आप लोगों ने वह श्लोक तो सुना ही होगा कि "यत्र नार्येस्तु पूज्यते, रमन्ते फलाना ढ़िमका"
यह श्लोक आमतौर पर बहुत सुनाया जाता है और इसी के माध्यम से यह साबित किया जाता है कि सनातनी धर्मग्रंथों मे नारियों को कितना सम्मान दिया गया है।
चलिये.. अब जरा सा एक ग्रंथ के एक-दो श्लोक हम भी बताते हैं-
लिङ्गमहापुराण शैवसमुदाय का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पुराण है, और क्रमानुसार यह ग्यारहवाँ पुराण है। इसी लिङ्गमहापुराण के पूर्वभाग, अध्याय-8 श्लोक-21/22 मे लिखा है कि "पुरुषों को स्त्रियों से सदैव दूर रहना चाहिये! बुद्धिमान पुरुष स्त्रियों से उतना ही लगाव लगाये, जितना कि शव से लगाया जाता है।"
यहाँ कहने का तात्पर्य है कि भले ही एक मृत लाश अपने किसी सम्बन्धी की ही क्यों न हो, पर मानव उससे कोई मोह नही रखता! ऐसे ही स्त्री कितनी भी अपनी प्रिय क्यों न हो, पर उससे कभी स्नेह नही रखना चाहिये।
इसी के अगले श्लोक मे लिखा है कि "मनुष्य की मनोस्थिति जमीन पर मूत्र त्यागते समय जैसी होती है, वैसी ही मनोस्थिति संभोगकाल मे भी रखनी चाहिये।"
यहाँ यह समझाया गया है कि जैसे मूत्र त्यागना एक मजबूरी है, वैसे ही वीर्य-त्यागना भी आवश्यक है। अतः मूत्र त्यागकर जैसे पुरुष वहाँ से दूर निकल जाता है, ऐसे ही वीर्य-त्यागकर, अर्थात संभोग करके दूर हो जाना चाहिये।
जरा विचार करो कि कैसा ज्ञान दिया गया है पुराणों मे, और कितना सम्मान भी किया गया है नारियों? कभी-कभी तो लगता है कि ऐसा लिखने वालों ने एक स्त्री के गर्भ से ही जन्म लिया था या फिर सच मे किसी पुरुष के मुँह से पैदा हुये थे।
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