Thursday, 18 March 2021

शिवलिंग।

शिव लिंग 
शिव लिंग है क्या है ? उसका  आकार ऐसा क्यों हैं? मजाक वाली बातें क्यों बनती हैं ? जो बचाव में बातें हिन्दू प्रेमी बताते है क्या वह सही है ? पहली नजर में शिव लिंग और शिव लिंग के नीचे वाला आधार देख कर मनचलों द्वारा मजाक वाली बातें ही सही लगती है। बाजार में नीचे वाला हिस्सा और ऊपर वाला हिस्सा अलग अलग भी बिकते है।

गूगल पर सर्च करने से अलग अलग जानकारियां मिलती है। यह शिव का प्रतीक है, लिंग का अर्थ सिर्फ जन्न इन्द्रिय  ही नहीं होता वगेरह वगेरह।

एक गूगल पर ऐसा आर्टिकल भी मिला ( लिंक नीचे पोस्ट किया जाएगा ) कि शिव सती के वियोग में नंगे हो कर ही घूमने लगे जिससे ऋषि मुनि लोगों की पत्नियां भी शिव पर मोहित हो कर लिपटने लगी। जब ऋषि मुनियों ने देखा तो क्रोधित हो गए और उनके शाप से शिव का लिंग कट कर पृथ्वी पर गिर गया।  ( बाल्मीकि रामायण में इन्द्र ने जब अहिल्या से संभोग किया तब उस के पति गौतम के शाप से इन्द्र के अंड कोष ही गिर गए थे और फिर इन्द्र को भेड़ के अंडकोष लगाए गए।)

लिंग पुराण  ( जो मैं पढ़ रहा हूं ) भूमिका में ही बताया गया है कि लिंग का अर्थ वह नहीं है तो मजाक बनने वाले करते हैं। लेकिन इसी लिंग पुराण में शिव के नग्न घूमने और ऋषि मुनियों के कुपित होने वाली कथा भी है लेकिन ऋषि मुनियों के शाप से शिव के लिंग धरती पर कट के गिरने की बात नहीं है । इस कथा के मुताबिक शिव ऋषि मुनि जो उसी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे की परीक्षा लेने के लिए नंगे हो कर उन ऋषि मुनियों की औरतों में काम पैदा किया था। एक यूं ट्यूब वीडियो में बताया गया है कि धरती पर गिरे हुए लिंग ने अग्नि से प्रलय मचा दी। ऋषियों ने ब्रह्मा से उपाय पूछा, ब्रह्मा ने शिव के पास ही भेजा। शिव ने बताया कि इसको पार्वती ही धारण कर सकती है। ऋषियों ने पार्वती को प्रसन्न किया तब पार्वती ने उस कटे हुए लिंग को अपनी योनि में धारण किया। लिंग पुराण में फिर इसके आगे आज कल के हालात में मजाक बनने वाली बात भी है। यही ऋषि मुनि जो शिव पर कुपित थे ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने बताया कि तुम ऋषि मुनियों ने गलत किया है । अगर कोई अतिथि घर पर आए तो उसका हर प्रकार से सम्मान करना चाहिए। फिर एक कथा सुनाई ब्रह्मा ने इन ऋषि मुनियों को जिसमें पति ने अपनी पत्नी को शिक्षा दी थी कि अतिथि का हर तरह से सम्मान करना है अपना शरीर भी अतिथि को दिया जा सकता है। धर्म ने परीक्षा लेने के लिए उसकी पत्नी से उसी का शरीर संभोग के लिए मांगा। पत्नी ने पति की शिक्षा के अनुसार मना नहीं किया और खुद को सौंप दिया। तभी पति आया और धर्म ने आवाज दे कर कहा कि मै आप की पत्नी के साथ संभोग कर रहा हूं अभी रुकिए। तब पति ने  कहा ठीक है आप बेफिक्री से करिए में बाद में आता हूं। ब्रह्मा के उपदेशों और कथा को सुन कर ऋषि मुनियों को पछतावा हुआ  और फिर शिव को खुश किया। शिव ने फिर बताया कि अल्फ नंगे भस्म लगाए लोग मेरा ही रूप हैं उनका कभी तिरस्कार नहीं करना है।

वैसे  शिव भक्तों के बचाव के लिए लिंग पुराण में एक दूसरी कथा भी है। जिसमे ब्रह्मा और विष्णु में लड़ाई हुई कि दोनों में बड़ा कोन। तभी एक बड़ा लंबा  लिंग प्रगट हो गया जिसका आदि और अंत समझ ही नहीं आता। ब्रह्मा और विष्णु ने आपस में फैसला किया कि विष्णु पाताल में सिरा ढूंढेगा और ब्रह्मा ऊपर जा कर दूसरा छोर देखेगा और जो पहले छोर प्राप्त करेगा वह बड़ा। दोनों ही छोर नहीं ढूंढ़ पाए। तब शिव प्रगट हुए। दोनों का घमंड चूर हुआ। यही से शिव लिंग की शुरुआत हुई।

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत में श्री कृष्ण युधिष्ठर को बताते है कि सबसे पहले ब्रह्मा ने शिव को धरती पर सब भूतों, प्रजाओं को उत्पन्न करने को कहा। लेकिन शिव भूतों में नाना प्रकार के दोष देखकर पानी में  समा गए और तप करने लगे।जब काफी समय बीत गया तब ब्रह्मा ने दूसरा सृष्टि करता उत्पन्न कर के उसको सब प्रजाओं भूतों को उत्पन्न करने को कहा। जब सब प्रजाएं उत्पन्न होकर स्थापित हो गई ।तब शिव ने देख कर  जब ऐसा देखा तो कुपित हो कर अपना लिंग काट कर धरती पर फेंक दिया। ब्रह्मा ने जब कारण पूछा तो बोले कि जब जब सृष्टि पैदा हो ही गई है तो इस लिंग का क्या काम।

https://m.dailyhunt.in/news/india/hindi/azab+gazab-epaper-azabgaz/kaise+utpann+huaa+shivaling+jane+shivaling+ke+bare+me+10+bate-newsid-85810570

https://youtu.be/3BS-29_AlRg



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पद्म पुराण के अनुसार शिवलिंग की पूजा करने वाला पाखंडी है .शिव लिंग श्राप के कारण बना है उसी तरह जेसे श्राप के कारण विष्णु के अवतार होते थे ...पौराणिक से निवेदन है कि अब या तो सत्य स्वीकारे या गप्प लगाये या फिर आ कर गालिया दे


लिंग का अर्थ होता है "प्रमाण" -
ब्रह्म सूत्र के चौथे अध्याय के पहले पाद का दूसरा सूत्र है- 

"लिंगाच्च"

वेदों और वेदान्त में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए आया है. सूक्ष्म शरीर 17 तत्त्वों से बना है. शतपथ ब्राह्मण-5-2-2-3 में इन्हें सप्तदशः प्रजापतिः कहा है. मन बुद्धि पांच ज्ञानेन्द्रियाँ पांच कर्मेन्द्रियाँ पांच वायु. इस लिंग शरीर से आत्मा की सत्ता का प्रमाण मिलता है. वह भासित होती है. आकाश वायु अग्नि जल और पृथ्वी के सात्विक अर्थात ज्ञानमय अंशों से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन बुद्धि की रचना होती है. आकाश सात्विक अर्थात ज्ञानमय अंश से श्रवण ज्ञान, वायु से स्पर्श ज्ञान, अग्नि से दृष्टि ज्ञान जल से रस ज्ञान और पृथ्वी से गंध ज्ञान उत्पन्न होता है. पांच कर्मेन्द्रियाँ हाथ, पांव, बोलना. गुदा और मूत्रेन्द्रिय के कार्य सञ्चालन करने वाला ज्ञान.
प्राण अपान,व्यान,उदान,सामान पांच वायु हैं. यह आकाश वायु, अग्नि, जल. और पृथ्वी के रज अंश से उत्पन्न होते हैं. प्राण वायु नाक के अगले भाग में रहता है सामने से आता जाता है. अपान गुदा आदि स्थानों में रहता है. यह नीचे की ओर जाता है. व्यान सम्पूर्ण शरीर में रहता है. सब ओर यह जाता है. उदान वायु गले में रहता है. यह उपर की ओर जाता है और उपर से निकलता है. सामान वायु भोजन को पचाता है.

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पर्वत उड़ना।