Thursday, 18 March 2021

सती, दासी।

सती प्रथा।
हिन्दू धर्म को महान मानने वाले पोस्टें डालते है कि जाती प्रथा, सती प्रथा हिन्दू धर्म का हिस्सा नहीं है। यह मुगलों के शासन में बुराइयां अाई।  औरतों पर मुगलों द्वारा अत्याचारों से बचाने के लिए हिन्दू धर्म में सती प्रथा का चलन हुआ।

एक है ब्रह्मवैवर्त पुराण जिसमें परशुराम की माता रेणुका द्वारा अपने पति जमदग्नि के साथ सती होने का बिल्कुल स्पष्ट विवरण है। सती का अर्थ अपने पति को दोबारा फिर पा लेना और जन्मों जन्मों के साथ को निभाना है । रेणुका परशुराम समेत अपने पुत्रो के सामने सोच समझ कर भृगु ऋषि के कहने से सती हुई।

1656 से 1668 तक भारत में रहने वाले फ्रांसीसी पर्यटक, बर्नियर और इन 12 सालों में दारा शिकोह व औरंगजेब के दरबार में 8 साल शाही हाकिम बन कर रहा, ने अपनी किताब में  सती प्रथा के बारे में लिखा। उसका कहना है कि मुगल इस प्रथा के बिल्कुल खिलाफ थे लेकिन हिंदुओं के धार्मिक विश्वास में उनके गुस्से से बचने के लिए दखल देना पसंद नहीं करते थे। लेकिन फिर भी उन्होंने यह किया कि जिस औरत का पति मर जाएं उसको शहर का कोतवाल, मुस्लिमो औरतों के पास भेजता था। उस औरत को समझा बुझा कर सती होने से रोका जाता था । सुरक्षा की गारंटी भी दी जाती थी। लेकिन जो खुद सती होने का दृढ़ इरादा रखती हो उसी को इजाजत मिलती थी। जहां मुस्लिम शासन नहीं था वहीं सती ज्यादा होती थी।

हमे अंध हिन्दू वादी यह भी बताते है कि विदेशों में हिन्दू ग्रंथो और हिन्दू धर्म पर शोध हो रहें है। वह भी हिन्दू धर्म ग्रंथो का लोहा मानते है।

बर्नियर  विदेशी ने क्या लिखा , वह तो बड़ा विषय है लेकिन सती प्रथा व मुस्लिम शासक के संबंध में जो लिखा, वह किताब का संबंधित पन्ना व ब्रह्मवैवर्त पुराण का पन्ना नीचे पोस्ट है। विदेशी तो हिन्दू धर्म के बारे में जानते है लेकिन हम हिन्दू हो कर भी हिन्दू धर्म को नहीं जानते। भ्रमजाल बहुत बड़ा है।



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यज्ञ विरोधी पौराणिक शंकर 
राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ किया परन्तु किसी आपसी मतभेद अथवा ईर्ष्या के कारण शिव को आमंत्रित नही किया | तब अपने पति को यज्ञ में न बुलाने के कारण सती ने अपना शरीर त्याग कर दिया (आत्महत्या महा पाप होता है ) इस पर शिव अति क्रोधित हुए और अपनी जटाओ से वीरभद्र को उत्त्पन किया और वीर भद्र ने यज्ञ में कैसा विघ्न्य्य डाला वो आप शिव पुराण सती खंड से पढ़े -
" जंगली प्राणियों का नाश करने वाले सिंह की तरह वीरभद्र चारो और देख रहा था , तब वीर प्रतापी मणिभद्र ने भृगु को पैर से दबोच लिया और उसकी दाड़ी उखाड़ ली (इस पारिवारिक विवाद में भला इस शांत ऋषि का क्या दोष ) चंड ने पूषा के दांत उखाड़ लिए | नंदी ने क्रोध से भग की दोनों आंखे निकाल ली | स्वाहा ,स्वधा ,मन्त्र तन्त्र जो भी वहा थे उन सभी ने शिव के गणों पर प्रहार किया | क्रुद्ध होकर शिव के गणों ने यज्ञ की अग्नि में मल मूत्र डाल दिया (छि छि छि .....) और यज्ञ की अत्यंत दुर्गति कर डाली | 
शिव के गण वीर भद्र ने दक्ष की छाती पर चढ़ कर हाथो से फाड़ डाला .वीर भद्र ने दक्ष का सर काट कर यज्ञ कुंड में फैंक दिया | और भी अन्य लोगो को वीर भद्र ने यज्ञ कुंद में डाल कर जला कर मार डाला और फिर खिलखिलाकर बड़े जोर से हसा |
(शिव पुराण -सती खंड अध्याय ३६ श्लोक संख्या ५२ से ६३ )
मित्रो यदि कोई लडकी अपने पिता की आज्ञया बिना किसी दुसरे लडके से विवाह कर ले तो पिता का क्रोधित होना स्वाभिक है लेकिन इस पर आत्महत्या करना दर्शाता है कि एक देवी में भी आज की भारतीय लडकियों से भी कम धैर्य था | क्या एक यज्ञ में आमन्त्रण न देने के लिए ऐसा कार्य उचित था .....
यज्ञ को सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों में सर्वोतम कर्म कहा है | आज के वैज्ञानिक युग में यह सिद्ध हो चूका है की पर्यावरण को स्वच्छ रखने के लिए अग्निहोत्र उत्तम उपाय है ..ऐसे यज्ञ में शिव के गणों का यज्ञ में रक्त ,मॉस ,और मूतना ,मल डालना कितना घ्रणित और निंदनीय कार्य है | 
इन शिव और उनके गणों से अच्छे वो नास्तिक महात्मा बुद्ध (विनय पीतक ,मझिम के कुछ अंशानुसार ) ही अच्छा था जिसने यज्ञ में जीव हत्या का ही विरोध किया लेकिन यज्ञ में इस तरह विघ्न और बाधाये नही डाली (वैदिक शास्त्रों अनुसार भी यज्ञ में रक्त ,मॉस और अपवित्र पदार्थ प्रयोग का निषेध है ) बुद्ध ने यज्ञ के महत्व को बढावा भी दिया था ...सुतनिपात सेल सूक्त में कहा है " सावत्री छ्न्द्सो मुख्यम ,,अग्निहोत्र मुखम ...अर्थात छन्दों में सावित्री छंद मुख्य है और अग्निहोत्र मुख्य कर्तव्य है | 
कूटद्न्तुक सूक्त में बुद्ध ने एक यज्ञ में पुरोहित बन यज्ञ भी कराया था और स्वच्छ और पवित्र यज्ञ करने का उपदेश दिया ...
बुद्ध हिंसक यज्ञो के विरोधी थे लेकिन यज्ञो के नही जो की सभी को होना चाहिय क्यूंकि यज्ञ में हिंसा यज्ञ का अपमान है ...बुद्ध यज्ञ का पर्यावर्णीय महत्व जानते थे नास्तिक हो कर भी लेकिन पौराणिक शंकर नही ...

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अगर यह कहा जाये कि पौराणिक-काल के ऋषि-मुनि समाज के "छुट्टा सांड़" होते थे, तो इससे किसी को आपत्ति नही होनी चाहिये।
पुराणों और दूसरें ग्रंथों को पढ़ने से कम से कम दिमाग मे यही बात आती है कि पुरातन-काल मे जो ऋषि थे, उसमे से अधिकांश मैथुन के मामले मे पशुवत-वृत्ति वाले थे।
पुराणों के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन आर्य-राजाओं की ऐसी लालसा होती थी कि उनकी संतति अच्छी उत्पन्न हो, अतः वे खुशी-खुशी अपनी रानियों को गर्भवती करने के लिये ऋषियों की शरण मे जाया करते थे। उनकी दृष्टि मे ये ऋषि "कुलीन सांड़" होते थे, और मै यह बात ऐसे ही नही कह रहा हूँ, नीचे कुछ प्रमाण भी देता हूँ-

........ सत्यकाम जबाल की कथा लगभग सभी को मालुम है! कई लोग इस कथा को उदाहरण-स्वरूप भी बताते हैं कि किस तरह एक गणिका-पुत्र जबाल ऋषि बन गये थे।
वैसे यह कथा छान्दोग्योपनिषद चतुर्थखण्ड (चित्र-1-3) मे लिखी है! इस कथा को एक झूठ के साथ बताया जाता है कि सत्यकाम की माँ जबाला गणिका (वैश्या) थी। वास्तव मे जबाला गणिका नही थी, वह शादीशुदा थी और बहुत सारे अथितियों की सेवा-टहल करती थी। 
                 जब सत्यकाम अपनी माँ से पूँछते हैं कि माँ मेरा गोत्र क्या है?
                 तब जबाला कहती है कि हे पुत्र! मै अपने पति के घर आये बहुत सारे अतिथियों की सेवा करने वाली परिचायिका थी, और उन्ही जवानी के दिनों मे मैने तुम्हे जन्म दिया था! अतः मुझे नही मालुम कि तुम्हारा गोत्र क्या है?

         अब इस कथा का गीताप्रेम वाले चाहे जितना लीपापोती करके भाष्य करें, पर सच यही था कि जबाला को यह पता ही नही था कि उसने किस पुरुष के संसर्ग से सत्यकाम को पैदा किया था। और तो और जबाला यह सारे कर्म तब से करती थी, जब उसके पति जीवित भी थे।

........ ऋषियों के रंगीन-मिजाजी वाली कहांनियों से पुराण भरे पड़े हैं, पर यहाँ मै उन कथाओं का उल्लेख करना चाहता हूँ, जिसे कम लोग जानते हैं।
                 ऐसी ही एक कथा महाभारत के उधोगपर्व (अध्याय-103 से 123 तक) मे माद्री की आती है! 
          माद्री राजा ययाति के कुल से थी, फिर भी उसे एक के बाद एक कई ऋषियों के साथ सहवास करना पड़ता है, और जब सारे ऋषियों का मन माद्री से भर जाता है तो वे उसे पुनः राजा ययाति को वापस लौटा देते हैं।

             एक अन्य कथा महाभारत के "आदिपर्व" मे महर्षि उतथ्य की आती है, जो ऋषि अंगिरस के कुल के थे।
         महर्षि उतथ्य की पत्नि ममता बहुत सुन्दर थी, और उतथ्य का छोटा भाई वृहस्पति (जो देवऋषि माने गये हैं) ममता पर आसक्त था। एक दिन जब ममता घर मे अकेली थी तो वृहस्पति ने मौका देखकर ममता से सम्भोग करना चाहा, जिस पर ममता ने यह कहकर मना कर दिया कि " अभी मै गर्भवती हूँ, अतः आप प्रतिक्षा करो"
सोचने वाली बात यह है कि यहाँ ममता ने वृहस्पति को फटकारा नही, और न ही यह कहा कि यह अनैतिक है। केवल इंतजार करने के लिये कहा! इससे ऐसा लगता है कि ममता और वृहस्पति के बीच अनुचित सम्बन्ध रहे होंगे! हालांकि वृहस्पति ममता के इस अर्ध-इनकार से भी इतने नाखुश हुये कि उन्होने ममता को श्राप दे दिया कि तेरा पुत्र अंधा पैदा होगा। हुआ भी वही, ममता के पुत्र ऋषि दीर्घतमा अंधे ही पैदा हुये।
वैसे, यहाँ यह भी जान लेना चाहिये कि खुद वृहस्पति की पत्नि तारा को इनके ही शिष्य चन्द्र उठा ले गये थे, और उससे सहवास करके "बुध" नामक पुत्र को पैदा किया था। आगे चलकर इसी गुरूपत्नि-पुत्र बुध से चंद्रवंशीय क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई।

........ पूर्वकाल मे ऋषि किस कदर कामान्ध होते थे, इसका एक उदाहरण डा० अम्बेडकर ने अपनी बहुचर्चित किताब "रिडल इन हिन्दुइज्स" के पृष्ठ-298 (चित्र-4-5) पर उल्लेख किया है!
               अम्बेडकर ने लिखा है कि पूर्वकाल मे यदि कोई ऋषि यज्ञ कर रहा होता था, और यदि उसी समय वह किसी स्त्री से संभोग करना चाहता था तो ऋषि यज्ञ को अधूरा छोड़कर एकांत मे जाने के बजाए यज्ञ-मण्डप मे ही खुलेआम उस स्त्री से मैथुन कर सकता था। बाद मे इस घृणित-कृत्य को भी "वामदेव व्रत" नामक धार्मिक विधान बना दिया गया, और कालान्तर मे यही 'वाममार्ग' कहलाया।

........ रंगीन-ऋषियों की सूची और भी लम्बी है, जिसमे पराशर, कर्दम, विभण्डक और दीर्घतमा के नाम मुख्य हैं, पर इसी पोस्ट मे सारी कथाऐं लिखना सम्भव नही है।

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पर्वत उड़ना।