Thursday, 18 March 2021

ऋषि दुराचार।

सूर्यदेव ने अपनी बेटी सावित्री कि विवाह ब्रह्मा से किया और दशरथ के मित्र राजा लोमपाद ने अपनी बेटी शांता का विवाह मृगी ( हिरनी ) के पेट से पैदा हुए एक सींग वाले ऋषि श्रृंग ( श्रृंगी ऋषि ) से किया था। इसी ऋषि श्रृंग ने दशरथ के घर पुत्रेष्ठी यज्ञ किया था जिससे राम व उसके तीन भाई उत्पन्न हुए।

श्रृंग की कहानी महाभारत और बाल्मीकि रामायण में दी गई है। गीता प्रेस गोरखपुर जिसका ट्रस्टी वर्तमान में आदित्यनाथ योगी है द्वारा प्रकाशित महाभारत और बाल्मीकि रामायण के संबंधित पन्ने पोस्ट किया जा रहें है।

कश्यप गोत्र के विभांडक ऋषि का वीर्य नहाते समय उर्वशी को देख कर नदी में निकल गया जिसको  एक प्यासी हिरनी ने पानी के साथ पी लिया। यह हिरनी पूर्वजन्म की देवकन्या थी जो  शाप ग्रस्त होने से हिरनी बनी थी। ब्रह्मा ने पहले ही बता दिया था कि वह एक श्रेष्ठ ऋषि को जन्म देगी । 

इस तरह एक सींग वाले श्रृंगी ऋषि का जन्म हिरनी के पेट से हुआ। 

राजा रोमपाद की गलती से ब्राह्मण कुपित हुए परिणामस्वरूप इन्द्र ने वर्षा बन्द कर दी। गलती राजा की और सजा पूरी प्रजा को। ब्राह्मणों ने ही फिर उपाय बताया कि श्रृंगी ऋषि जिसने अब तक अपने पिता और जंगली जानवरों के अलावा  कोई प्राणी देखा ही नहीं है उसको राज्य में लेे आ कर अपनी बेटी की उससे शादी कीजिए। 

राजा और मंत्रीगण श्रृंगी ऋषि को लाने का उपाय सोचने लगे। मंत्रीगण  शास्त्रों के ज्ञाता, नीतिनिपुण, अर्थशास्त्र के ज्ञाता थे। राजा लोमपाद  मर्यादा से कभी च्यूत ना होने वाले थे। यानी हमेशा मर्यादा का पालन करने वाले थे। मर्यादा भी कैसी ? वैश्याओं को यह काम दिया कि ऋषि को लुभा कर ले कर आना है। मर्यदावान राजा के शासन में वैश्याएं भी थी और मर्यादा वान राजा उनकी सहायता भी लेते है और वह भी जंगल में रहने वाले ऋषि को लुभाने के लिए।

एक बूढी वैश्या अपने साथ कई सुंदर जवान वैश्याओं को लेे कर गई। आश्रम के पास डेरा डाल दिया और अपनी जवान लड़की जो वह भी वैश्यावृति करती थी को भेजा। उसने ऋषि को बार बार आलिंगन किया, अंक में भर कर अपने शरीर को ऋषि के शरीर से दबाया और रगड़ा। मुंह से मुंह मिलाया। बार बार झुक झुक कर अपने अंगप्रदर्शन किया। खाने को दिया, पीने को शराब दी। ऋषि जी हो गए पागल। अपने पिता को उस का परिचय दिया। चालू जबान में  कहें तो , पतली कमर, भारी पिछवाड़े वाली, बड़े स्तनों वाली। लेकिन पंडितों कि जुबान में ऐसे बताया, " वक्ष स्थल पर दो बड़े मांस पिंड थे जिन पर कोई रोए ( बाल ) नहीं थे, देखने में मनोहर जान पढ़ते थे। नाभि देश के समीप जो शरीर का मध्य भाग था वह बहुत पतला था, नितम्ब भाग बहुत ही स्थूल था।"  बालों को बनाने का ढंग, वेश भूषा व गहने इत्यादि का भी विवरण बताया, यह भी कि पीने को दिया जिसको पी कर मस्ती छा गई।

जहां महाभारत में वेश्या युवती खुद गई श्रृंगी के पास वही बाल्मीकि रामायण में श्रृंगी घूमता हुआ खुद उनके पास पहुंच गया। और अपने पिता को कुछ नहीं बताया और फिर दूसरे दिन भी पहुंच गया जहां से वेश्याएं उसको प्रलोभन दे कर राजा लोमपाद के पास लेे गई। लोमपाद ने उसको रनिवास ( रानियों के रहने का निवास )में रखा। फिर अपनी बेटी शांता का विवाह उससे किया।पिता ढूंढता हुआ आया लेकिन पुत्र श्रृंगी के ठाठ देखकर खुश हुआ और बोला, " बेटा जी पुत्र पैदा करके वापिस आ जाना "

बाल्मीकि रामायण को आदि कवि बाल्मीकि ने रचा था।  जहां श्रृंगी ऋषि के बारे में बताया कि उसने कभी किसी स्त्री ( अपनी माता को भी नहीं ) नहीं देखा था। अपने पिता के इलावा किसी और पुरुष को नहीं देखा वहीं श्रृंगी जब वेश्याओं को मिलता है और अपना परिचय देता हुए यह बोलते दिखाया है कि मेरा नाम श्रृंगी  तपस्या आदि कर्मो से इस पृथ्वी खंड पर  प्रसिद्ध है।  

महाभारत में युधिष्ठर जिसको यह कथा सुनाते हुए लिखा गया है वह खुद सवाल करता है कि श्रृंगी मृगी ( हिरनी ) के पेट से कैसे पैदा हुआ जबकि शास्त्र और व्यवहार में पशुओं से संसर्ग  निषिद्ध है।यानी युधिष्ठर के अनुसार हिरनी से संभोग कर के ही बच्चा पैदा हो सकता है। लेकिन कहानी में तो हिरनी ने श्रृंगी के पिता का वीर्य पानी के साथ पी लिया था फिर भी बच्चा पैदा हुआ।


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****** भृगु पुत्र उशना उर्फ शुक्राचार्य का नाम शुक्राचार्य इस लिए हुआ कि उशना को शिव ने अपने मुंह से अंदर डाल कर अपने लिंग के रास्ते से बाहर निकाला था। शुक्र का अर्थ वीर्य होता है। भृगु पुत्र उशना ने अपने योग बल से खजाने के अध्यक्ष कुबेर के अंदर प्रवेश करके सारे खजाने पर अधिकार कर लिया। कुबेर ने शिव को शिकायत की। शिव ने क्रोध से उशना को पकड़ कर मुंह के रास्ते पेट में डाल लिया। फिर शिवजी लाखों अरबों ( लाखों करोड़ों नहीं) वर्ष तक पानी के अंदर तपस्या करते रहे। फिर उन्होंने देखा कि मेरी ही तपस्या के प्रभाव से शुक्राचार्य को भी तेज प्राप्त हुआ है। उशना बाहर आना चाहता था। शिव ने बोला कि मेरे लिंग ( शिशन) के रास्ते से बाहर निकलो। तब वह शिष्न के रास्ते जैसे वीर्य बाहर आता है ऐसे बाहर आए। इसी वजह से उनका नाम शुक्राचार्य ( शुक्र का अर्थ वीर्य) हुआ। पार्वती ने उसको अपना बेटा माना। यह कहानी है महाभारत के शान्तिपर्व के 289 वे अध्याय में दर्ज। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत का संबंधित अध्याय के पन्ने नीचे पोस्ट कर दिए है। इतने प्रभावशाली लिंग की पूजा करना तो बनता ही है।
शंकर के लिंग से बाहर निकलने वाले ऋषि शुक्राचार्य महाभारत में भृगु पुत्र उषाणा का नाम वीनस (वीर्य) है क्यों, एक बार योग शक्ति के माध्यम से कुबेर के शरीर में प्रवेश कर धन पर काबू पा लिया कुबेर सब शंकर से कहता है, शंकर गुस्से में आकर पेट में गर्मी डालते हैं । शंकर के लाखों अरबों वर्षों की तपस्या के बाद मैं करता हूँ, तब उसे एहसास होता है कि पेट में गर्मी भी उसकी तपस्या से चमक रही है । शंकर उसे कहते हैं मेरे लंड से बाहर आओ उशाना का नाम इसलिए वीनस हो गया क्योंकि शुक्राणु (शुक्राणु जैसे) लिंग से बाहर निकला शंकर के लिंग से निकला शुक्र शुक्राचार्य (महाभारत, शांति का पर्व, अध्याय 289) 


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 इंद्र अहिल्या के बारे में बहुत से लोग जानते होंगे लेकिन उसके बाद जो हुआ वो बहुत कम लोग जानते होंगे गौतम ऋषि ने पत्नी से संबंध बनाने के कारण इंद्र को उसी अंडकोष से गिरने का दिया श्राप, और होता है ऐसा मैं जाकर इंद्र देवताओं को ये सब बताता हूँ, अग्नि देवता बकरी के अंडकोष लगाने की सलाह देते हैं । बाद में सभी देवता मिलकर इंद्र देवता को बकरी अंडकोष में बिठाते हैं तब से इंद्र ने बकरी का अंडकोष पकड़ा है

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पर्वत उड़ना।