महमूद गजनवी, सोमनाथ मन्दिर, पंडे पुजारी और स्वामी दयानंद।
स्वामी दयानंद जी मूर्ति पूजा के उतने ही खिलाफ थे जितना मुसलमान बुतपरस्ती बोल कर हिंदुओं से नफरत करते है। वेदों के ज्ञान के कट्टर समर्थक थे। 1875 को उन्होंने एक पुस्तक लिखी सत्यार्थ प्रकाश। महमूद गजनवी ने सोमनाथ मन्दिर को लुटा यह तो सब जानते है लेकिन यह संभव कैसे हुआ? विदेश से कोई कितनी सेना लेे कर आ सकता है ? पंजाब से दाखिल हुई वह सेना गुजरात के सोमनाथ तक बिना रोक रोक कैसे पहुंच गई ? भारतीय राजे तो अपने घर में थे तो मुकाबला क्यों नहीं हुआ ? स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने लिखा कि गजनवी के पास 30000 सेना था जबकि देसी राजाओं के पास 2 से 3 लाख सेना मौजूद थीं लड़ने के लिए। लेकिन ब्राह्मणों ने मुहूर्त के नाम पर राजाओं को आगे जा के लड़ने की मंजूरी नहीं दी।150 से 200 कोस दूर थी जब सेना तभी से पता था कि गजनवी मंदिर को लूटने आए रहा है। उप्र से पंडितों ने यह प्रचारित कर दिया कि मलेछ लोगों का मुंह नहीं देखना है, छूना तो दूर की बात। फिर बार बार महादेव को प्राथना की जाती थी कि दुश्मनों का नाश करो, हम भक्तों को बचाओ। राजाओं को विश्वास दिलाया गया कि महादेव खुद मन्दिर कि रक्षा करेंगे।
महमूद गजनवी ने मन्दिर के पास एक पहाड़ी पर से तोप से मन्दिर पर गोला दाग दिया, बस फिर सभी भाग गए क्योंकि मुस्लिमो को तो देखना भी नहीं था।
स्वामी जी बताया कि सोमनाथ मन्दिर की मूर्ति जो शिव शंकर की थी, लोहे की थी जो हवा में स्थिर थी। दीवारों में मूर्ति के चारो तरफ चुम्बक लगाया हुआ था जिसके प्रभाव से मूर्ति हवा में टिकी हुई थीं। लोगों को मूर्ख बना कर पहले ही दिन लाखो रुपए जमा कर लिए थे और जमा होते होते करोड़ों रुपए जमा हो चुके थे। इसी खजाने को तो गजनवी लूटने आया था।
दयानंद जी लिखते है कि गजनवी ने राजाओं और ब्राह्मणों को पकड़ कर पीटा। पंडितों ने हाथ जोड़ कर कहा कि इस मूर्ति से हमारी कमाई चलती है इसको मत तोड़ो और 3 करोड़ देने का भरोसा दिया। गजनवी बोला कि हम मूर्तियां नहीं बेचते हम तो तोड़ते हैं। मूर्ति भी तोड़ी, मूर्ति में ही कीमती हीरे जवाहरात थे। फिर पीट पीट कर बाकी खजाना भी निकलवा लिया । फिर ब्राह्मणों को भी पकड़ कर साथ लेे गया । बोला कि तुमने बहुत लूट मचा रखी थी। इनके जनेऊ तोड़ कर मुंह में थूका। सूखे चने खाने को देता था। मुस्लिमो के झूठे बर्तन मांजने को देता था। मक्का के लोग कहते थे कि कुरान में इन्हीं काफिरों को मारने के लिए लिखा है।
क्या छवि बनाई है हमारे देश की। किसने ? ब्राह्मणों को कुछ नहीं कहने दिया जाएगा। दोष होगा स्वामी दयानंद सरस्वती जी का, उनकी किताब सत्यार्थ प्रकाश का। या होगा मेरा, क्योंकि किताब के बारे में क्यों बताया।
अशोक तर्कशील
*****
भक्त सूरदास के नाम बादशाह अकबर का पत्र
जो बताता है कि अकबर अपनी हिन्दू प्रजा का कितना खयाल रखता था!
अकबर के शासन काल की घटना है। संवत 1645 में काशी के हाकिम ने वहां की हिन्दू प्रजा के प्रति भेदभाव बरतना आरंभ किया। फरियादी हिन्दुओं ने न्याय पाने के लिए भक्त कवि सूरदास से संपर्क किया को की उन दिनों काशी में प्रवास कर रहे थे। सूरदास ने काशी के तत्कालीन मुगल हाकिम के अनाचारों को प्रकट करते हुए बादशाह अकबर को पत्र लिखा।
भक्त सूरदास के उक्त पत्र को पढ़ कर अकबर को काशी के हाकिम के ऊपर बहुत क्रोध आया। अकबर ने अपने प्रधान मंत्री अबुल फजल से कह कर भक्त सूरदास को यह पत्र भेजा।
पत्र इस प्रकार है -
" परमात्मा को पहचानने वाले ब्राह्मणों योगियों संन्यासियों महापुरुषों के शुभ चिंतन और तपस्या से ही बादशाहों का कल्याण होता है। साधारण से साधारण बादशाह भी अपनी मति के विपरित भगवत भक्तों की आज्ञा का पालन करते हैं। तब को बादशाह धर्म नीति और न्याय परायण हैं, वह तो भक्तों की इच्छा के विपरित चल ही नहीं सकता। मैंने आपकी विद्या और सद्बुद्धि की प्रशंसा निष्कपट आदमियों से सुनी है। मैंने आपको अपना मित्र माना है। आपके पत्र से पता चला है कि काशी के करोड़ी का बर्ताव अच्छा नहीं है। अबुल फजल लिखते हैं कि बादशाह को यह सुन पर बहुत बुरा लगा है। बादशाह ने उस हाकिम को बर्खास्तगी का फरमान लिख दिया है। अब नए करोड़ी की नियुक्ति का भार बादशाह ने आपके ऊपर छोड़ा है। इस तुच्छ अबुल फजल को हुक्म हुआ है कि आपको इसकी सूचना दे दे। आशा है कि आप ऐसा करोड़ी चुनेंगे जो कि गरीब और दुःखी प्रजा का समस्त भारत सम्हाल लेे। आपकी सिफ़ारिश आने कर बादशाह उसकी नियुक्ति करेंगे। बादशाह आपमें खुदा की रहमत देखते हैं इसलिए आपको यह तकलीफ दी है। काशी में ऐसा हाकिम होना चाहिए जो आपके सलाह के मुताबिक काम करे। कोई खत्री जिसे आप काबिल समझें ऐसा व्यक्ति जो ईश्वर को पहचान कर प्रेम से प्रजा का लालन पालन करे। उसका नाम आपकी तरफ से आने पर उसे प्रजा का करोड़ी बना दिया जाएगा। परमेश्वर आपको सत्कर्म करने की श्रद्धा दे और आपको सत्कर्म करने के ऊपर स्थिर रखे"
विशेष सलाम
आपका
अबुल फ़ज़ल
अकबर के पास अपने साम्राज्य के अंधे( मैं सूरदास को दृष्टिहीन नहीं लिख पा रहा और दिव्यांग लिखना नहीं चाह रहा) कवि की बात सुनने और उसके कहे पर अपने बड़े ओहदेदार को हटाने की सूझ और सलाहियत थी। उसने एक तरह से अपने समय के कवियों को हाकिम नियुक्त करने के अधिकार दे रखे थे। काशी की इस घटना के बाद आगे कभी अकबर सूरदास से मिलने वृंदावन गया भी था।
पत्र की भाषा बताती है कि क्यों अकबर के समकालीन भक्त कवि और प्रजा उसके साथ रही होगी। क्यों अकबर के देहांत पर जौनपुर में पंद्रह दिन शोक मनाया गया होगा। क्योंकि अकबर ने उन "विधर्मी" कवियों को अपना मित्र मानता था और वे कवि अपने समय के साम्राज्य में हस्तक्षेप करने का हक रखते थे। वे अपने को समाज और सरकार के नियंताओं में भी पाते थे।
अगर अकबर हिन्दू उत्पीड़क होता तो क्या वह संत सूरदास के कहे पर भेदभाव करने वाले काशी के हाकिम को बदलता और उनसे कहता की वे काशी का नया हाकिम चुन कर नियुक्त करें!
अगर अकबर हिन्दू विरोधी होता तो क्या सूरदास उसे पत्र लिख कर शिकायत करने की सोचते?
यह सोचने वाली बात है!
नोट: जिस सूबे का कर ढाई लाख होता था, वहां का हाकिम करोड़ी कहलाता था
सूरदास के पत्र का संदर्भ: भारतीय संस्कृति: वी. एन. पांडे, पृष्ठ 108-109
बोधिसत्व, मुंबई
Bodhi Sattva
जो बताता है कि अकबर अपनी हिन्दू प्रजा का कितना खयाल रखता था!
अकबर के शासन काल की घटना है। संवत 1645 में काशी के हाकिम ने वहां की हिन्दू प्रजा के प्रति भेदभाव बरतना आरंभ किया। फरियादी हिन्दुओं ने न्याय पाने के लिए भक्त कवि सूरदास से संपर्क किया को की उन दिनों काशी में प्रवास कर रहे थे। सूरदास ने काशी के तत्कालीन मुगल हाकिम के अनाचारों को प्रकट करते हुए बादशाह अकबर को पत्र लिखा।
भक्त सूरदास के उक्त पत्र को पढ़ कर अकबर को काशी के हाकिम के ऊपर बहुत क्रोध आया। अकबर ने अपने प्रधान मंत्री अबुल फजल से कह कर भक्त सूरदास को यह पत्र भेजा।
पत्र इस प्रकार है -
" परमात्मा को पहचानने वाले ब्राह्मणों योगियों संन्यासियों महापुरुषों के शुभ चिंतन और तपस्या से ही बादशाहों का कल्याण होता है। साधारण से साधारण बादशाह भी अपनी मति के विपरित भगवत भक्तों की आज्ञा का पालन करते हैं। तब को बादशाह धर्म नीति और न्याय परायण हैं, वह तो भक्तों की इच्छा के विपरित चल ही नहीं सकता। मैंने आपकी विद्या और सद्बुद्धि की प्रशंसा निष्कपट आदमियों से सुनी है। मैंने आपको अपना मित्र माना है। आपके पत्र से पता चला है कि काशी के करोड़ी का बर्ताव अच्छा नहीं है। अबुल फजल लिखते हैं कि बादशाह को यह सुन पर बहुत बुरा लगा है। बादशाह ने उस हाकिम को बर्खास्तगी का फरमान लिख दिया है। अब नए करोड़ी की नियुक्ति का भार बादशाह ने आपके ऊपर छोड़ा है। इस तुच्छ अबुल फजल को हुक्म हुआ है कि आपको इसकी सूचना दे दे। आशा है कि आप ऐसा करोड़ी चुनेंगे जो कि गरीब और दुःखी प्रजा का समस्त भारत सम्हाल लेे। आपकी सिफ़ारिश आने कर बादशाह उसकी नियुक्ति करेंगे। बादशाह आपमें खुदा की रहमत देखते हैं इसलिए आपको यह तकलीफ दी है। काशी में ऐसा हाकिम होना चाहिए जो आपके सलाह के मुताबिक काम करे। कोई खत्री जिसे आप काबिल समझें ऐसा व्यक्ति जो ईश्वर को पहचान कर प्रेम से प्रजा का लालन पालन करे। उसका नाम आपकी तरफ से आने पर उसे प्रजा का करोड़ी बना दिया जाएगा। परमेश्वर आपको सत्कर्म करने की श्रद्धा दे और आपको सत्कर्म करने के ऊपर स्थिर रखे"
विशेष सलाम
आपका
अबुल फ़ज़ल
अकबर के पास अपने साम्राज्य के अंधे( मैं सूरदास को दृष्टिहीन नहीं लिख पा रहा और दिव्यांग लिखना नहीं चाह रहा) कवि की बात सुनने और उसके कहे पर अपने बड़े ओहदेदार को हटाने की सूझ और सलाहियत थी। उसने एक तरह से अपने समय के कवियों को हाकिम नियुक्त करने के अधिकार दे रखे थे। काशी की इस घटना के बाद आगे कभी अकबर सूरदास से मिलने वृंदावन गया भी था।
पत्र की भाषा बताती है कि क्यों अकबर के समकालीन भक्त कवि और प्रजा उसके साथ रही होगी। क्यों अकबर के देहांत पर जौनपुर में पंद्रह दिन शोक मनाया गया होगा। क्योंकि अकबर ने उन "विधर्मी" कवियों को अपना मित्र मानता था और वे कवि अपने समय के साम्राज्य में हस्तक्षेप करने का हक रखते थे। वे अपने को समाज और सरकार के नियंताओं में भी पाते थे।
अगर अकबर हिन्दू उत्पीड़क होता तो क्या वह संत सूरदास के कहे पर भेदभाव करने वाले काशी के हाकिम को बदलता और उनसे कहता की वे काशी का नया हाकिम चुन कर नियुक्त करें!
अगर अकबर हिन्दू विरोधी होता तो क्या सूरदास उसे पत्र लिख कर शिकायत करने की सोचते?
यह सोचने वाली बात है!
नोट: जिस सूबे का कर ढाई लाख होता था, वहां का हाकिम करोड़ी कहलाता था
सूरदास के पत्र का संदर्भ: भारतीय संस्कृति: वी. एन. पांडे, पृष्ठ 108-109
बोधिसत्व, मुंबई
Bodhi Sattva



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