त तीनों संस्कारों के संदर्भ में भिक्षा के विभिन्न पक्षों पर हिंदू धर्माचार्यों ने पर्याप्त प्रकाश डाला है. उपनयन संस्कार अर्थात विद्यारंभ संस्कार के समय दंडधारण और अग्नि की प्रदक्षिणा कर के भिक्षा मांगने का विधान है. मनु ने इस प्रसंग में विस्तार सहित बताया है कि किस जाति का आदमी भिक्षा मांगते समय किस प्रकार आवाज लगाए और.पहले किसकिस से भिक्षा मांगनी शुरू करे:
प्रदक्षिणं परीत्याग्नि चरेद् भैक्षं यथाविधि,
भवत्पूर्वं चरेद् भैक्षमुपनीतो द्विजोत्तमः..
भवन्मध्यं तु राजन्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम्.
मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनी निजाम्..
भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं नावमानयेत्.
समाहृत्य तु तद् भैक्षं यावदन्नममायया..
निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः..
-मनुस्मति 2/48-51
अर्थात ब्रह्मचारियों को अग्नि की प्रदक्षिणा कर के विधिपूर्वक भिक्षा मांगनी चाहिए. भिक्षा मांगते समय ब्राह्मणजातीय ब्रह्मचारी भवति, भिक्षा देहि (भद्रे, भिक्षा
दो) कहे, क्षत्रिय-जातीय ब्रह्मचारी भिक्षा भवति देहि (भिक्षा दो, भद्रे) कहे. और वैश्य-जातीय ब्रह्मचारी भिक्षां देहि भवति (भिक्षा दो, भद्रे) कहे. सर्वप्रथम भिक्षा
माता या बहन या सगी मौसी या उस से जो अवश्य भिक्षा दे, मांगनी चाहिए. इस तरह मांग कर इकट्ठी की हुई भिक्षा को बिना किसी उत्कृष्ट वस्तु को छिपाए गुरु के
सामने रख दे. गुरु की आज्ञा पाने के बाद उसे खाए.
भिक्षा में प्राप्त वस्तु यही बात बौधायन धर्मसूत्र (1/2/17), याज्ञवल्क्य स्मृति (1/30), शांखायन
गृह्यसूत्र (2/6/5-8), गोभिल गृह्यसूत्र (2/10/42-44), खादिर गृह्यसूत्र (2/4/28/31) जैसे पुराने और संस्कार विधि (पृ. 114-115, स्वामी दयानंद रचित), षोडश संस्कार विधि (पृ. 195, पं. भीमसेन शर्मा कृत) आदि अर्वाचीन ग्रंथों में कही गई है. याज्ञवल्क्य स्मृति में भिक्षा में प्राप्त वस्तु को पवित्र कहा है ( देखें 1/187 ). मनु
ने कहा है
भैक्षेण व्रतिनो वृत्तिरुपवाससमा स्मृता.
-मनु. 2/188
अर्थात भिक्षा मांग कर खाने का फल उपवास (व्रत) करने के समान है. मनुस्मृति में ही अन्यत्र भिक्षा मांग कर खाने को सोमरस-पान के समान घोषित किया है।
सोमपानसमं भैक्ष्यं तस्माद् भैक्षेण वर्तयेत्
-मनु. अ. 2 के श्लोक 188 के बाद
अर्थात भिक्षा मांग कर खाना सोमरस पीने के समान पुण्यकार्य है. अतः हमेशा भिक्षा मांगे. इन विधानों से स्पष्ट है कि धर्मशास्त्रकार पेशेवर भिखारी बनाने वालों की तरह ब्रह्मचारी अर्थात विद्यार्थी को भिक्षा मांगने की शिक्षा देने में बहुत सचेत थे. उन्हें ध्यान था कि यदि पहले दिन ही भिक्षा मांगने पर ब्रह्मचारी को कहीं से 'न' सुनना पड़ा तो वह हतोत्साहित हो कर भीख मांगना छोड़ सकता है. अतः उन्होंने पहले दिन ऐसे लोगों से भीख मांगने का विधान किया है, जो इनकार न करें. महामहोपाध्याय डा. पांडुरंग वामन काणे ने लिखा है: “ब्रह्मचारी को भिक्षा देने में कोई आनाकानी नहीं कर सकता था, क्योंकि ऐसा करने पर किए गए सत्कार्यों से उत्पन्न गुण, यज्ञादि से उत्पन्न पुण्य, संतान, पशु, आध्यात्मिक यश आदि का नाश हो जाता है." (धर्मशास्त्र का इतिहास, जिल्द 1, पृ. 226). प्रथम दिन के बाद ब्रह्मचारी निम्नलिखित विधान के अनुसार भिक्षा मांगा करेः
वेदज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु.
ब्रह्मचार्याहरेद् भैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम्..
गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबंधुषु.
अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वं पूर्वं विवर्जयेत्..
सर्वं वापि चरेद् ग्रामं पूर्वोक्तानामसंभवे.
नियम्य प्रयतो वाचमभिशस्तांस्तु वर्जयेत्..
-मनुस्मृति, 2/183-185
अर्थात वेदाध्ययन और पांच महायज्ञ करने वाले और अपने कर्म में श्रेष्ठ लोगोंके घरों से जितेंद्रिय ब्रह्मचारी प्रतिदिन भिक्षा मांगे. वह गुरु के कुल, अपनी जाति
वालों में और मामा, मौसी आदि कुल बांधवों से भिक्षा न मांगे. यदि भिक्षा मांगने योग्य दूसरा घर न मिले तब कुल बांधवों से मांगे. उन के अभाव में अपनी जाति वालों
से और उन के अभाव में गुरु के कुल में भिक्षा मांगे, किंतु महापातकियों के घरों को छोड़ दे. उन के यहां से भिक्षा न मांगे.
भिक्षा मांगना अनिवार्य
भिक्षा मांगना ब्रह्मचारियों (विद्यार्थियों) के लिए इतना अनिवार्य कहा गया हैकि इसे छोड़ने पर दंड का विधान है:
अकृत्वा भैक्षचरणमसमिध्य च पावकम्,
अनातुरः सप्तरात्रमवकीर्णिव्रतं चरेत्
-मनु. 2/187
अर्थात यदि नीरोग रहते हुए भी ब्रह्मचारी सात दिन लगातार भिक्षा न मांगे और हवन न करे तो इस पाप से मुक्त होने के लिए अवकीर्णिव्रत करे.
अवकीर्णी तु काणेन गर्दभेन चतुष्पथे.
पाकयविधानेन यजेत निति निशि..
-मनुस्मृति. 11/118
अर्थात रात में काने गधे की चरबी से चौरस्ते पर पाकयज्ञ की विधि से 'निर्ऋति'नामक देवता के नाम पर यज्ञ करे (मनु. 11/118, मणिप्रभा व्याख्या). यही बात
बौधायन धर्मसूत्र ( 1/2/54) और विष्णु धर्मसूत्र ( 28/52 ) में कही गई है. जिस तरह हिंदुओं के धार्मिक जीवन में उपनयन संस्कार का महत्त्व है, उसी तरह
गृहस्थाश्रम के बाद वानप्रस्थ संस्कार का महत्त्व है. जाबालोपनिषद् खंड चार का एक वचन शतपथब्राह्मण के नाम पर उद्धृत कर के स्वामी दयानंद ने अपनी पुस्तक
'संस्कार विधि' के 'वानप्रस्थ संस्कार' प्रकरण में लिखा है
ब्रह्मचर्याश्रमं समाप्य गृही भवेद् गृही भूत्वा वनी भवेद्, वनी भूत्वा प्रव्रजेत्.
-1. शतपथब्राह्मणे
अर्थात मनुष्यों को उचित है कि ब्रह्मचर्याश्रम की समाप्ति कर के गृहस्थ होवें. गृहस्थ हो के बनी अर्थात वानप्रस्थ होवें, और वानप्रस्थ हो कर संन्यास ग्रहण करें. (पृ. 268, आर्यसमाज शताब्दी संस्करण). मनु ने लिखा है कि जब गृहस्थाश्रमी अपने शरीर के चमड़े को सिकुड़ा हुआ, बालों को पका हुआ और पौत्र के मुख को देख ले, तब वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करे.
क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म पृष्ठ 100 / 101/ 102 / 103
क्रमशः
#अनार्य_भारत
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हिंदू धर्म और शूद्र। Part 1
समाचारपत्रों में काशीपीठ के शंकराचार्य का एक वक्तव्य छपा था, जिस में कहा गया था कि “हिंदू धर्म में हरिजनों को नफरत की नजर से नहीं देखा गया है. इस का प्रमाण यह है कि भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे." इस कथन को हिंदू धर्म ग्रंथों का स्वाध्याय करने वाला कोई व्यक्ति सच्चा नहीं मान सकता, क्योंकि हिंदू धर्म ग्रंथों में शूद्रों (जिन में तथाकथित हरिजनों के अतिरिक्त सभी अनुसूचित जातियां, पिछड़ी श्रेणियां और जनजातियां भी आ जाती हैं) के प्रति व्यक्त किए गए उद्गारों के कारण ही तो हिंदू धर्म के धर्मत्व पर संदेह होने लगता है. शायद इसी कारण श्री ल. र. बाली ने हिंदू धर्म पर लिखी अपनी पुस्तक का नाम 'हिदूइज्मः धर्म कलंक?' रखा है. मैं ने जब शंकराचार्य का उपर्युक्त वक्तव्य पढ़ा तो मेरे मनश्चक्षुओं के आगे धर्मशास्त्रों के वचन बिजली की तरह कौंध गए. स्कंद पुराण, वैष्णव खंड, अध्याय 19 और ब्रह्मखंड, अ. 10 में दृढ़मति के
उपाख्यान में कहा गया है:
उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कस्यचित्.
उपदेशे महान् दोष उपाध्यायस्य विद्यते..
यदि चोपदिशेद् विप्रः शूद्रं चैतानि कर्हिचित्.
त्यजेयुाह्मणा विप्रं तं ग्रामाद ब्रह्मसंकुलात्..
शूद्राय चोपदेष्टारं द्विजं चाण्डालवत् त्यजेत्.
शूद्रं चाक्षरसंयुक्तं दूरतः परिजर्वयेत्..
अर्थात हीन जाति के व्यक्ति को कभी उपदेश नहीं देना चाहिए. यदि उपाध्याय उपदेश करेगा तो उसे बहुत दोष लगेगा. यदि कोई ब्राह्मण किसी शूद्र को उपदेश करे
तो दूसरे ब्राह्मण उस का बहिष्कार करें, उसे चांडाल की तरह त्याग दें और गांव से बाहर निकाल दें. पढ़ेलिखे शूद्र को दूर से ही त्याग दें. शूद्र को वेदों से बहुत ही सख्ती से दूर रखने का आदेश है. गौतम धर्मसूत्र में कहा गया है:
अथ हास्य वेदमुपशृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां
श्रोत्रप्रतिपूरणमुदाहरणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेदः
-गौतम धर्म सूत्र 2/3/4
अर्थात यदि शूद्र वेदमंत्रों को सुन ले तो उस के कानों में रांगा और लाख पिघला कर डालनी चाहिए. वह यदि वेद के शब्दों का उच्चारण करे तो उस की जीभ चीर देनी चाहिए. यदि वह वेदमंत्रों को धारण कर ले, याद कर ले, तो उस के शरीर को कुल्हाड़े आदि से काट दें. ( देखें, हरदत्त कृत मिताक्षरावृत्ति) शूद्र यदि द्विजातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के साथ एक आसन पर बैठने, एक शैया पर सोने, एक रास्ते पर चलने और उन के बराबर की बातचीत करने कीइच्छा करे तो उसे दंड देना चाहिए.
आसनशयनवाक्पथिषु समप्रेप्सुर्दण्ड्यः
-गौ.ध.सू. 2/3/5
मनु ने दंड को स्पष्ट करते हुए विधान किया है कि राजा ब्राह्मण के साथ एक आसन पर बैठे हुए शूद्र को तपाए गए लोहे से कमर में दगवा कर राज्य की सीमा से
निकाल दे या उस के नितंबों को कटवा दे:
सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टज:.
कट्यां कृतांको निर्वास्यः स्फिचं वास्यावकर्तयेत्..
-मनु. 8/281
शूद्र को लूट लो
मनुस्मृति में शूद्र के साथ ऐसा व्यवहार करने का आदेश है जैसा एक डाकू अपने किसी शिकार के साथ करता है. शूद्र से जबरन छीनाझपटी का आदेश देते हुए कहा
गया है:
आहरेत् त्रीणि वा द्वे वा कामं शूद्रस्य वेश्मनः.
न हि शूद्रस्य यज्ञेषु कश्चिदस्ति परिग्रहः..
मनु. 11/13
अर्थात यदि यज्ञ दो या तीन कारणों से, विशेषकर धनाभाव के कारण, पूरा न हो रहा हो तो उस की पूर्णता के लिए वैश्य के यहां से धन न मिलने पर (बलात्कार
या चोरी से) धनवान शूद्र के यहां से धन लाए क्योंकि शूद्र का यज्ञ से कोई संबंध नहीं होता है. ( देखें, मनुस्मृति, मणिप्रभा हिंदी टीका, पृ. 596 ).
ऐसा ही आदेश मनुस्मृति में अन्यत्र भी मिलता है:
विस्रब्धं ब्राह्मणः शूद्राद् द्रव्योपादानमाहरेत्.
न हि तस्यास्ति किंचित्स्वं भर्तृहार्यधनो हि सः..
- मनु. 8/417
अर्थात ब्राह्मण बिना विकल्प (सोचविचार ) किए शूद्र के धन को ले ले, क्योंकि उस का निजी धन कुछ नहीं है और वह स्वामी के ग्रहण करने योग्य धन वाला है, अर्थात शूद्र के धन को ग्रहण करने का अधिकार उस के स्वामी को है.
हिंदू धर्मशास्त्रों ने शूद्र को जन्मजात दास घोषित कर रखा है. मनुस्मृति का कथन है कि शूद्र चाहे खरीदा हुआ हो या नहीं, उस से दास की तरह काम करवाए, क्योंकि
विधाता ने उसे ब्राह्मणों की दासता करने के लिए ही रखा है:
शूद्रं तु कारयेद् दास्यं क्रीतमक्रीतमेव वा.
दास्यायैव हि सृष्टोऽसौ ब्राह्मणस्य स्वयंभुवा..
-मनु. 8/413
शूद्रों से सूद की दर भी ज्यादा से ज्यादा लेने का धर्म ग्रंथ विधान करते हैं:
द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पंचकं व शतं समम्.
मासस्य वृद्धिं गृह्णीयाद् वर्णानामनुपूर्वशः..
-मनु. 8/142
अर्थात ब्राह्मण से दो प्रतिशत, क्षत्रिय से तीन प्रतिशत, वैश्य से चार प्रतिशत और शूद्र से पांच प्रतिशत सूद लें.
'मनुस्मृति' का आदेश है कि शूद्र केवल शूद्र वर्ण की स्त्री से विवाह कर सकता है, जब कि ब्राह्मण अपने वर्ण के अतिरिक्त क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण की स्त्री से भी विवाह कर सकता है; क्षत्रिय अपने वर्ण के अतिरिक्त वैश्य और शूद्र वर्ण की स्त्री के साथ तथा वैश्य अपने वर्ण के अतिरिक्त शूद्र वर्ण की स्त्री से शादी कर सकता
शूद्वैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विशः स्मृते.
ते च स्वा चैव राज्ञश्च ताश्च स्वा चाग्रजन्मनः
-मनु. 3/13
शूद्रों के नाम दासांत हों
शूद्रों के नामों से भी दासता टपकनी चाहिए, ऐसे आदेश हिंदू धर्म ग्रंथों में विद्यमान हैं. धार्मिक विधान है कि उन के नामों के पीछे 'दास' शब्द होना चाहिए.
उदाहरण के लिए:
शूद्रस्य प्रेष्यसंयुतम्
-मनु. 2/32
दासः शूद्रस्य कारयेत्
-यमस्मृति. 998/5
यही बात अन्य कई धर्म ग्रंथों में भी मिलती है
क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म पृष्ठ 78--79--80
क्रमशः
#अनार्य_भारत
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