Thursday, 18 March 2021

गौमांस, मांस, सोम


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प्राचीन भारत में गोहत्‍य एवं गोमांसाहार-
पंडित पांडुरंग वामन काणे ने लिखा है ''ऐसा नहीं था कि वैदिक समय में गौ पवित्र नहीं थी, उसकी 'पवित्रता के ही कारण वाजसनेयी संहिता (अर्थात यजूर्वेद) में यह व्यवस्‍था दी गई है कि गोमांस खाना चाहिए'' --धर्मशास्‍त्र विचार, मराठी, पृ 180)

महाभारत में गौ
गव्‍येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्‍सरमिहोच्यते --अनुशासन पर्व, 88/5
अर्थात गौ के मांस से श्राद्ध करने पर पितरों की एक साल के लिए तृप्ति होती है

मनुस्मृति में
उष्‍ट्रवर्जिता एकतो दतो गोव्‍यजमृगा भक्ष्‍याः --- मनुस्मृति 5/18 मेधातिथि भाष्‍य
ऊँट को छोडकर एक ओर दांवालों में गाय, भेड, बकरी और मृग भक्ष्‍य अर्थात खाने योग्‍य है

महाभारत में रंतिदेव नामक एक राजा का वर्णन मिलता है जो गोमांस परोसने के कारण यशवी बना. महाभारत, वन पर्व (अ. 208 अथवा अ.199) में आता है
राज्ञो महानसे पूर्व रन्तिदेवस्‍य वै द्विज
द्वे सहस्रे तु वध्‍येते पशूनामन्‍वहं तदा
अहन्‍यहनि वध्‍येते द्वे सहस्रे गवां तथा
समांसं ददतो ह्रान्नं रन्तिदेवस्‍य नित्‍यशः
अतुला कीर्तिरभवन्‍नृप्‍स्‍य द्विजसत्तम ---- महाभारत, वनपर्व 208 199/8-10

अर्थात राजा रंतिदेव की रसोई के लिए दो हजार पशु काटे जाते थे. प्रतिदिन दो हजार गौएं काटी जाती थीं
मांस सहित अन्‍न का दान करने के कारण राजा रंतिदेव की अतुलनीय कीर्ति हुई.
इस वर्णन को पढ कर कोई भी व्‍यक्ति समझ सकता है कि गोमांस दान करने से यदि राजा रंतिदेव की कीर्ति फैली तो इस का अर्थ है कि तब गोवध सराहनीय कार्य था, न कि आज की तरह निंदनीय

रंतिदेव का उल्‍लेख महाभारत में अन्‍यत्र भी आता है. शांति पर्व, अध्‍याय 29, श्‍लोक 123 में आता है कि राजा रंतिदेव ने गौओं की जा खालें उतारीं, उन से रक्‍त चूचू कर एक महानदी बह निकली थी. वह नदी चर्मण्‍वती (चंचल) कहलाई.

महानदी चर्मराशेरूत्‍क्‍लेदात् संसृजे यतः
ततश्‍चर्मण्‍वतीत्‍येवं विख्‍याता सा महानदी

कुछ लो इस सीधे सादे श्‍लोक का अर्थ बदलने से भी बाज नहीं आते. वे इस का अर्थ यह कहते हैं कि चर्मण्‍वती नदी जीवित गौओं के चमडे पर दान के समय छिडके गए पानी की बूंदों से बह निकली.
इस कपोलकप्ति अर्थ को शाद कोई स्‍वीकार कर ही लेता यदि कालिदास का 'मेघदूत' नामक प्रसिद्ध खंडकाव्‍य पास न होता. 'मेघदूत' में कालिदास ने एक जग लिखा है

व्‍यालंबेथाः सुरभितनयालम्‍भजां मानयिष्‍यन्
स्रोतोमूर्त्‍या भुवि परिणतां रंतिदेवस्‍य कीर्तिम

यह पद्य पूर्वमेघ में आता है. विभिन्‍न संस्‍करणों में इस की संख्‍या 45 या 48 या 49 है. इस का अर्थ हैः ''हे मेघ, तुम गौओं के आलंभन (कत्‍ल) से धरती पर नदी के रूप में बह निकली राजा रंतिदेव की कीर्ति पर अवश्‍य झुकना.''



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" हे यज्ञभिलाषी इंद्र! तुम अपने निंदक का धन छीन कर बहुत प्रसन्न होते हो , हे अधिक धन वाले इंद्र ! हमारी रक्षा के लिए तुम हमें अपनी दोनों जांघो के बीच छुपा लो एंव हमसे द्वेष करने वाले दासो को आयुधों में मार डालो" - ऋग्वेद, मंडल 8 , सूक्त 59, मन्त्र 10 ( सायण भाष्य)

इस मन्त्र में इंद्र से प्रार्थना की जा रही है की वह यज्ञ विरोधी दासो का धन छीन ले तथा और यज्ञकर्ताओ को दे दे, यज्ञ विरोधियो को मार दे ।

अब इसी मंडल के इसी सूक्त का अगला मन्त्र देखिये -
" धनी इंद्र संग्राम में शत्रुओ से छीनी हुई गायो को एंव उनके बछड़ो को कान पकड़ कर हमारे पास इस प्रकार ले आवे , जिस प्रकार बालक बकरी को पानी पिलाने ले जाता है "- मन्त्र 15

इस मन्त्र में यज्ञकर्ता इंद्र से प्रार्थना कर रहें हैं की जो उसने लूटी हुई या छीनी हुई गाये हैं उनको दान दे दें या उपहार स्वरूप् उन छीनी हुई गायों और बछड़ो को उन्हें दे दें ।

यह बड़ी विचित्र बात है की ब्राह्मण हमेशा से ही दान में गायो को ही मांगता था , गौ दान को उसने सबसे बड़ा दान घोषित किये हुए था । वेदों में ऐसे कई और मन्त्र हैं जन्हा गाय पाने की अभिलाषा ब्राह्मण कर रहा है , फिर चाहे वह लूटी हुई हो या दानकर्ता की स्वयं की । उपनिषदों में भी ब्राह्मण का गया के प्रति लालच साफ़ देखने को मिलता है जैसे रैक्व ऋषि को जनश्रुति पहले कम गाय देता है जिससे रैक्व नाराज हो जाता है बाद में जनश्रुति अधिक गायो के साथ अपनी कन्या भी रैक्व को देकेप्रसन्न करता है ।परशुराम के पास दस हजार से अधिक गाये एकत्रित हो गई थीं।

अब ब्राह्मण को गाय क्यों चाहिए होती थी या गाय क्यों प्रिय थी यह आपको बताता हूँ , जो मैंने सबसे पहला मन्त्र दिया है ऋग्वेद का उसमे इंद्र द्वारा यज्ञविरोधीयो से उनका धन छीन लेने की बात हो रही है । दासो को मारने की बात हो रही है । ऐसा क्यों है? दास कौन थे और उनका धन क्या था ?
दास दरसल अनार्य, असुर, दस्यु थे जो भारतीय थे , जिनका मुख्य पेशा खेती और पशु पालन था । जब आर्य ब्राह्मण भारत में प्रवेश करता है तो वह अपने आस पास देखता है की वह जो सभ्यता लाया है उससे अधिक उन्नत सभ्यता यंहा की है । उससे अधिक सम्पन्नता अनार्यो की है । अनार्य जन गाय पाले हुए हैं और उनकी समृद्धि का मुख्य स्रोत गाय ही है । गाय के बछड़े को ही बैल बन जाने पर कृषि की जाती है । उसके दूध दही से आदि से लोग हस्ट्पुष्ट थे । दूध बिलोने के लिए मुख्य औजार बिलौनी थी , अनाज कूटने के लिए मूसल थे । इन दोनों का जिक्र ऋबेद में आर्य ब्राह्मणों ने किय है।

यह आपको आस्चर्य होगा की लोग वेदों में आधुनिक विज्ञानं जैसे हवाई जहाज तक प्रयोग होने को सिद्ध कर देते हैं पर उन महाज्ञानी आर्य ब्राह्मणो को मिक्सी या और किचन उपकरणों के बारे में नहीं पता था , बेचारे हाथ से मथते थे दूध ।

आप सबको पता ही है की कृषको का मुख्य धन पशु ही होता है ,और गाय उस समय के अनार्यो का मुख्य धन थी । अत: आर्य ब्राह्मणों ने सबसे पहले अनार्यो के पशुधन पर ही कब्ज़ा करना शुरू किया जिसमें गाय मुख्य थी । इसके लिए आर्य ब्राह्मणों ने युद्ध लड़े और जंहा युद्ध से बात नहीं बनी तो वंहा छीना झपटी की और जँहा छीना झपटी से बात नहीं बनी वंहा दान लीं।

- संजय..
 

 

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