मेरी इस पोस्ट का मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि सच्चाइयों से अवगत कराना है। जो कुछ भी लिखा है वह गीता प्रेस की बाल्मीकि रामायण से लिया है। उसके पन्ने भी साथ में पोस्ट है। कोई भी तथ्यों को नकारने से पहले अपने घर रखी रामायण को या डाउनलोड करके रामायण को जरूर पढ़े। 1927 में प्रकाशित चतुर्वेदी द्वारका प्रसाद शर्मा द्वारा अनुवादित बाल्मीकि रामायण में भी यही लिखा है। उसको मैने जानबूझ कर नहीं लिया क्योंकि गीता प्रेस को लोग ज्यादा मानते है।
जब कैकई ने दशरथ से अपने दो वर मांगे तो दशरथ दुखी तो हुए पर इंकार ना कर सके। तब राम को निर्णय सुनाने के लिए बुलाया गया। राम ने निर्णय को स्वीकार किया और सबसे पहले अपनी माता कौशल्या को बताने के लिए गया। कौशल्या राज त्याग और बनवास का निर्णय सुन कर दुखी हुई।
तभी वहां लक्ष्मण भी था उसने कौशल्या और राम के सम्मुख अपने विचार इस तरह रखे।
दशरथ बूढ़ा होकर काम वश कैकई की बात मान रहा है। ऐसे राजा को कारावास में डालना चाहिए या वध कर देना चाहिए। इससे पहले कि लोगों को पूरी बात पता चले राम को राजगद्दी संभाल लेनी चाहिए। जो भी विरोध करेगा उस को मै हत्या करके समाप्त कर दूंगा। "अयोध्या को मनुष्य शून्य कर दूंगा।" भरत का पक्ष लेने वालों की हत्या कर दूंगा।
कौशल्या ने भी राम को प्रेरित करते हुए कहा, "आपने लक्ष्मण की बातें सुनी, तुम को जो ठीक लगे करो। मेरी सौत की बात मत मानो। अगर पिता कि बात को आप मानते हो तो अपनी माता की बात भी माननी चाहिए। मैं आपको बनवास की आज्ञा नहीं देती।
राम ने तो उस समय पुरूषोतम होने का सबूत जरूर दिया, लक्ष्मण और कौशल्या को धर्मनीति समझाई लेकिन बनवास के दौरान अयोध्यावासियों और सुमित्र को वापिस भेजने के बाद, अयोध्या सीमा के बाहर, पहली ही रात्रि को सोने से पहले लक्ष्मण को इस तरह बोला, "मेरे पिता बूढ़े होकर कैकई के कामवश है, ऐसे कामवश राजा का यही हाल होता है। कोई पिता क्या अपने आज्ञाकारी पुत्र का भी त्याग करता है? कैकई का इस घर में आने का मकसद ही मुझे और मेरे पिता को मारने का है। अब वह दशरथ को मार डालेगी।
कौशल्या ने राम के बनवास जाने के कुछ ही समय के बाद दशरथ को ऐसा बोला, "बिना शक मैने पिछले जन्म में दूध पीने को उद्यत बछड़ों की मातायों के स्तन काट डाले होंगे तभी मुझे यह पुत्र वियोग हुआ है।" बिल्कुल ऐसी ही बात राम ने लक्ष्मण को अपने पिता की बुराई करने के दौरान कही। " जरूर मेरी माता ने पिछले जनम में कुछ औरतों को पुत्रविहिन किया होगा तभी उसको पुत्रवियोग हुआ।"
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रामायण के कुछ खतरनाक आंकडे
वाल्मिकी रामायण मे लिखा है कि,
राम 11 हजार वर्षो तक अयोध्या पर राज करेगा
(बालकांड 1/ 97)
दशरथ ने 60 हजार वर्षो से ज्यादा समय तक अयोध्या पर राज किया
(बालकांड सर्ग 20, श्लोक 10,11)
शुद्र शंबुक के तपस्या से जिस ब्राह्मण बच्चे कि मृत्यू हुई थी वो 5 हजार साल का था
(उत्तरकांड सर्ग 73, श्लोक 5)
राम ने अपने धनुष्य बाण से 14000 भयंकर राक्षसो को कुछ हि मिनट मे मारा
(अरण्यकांड सर्ग 30, श्लोक 30,31)
जन्म होते हि कुंभकर्ण को बहोत भुख लगने के कारण उसने हजारो लोगों को खा लिया था
(युद्धकांड सर्ग 61, श्लोक 13)
हनुमान ने 800 मिल चौडे समुद्र को छलांग लगाकर पार किया था
(सुंदर कांड सर्ग 1)
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तो ये थे वाल्मिकी रामायण के कुछ मजेदार आंकडे
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सहायक ग्रंथ
रामायण या सितायण, सुरेंद्र अज्ञात, पृष्ठ 66,67,68
सम्यक प्रकाशन दिल्ली
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यह
तो लगभग सबने पढ़ा ही होगा कि वानरराज बालि के पास एक ऐसी माला थी जिसे
पहनने से वह अपने शत्रु का आधा बल खींच लेता था, और उसी से वो अपराजेय हो
गया था! यही वजह थी कि राम ने बालि को पेड़ के पीछे से छुपकर मारा था!
मै सोचता हूँ कि आखिर बालि के माले मे ऐसा कौन सा चुम्बक लगा था जिससे वह सामने वाले की आधी शक्ति खीच लेता था?
यह वाकई हास्यास्पद और कुतर्क वाली बात है!
बाल्मीकि रामायण किष्किंधाकाण्ड सर्ग-11 मे बाल्मीकि जी ने लिखा है कि जो शत्रु बालि से युद्ध करने जाता था, बालि के सामने आते ही उसकी आधी शक्ति क्षीण हो जाती थी, पर कहीं ऐसा नही लिखा है कि बालि उसकी शक्ति को खींच लेता था!
वास्तव मे बालि कद-काठी से बहुत हट्टा-कट्टा था! वह अत्यन्त बलवान और गठीले बदन का मालिक था! यह साधारण सी बात है कि यदि कोई अपने से दोगुने लम्बे-चौड़े योद्धा से युद्ध करे तो उसे देखते ही उसकी आधी शक्ति जैसे क्षीण हो जाती है! इसमे खीचने जैसी कोई बात नही थी, बल्कि जो योद्धा बालि से युद्ध करने जाता था, वह बालि के गठीले और ऊँचे शरीर को देखकर ही ऐसा अनुभव करता था कि जैसे उसकी आधी शक्ति क्षीण हो गयी है!
बालि वास्तव मे कितना बलिष्ठ था उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्वयं हनुमान और जामवंत भी उससे लड़कर सुग्रीव का राज्य वापस दिलाने मे नाकाम थे! इसीलिए तो इन लोगों ने राम के हाथों धोखे से बालि का वध करवाया!
वैसे राम ने जिस तरह बालि को मारा वह भी किसी घृणित कृत्य से कम नही था!
राम ने केवल सुग्रीव की बात सुनकर बालि को मारने की प्रतिज्ञा कर ली! जबकि धर्मानुसार राम को एक बार बालि से भी बात करनी चाहिये थी, और उसका भी पक्ष सुनना चाहिये था! यही नही राम को प्रयास करना चाहिये था कि दोनो भाइयों मे समझौता करवा देते, सम्भव है कि बालि राम की बात मान जाता!
दूसरी बात जब राम ने बालि को पेड़ के पीछे से छुपकर मारा, तब बालि ने राम को धिक्कारते हुये कहा कि तुम कायर थे, अगर क्षत्रिय थे तो मुझे सामने से युद्ध मे हराते!
तब राम ने जवाब दिया कि- "हे बालि! मै क्षत्रिय हूँ, और धर्मज्ञ राजा भी मृगया (शिकार) मे विभिन्न जानवरों का वध करते थे!
हे बालि! तुम भी शाखामृग (बन्दर) हो, और मैने क्षत्रियों की भांति तुम्हारा शिकार किया है! शिकार चाहे सामने से करें या पीछे से छुपकर... उसमे निन्दा नही, अतः तुम्हारा वध अधर्म नही है"
ये संस्कार थे भगवान श्रीराम के, एक सूरवीर राजा को पहले छुपकर तीर मार दिया और बाद मे सफाई दे दिया कि मैने तो तुम्हारा शिकार किया है!
वाह्ह प्रभु श्रीराम! क्या तर्क दिया आपने, धन्य हो आप।
जिसे मारना था, उसे जानवर घोषित कर दिया और जिस सुग्रीव से आपको काम था उसे सीने से लगाये रखा।
वैसे प्रमाण मांगने वालों को बता दूँ कि उक्त कथा वाल्मीकि रामायण किष्किंधाकाण्ड सर्ग-18 श्लोक-39-42 मे वर्णित है!
मै सोचता हूँ कि आखिर बालि के माले मे ऐसा कौन सा चुम्बक लगा था जिससे वह सामने वाले की आधी शक्ति खीच लेता था?
यह वाकई हास्यास्पद और कुतर्क वाली बात है!
बाल्मीकि रामायण किष्किंधाकाण्ड सर्ग-11 मे बाल्मीकि जी ने लिखा है कि जो शत्रु बालि से युद्ध करने जाता था, बालि के सामने आते ही उसकी आधी शक्ति क्षीण हो जाती थी, पर कहीं ऐसा नही लिखा है कि बालि उसकी शक्ति को खींच लेता था!
वास्तव मे बालि कद-काठी से बहुत हट्टा-कट्टा था! वह अत्यन्त बलवान और गठीले बदन का मालिक था! यह साधारण सी बात है कि यदि कोई अपने से दोगुने लम्बे-चौड़े योद्धा से युद्ध करे तो उसे देखते ही उसकी आधी शक्ति जैसे क्षीण हो जाती है! इसमे खीचने जैसी कोई बात नही थी, बल्कि जो योद्धा बालि से युद्ध करने जाता था, वह बालि के गठीले और ऊँचे शरीर को देखकर ही ऐसा अनुभव करता था कि जैसे उसकी आधी शक्ति क्षीण हो गयी है!
बालि वास्तव मे कितना बलिष्ठ था उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्वयं हनुमान और जामवंत भी उससे लड़कर सुग्रीव का राज्य वापस दिलाने मे नाकाम थे! इसीलिए तो इन लोगों ने राम के हाथों धोखे से बालि का वध करवाया!
वैसे राम ने जिस तरह बालि को मारा वह भी किसी घृणित कृत्य से कम नही था!
राम ने केवल सुग्रीव की बात सुनकर बालि को मारने की प्रतिज्ञा कर ली! जबकि धर्मानुसार राम को एक बार बालि से भी बात करनी चाहिये थी, और उसका भी पक्ष सुनना चाहिये था! यही नही राम को प्रयास करना चाहिये था कि दोनो भाइयों मे समझौता करवा देते, सम्भव है कि बालि राम की बात मान जाता!
दूसरी बात जब राम ने बालि को पेड़ के पीछे से छुपकर मारा, तब बालि ने राम को धिक्कारते हुये कहा कि तुम कायर थे, अगर क्षत्रिय थे तो मुझे सामने से युद्ध मे हराते!
तब राम ने जवाब दिया कि- "हे बालि! मै क्षत्रिय हूँ, और धर्मज्ञ राजा भी मृगया (शिकार) मे विभिन्न जानवरों का वध करते थे!
हे बालि! तुम भी शाखामृग (बन्दर) हो, और मैने क्षत्रियों की भांति तुम्हारा शिकार किया है! शिकार चाहे सामने से करें या पीछे से छुपकर... उसमे निन्दा नही, अतः तुम्हारा वध अधर्म नही है"
ये संस्कार थे भगवान श्रीराम के, एक सूरवीर राजा को पहले छुपकर तीर मार दिया और बाद मे सफाई दे दिया कि मैने तो तुम्हारा शिकार किया है!
वाह्ह प्रभु श्रीराम! क्या तर्क दिया आपने, धन्य हो आप।
जिसे मारना था, उसे जानवर घोषित कर दिया और जिस सुग्रीव से आपको काम था उसे सीने से लगाये रखा।
वैसे प्रमाण मांगने वालों को बता दूँ कि उक्त कथा वाल्मीकि रामायण किष्किंधाकाण्ड सर्ग-18 श्लोक-39-42 मे वर्णित है!
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भारत मे रामायण को लेकर अनेकों किंवदंतियां फिजाओं में तैरती रहती है।शैक्षिक पाठ्यक्रम में भी भारत के इतिहास विभाजन में उत्तर वैदिक काल के बाद रामायण-महाभारत काल पढ़ाया जाता है।खुद ब्राह्मण शास्त्रों में इन्हें काव्य/महाकाव्य कहा जाता है।ऐतिहासिक दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं है।वाल्मीकि कृत रामायण का रचना काल बुद्ध के बाद का है,यह खुद रामायण से साबित होता है।यानी जो इतिहास विभाजन किया गया उसके बीच रामायण को जबरदस्ती घुसाया गया है।
इन काव्यों को इतिहास से जोड़ना,इनमें लिखी बातों,नामों व स्थानों का संदर्भ देना नीरी मूर्खता है।इनको धार्मिक काव्य कहना भी अतिश्योक्ति भरा है।जब बुद्धकाल के बाद लिखे काव्य को बुद्ध काल से पहले का बताया जाएं तो वो तत्कालीन समाज को भी प्रतिबिंबित नहीं करता।तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था,शिल्पकला, वास्तुकला आदि का आईना भी नहीं होता।रामायण में जो इंसानों की उम्र व जानवरों की कलाबाजियों का वर्णन किया गया है वो प्रकृति व विज्ञान से परे है।अपने आसपास के माहौल से कटकर इस तरह का काव्य लिखना मदहोश मानव की चेतना का भी प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता।
रामायण में जो अयोध्या रूपी नगर का वर्णन आता है वो बुद्धकाल में साकेत नगर के नाम से प्रसिद्ध था।पुष्यमित्र शुंग द्वारा बौद्ध राजा वृहद्रथ की हत्या के बाद बौद्ध स्तूप,चैत्यों पर हमले शुरू हुए थे।बौद्धों को मारा जाने लगा।गुप्तकाल में साकेत नगर का नाम अयोध्या रखा गया।वाल्मीकि रामायण में अयोध्या का जिक्र है और अयोध्या नामकरण हुआ गुप्तकाल में।संकेत साफ है कि रामायण गुप्तकालीन रचना है।कड़ी से कड़ी जोड़ते जाएं तो ब्राह्मण ग्रंथों का रचनाकाल नजदीक आता जाएगा।
रामायण की उत्पत्ति व कल्पनाशीलता को समझने के लिए हमे भारत का नहीं थाईलैंड का इतिहास पढ़ना चाहिए।जो पात्रों ,स्थानों के नाम रामायण में है वो सब वहीं मिलते है व यूनेस्को द्वारा सरंक्षित धरोहरें है।भारत के राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री दूसरे देशों में जाते है तो कहते है कि मै बुद्ध की धरती से आया हूँ या गांधी की धरती से आया हूँ।राजा राम की धरती से आया हूँ,कह दे तो थाईलैंड अन्तराष्ट्रीय न्यायालय में खींच लेगा।
"क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्दू धर्म"नामक पुस्तक में सुरेंद्र कुमार शर्मा ने रामायण के सर्ग/श्लोक का हवाला देते हुए साबित किया है।क्या रामायण के "सर्ग" भी ऐतिहासिकता सिद्ध करने हेतु भविष्य में बदले जाएंगे?
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ब्राह्मणों ने सबकों उल्लू बनाया!
की भारतीयों के धर्म से छेड़छाड़!
भारतीयों को जबरदस्ती अज्ञानी अनपढ़ और गुलाम बनाकर की उनके धार्मिक भावनाओं से छेड़छाड़!
न तो विजयदशमी से राम का कोई सम्बंध है ना ही दीपावली से!
पद्मपुराण में भी लिखित दस्तावेजी प्रमाण है कि राम ने चैत्र मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को रावण को मार डाला!
लेकिन विजयदशमी तो आश्विन मास की शुक्लपक्ष की दशमी को मनाई जाती है!फिर रावण वध से विजयादशमी का काहे का सम्बन्ध?
राम के अयोध्या वापसी के बारे में पद्मपुराण में भी यही लिखा है कि राम वैशाख मास में शुक्लपक्ष की छठी तिथि को आए थे और अगले ही दिन सप्तमि को उनका राज्याभिषेक हुआ।
फिर दीपावली तो आश्विन मास की अमावस्या को आती है।फिर राम का अयोध्या आने से दीपावली का काहे का सम्बंध ?



















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