Thursday, 18 March 2021

दीवाली त्योहार।

दीपावली या बलिराज्य?-

अलबेरुनी का जन्म 4 सितंबर 973 ई. में खीवा नामक स्थान पर हुआ था,1017 ई. के बाद उन्होंने भारत के कई स्थानों का भृमण किया। 29 दिसम्बर 1031 को अलबेरुनी ने ये पुस्तक लिखकर समाप्त करते है
अल-बिरुनी अपने ऐतिहासिक पुस्तक "किताब-उल-हिन्द( अल-बिरुनी का भारत') जो की भारत के इतिहास की एक प्रमाणिक पुस्तक मानी जाती है, में हिन्दुओ के 'त्यौहार एवं आमोद प्रमोद के दिन ' अध्याय 76 में लिखता है कि- "कार्तिक प्रथमा या अमावस्या का दिन जब सूर्य तुला राशि में जाता है तो ' दीवाली' कहलाता है । इस दिन लोग स्नान करते हैं , बढियां कंपड़े पहनते है ,एक दूसरे को पान-सुपारी भेंट देते हैं।,घोड़े पर सवार होकर दान देने मंदिर जाते हैंऔर एक दूसरे के साथ दोपहर तक हर्षोउल्लास के साथ खेलते हैं । रात्रि को वे हर स्थान पर अनेक दीप जलाते हैं ताकि वातावरण सर्वथा स्वच्छ हो जाए। इस पर्व का कारण यह है कि वासुदेव की पत्नी लक्ष्मी विरोचन के बलि को -जो सातवें लोक में बन्दी है- वर्ष में एक बार इस दिन बंधन मुक्त करती है और उसे संसार में विचरण करने की आज्ञा देती है । इसी कारण इस पर्व को ' बलिराज्य' कहा जाता है ।"

अल- बिरुनी 1017-20 ईसा के मध्य में भारत आया था और लिखता है जिसके अस्सी अध्याय थे। यदि हम  अल-बिरुनी की माने तो वह दीपावली की कहानी जो वर्तमान राम जी के लंका विजय से वापसी की ख़ुशी में अयोध्यावासियों के दीप जलाने की कहानी से अलग है । अल- बिरुनी के अनुसार उस समय दीपावली राम जी के वापस आने के कारण नहीं अपितु लक्ष्मी की कैद से विरोचन पुत्र बलि की आज़ादी के उपलक्ष्य में मनाई जाती थी और बलि उस दिन संसार में विचरण करता है इसी  कारण इस पर्व को उस समय बलिराज्य कहा जाता था। 

तब, प्रश्न यह उठता है कि बलिराज्य यानि बलि का लक्ष्मी के  बंधन मुक्त हो संसार में विचरण करने की मान्यता में राम कथा  बाद के किस ईसा में जोड़ी गई होगी ? अल-बिरुनी लक्ष्मी को वासुदेव की पत्नी तो कहता है किंतु राम और सीता जी का जिक्र कंही नही करता। 11वी सदी में भारत की दिवाली राम कथा से सम्बंधित नही बल्कि राजा बली कथा से सम्बंधित थी।

गौरतलब है की विरोचन पुत्र बलि वही दानवीर दैत्यराज बलि है  जिसको धोखे से परास्त करने के लिए विष्णु ने वामन रूपी ब्राह्मण वेश धरा था और धोखे से तीन पग भूमि दान में मांग बलि के राज्य पर अधिकार कर लिया था।

इस तरह आसानी से समझा जा सकता है कि इस पर्व को बाद में राम कथा से जोड़ा गया है।

 Brindavan Singh

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