Wednesday, 17 March 2021

कृष्ण: सुर या असुर

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मेरे घर में कृष्ण और शंकर का फोटो क्यों??
     शिव और कृष्ण से हमारे रिश्ते क्या हैं?
     शिव को पुरखा मानने और शिव चर्चा कराने में कौन सा काम जायज है?
      क्या असुर कृष्ण का ब्राह्मणीकरण हो गया है?
      कृष्ण को मानने और भागवत सुनने में कुछ फर्क है क्या?
      साथियो!मैं नास्तिक हूँ।मेरे घर कोई हिन्दू पर्व या त्यौहार नही मनाया जाता।मेरे घर में बुद्ध,कबीर,रविदास,अम्बेडकर,पेरियार,फुले,सावित्री बाई फुले,सन्त गाडगे,लोहिया,कर्पूरी ठाकुर,भगत सिंह,सुभाष चन्द्र बोस,पटेल,महिषासुर,रावण आदि का फोटो लगा है।इनके साथ ही मैंने शिव और कृष्ण का भी फोटो लगा रखा है।
          मेरे कुछ साथी मेरा मार्गदर्शन कर सकते हैं क्योकि ज्ञान की कोई सीमा नही होती।मेरे द्वारा कृष्ण और शंकर का फोटो लगाना कुछ साथियो को अटपटा लग सकता है जो लाजमी भी है पर मैं इन्हें कोई ईश्वर या भगवान मानकर नही लगाया हूँ क्योकि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मेरा पूरा परिवार नास्तिक है।मैंने इन दोनों कथित हिन्दू भगवानो को अपने घर में अपना मूलनिवासी पुरखा मानकर स्थान दिया है।कुछ साथी संशय पालते हैं कि मैं अम्बेडकर साहब पर खूब बोलता हूँ पर शिव व कृष्ण का फोटो टांगकर क्यों रखे हुए हूँ।
            साथियो!बुद्ध ने बहुत स्पष्ट कहा है कि "मैंने कोई बात कही है,धर्म ग्रन्थों में लिखा है,परम्परा है,किसी बड़े आदमी  ने कहा है,इसलिए मत मानो।उसे तर्क की कसौटी पर कसो,यदि सत्य प्रतीत हो तो मानो।"कृष्ण और शंकर के चरित्र जो आर्यों ने ही लिखा है,उन्हें एक तरफ तो भगवान बनाया गया है परन्तु वहीं दूसरी तरफ उनके पूरे चरित्र को विद्रूप बना दिया है।
           हिन्दू शास्त्र व पण्डे कृष्ण को भगवान कहते है,वहीं उन्हें चोर,रसिक आदि भी सिद्ध करते है ।उन्हें योगिराज भी कहते हैं तो सेनापति भी बना डालते है। कई अक्षौणी सेना का मालिक भी लिखते हैं तो उनके मुंह माखन लगने से माखनचोर बताते हैं तो वही गीता कहलवा उन्हें खुद भी शूद्र कहलवा देते हैं।कृष्ण से नीति विचार बोलवाके उन्हें विद्वान घोषित कर भागवत कथा सुनाके गरीबो /पिछड़ों का नुकसान  भी करते हैं।
         ये आर्य कथाकार शंकर जैसे महाबली को गंजेड़ी,भंगेड़ी,सांप-बिच्छू का माला पहनने वाला तथा भूत-पिचास का अगुवा करार देकर शंकर को पूर्णतया उपहास का पात्र बना दिए है।
          इनका अपना भगवान विष्णु है जो भेष बदल के ठगने में माहिर है।नरसिंह भेष पकड़ के हिरनकश्यप को धोखे से मारता है,बामन भेष पकड़ के बालि को खत्म करता है तो मोहिनी भेष बन भष्मासुर को भष्म करता है तो जालंधर का रूप धर उसकी बीबी से बलात्कार करता है,पर है इनका भगवान ही।इस भगवान को सारे कुकर्म करने के वावजूद मान्यता है पर कृष्ण को नही क्योकि उन्हें पता है कि कृष्ण उनका नही है तभी तो उन्होंने ऋग्वेद में कृष्ण पर जो श्लोक/मन्त्र लिखा है उसमे कृष्ण को असुर कहा है और इंद्र के हाथों मरवा दिया है।
       आर्य लेखकों के मुताबिक कृष्ण ने यदि सहमति से गोपियों से प्रेम किया,कोई शारीरिक सम्बन्ध नही बनाया तो वह छिनरा और जालंधर की बीबी वृंदा से जबरन बलात्कार करने वाला विष्णु भगवान;अहिल्या से बलात्कार करने वाला इंद्र वेद का सर्वमान्य भगवान।
         राम,विष्णु,इंद्र आदि ने शराब पीया,मधुपर्क(गोमांस मिश्रित चावल बिरियानी) खाया तो वे ईश्वर और दूध,मक्खन,घी,बेर,गन्ना,धतूर,बेल आदि खाने वाले शाकाहारी/सुरापान न करने वाले कृष्ण और शिव इनके तथाकथित भगवान के वावजूद तमाम कमियों वाले उपहास के पात्र।
        मैं ऐसा समझता हूँ कि कृष्ण और शिव इनके ईश्वर नही है वरन हमारे पूर्वज हैं।इनकी स्वीकार्यता खत्म कर पाने में विफल आर्यों ने मजबूरी में इन्हें अपना भगवान माना है परन्तु मौका मिलते है इनके चरित्र हनन से बाज भी नही आये हैं।
         मैं इसी समझ से कृष्ण और शिव का चित्र अपने घर में लगाया हूँ जबकि शिव चर्चा और भागवत का विरोधी हूँ क्योकि शिव चर्चा और भागवत हमारे इन पुरखों का ब्राह्मणीकरण करते हैं।इस महीन अंतर में ही हम ठगी के शिकार हो जाते हैं।
         बुद्ध ने कहा था कि "हमने जो कहा वही अंतिम सत्य नही है.........तर्क की कसौटी पर कसो,जो खरा हो ,वो मानो वरना नकार दो।" मैं भी इसी का अनुसरण करते हुए अपने साथियों को कृष्ण और शंकर पर अपने इस मत को अंतिम विचार न मानते हुए मार्गदर्शन की अपेक्षा रखता हूँ और इसमें और शोध की जरूरत महसूस करता हूँ।

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सनातन संस्कृति सुर संस्कृति है जबकि अनार्य/मूलनिवासी संस्कृति असुर संस्कृति है।मद्धेशिया से आये आर्य जो मूलतःआर्यियन संस्कृति के पोषक हैं उनका वेद पशु बलिपरांत बने मधुपर्क, सोमरस व मैरेय सेवन से भरा पड़ा है जबकि आर्य ग्रन्थानुसार असुर संस्कृति पशुरक्षक,कृषक,ईशद्रोही व प्रकृति प्रेमी के रूप में कुख्यात हैं।
        शाब्दिक तौर पर सुर का मतलब सुरा(शराब) सेवक जबकि असुर का अभिप्राय सुरा (शराब)द्रोही है।आज भी यह कथन सर्व विदित है कि शराब सारे दुर्गुणों की जननी है।शराब सेवन के बाद विवेक नष्ट हो जाता है तभी तो सारे वेद व पुराण विष्णु-विन्दा, विष्णु-तुलसी,इंद्र-अहिल्या,ब्रम्हा-सरस्वती आदि प्रकरणों से भरा पड़ा है जो गूगल पर भी सर्च कर पढ़ा जा सकता है।
        अब सवाल उठता है कृष्ण के भगवान या सुर होने का जिनकी जयंती "जन्माष्टमी" हम सभी मना रहे हैं।सबका सोचने का अपना-अपना नजरिया है।कुछ लोग कुछ भी नही सोचते हैं,वे लकीर के फकीर है,उन्हें परम्परा प्यारी है लिहाजा वे बिना सोचे कृष्ण को 33 करोड़ देवताओं में से एक मान आज ब्रत रहकर उन्हें पूज रहे हूं।कुछ लोग जानते सब कुछ हैं पर तर्क करने की हिम्मत नही रखते,लोकलाज,समाज का भय उन्हें सताता है।वे यह सोचते है कि कौन लफड़ा पाले, जो जैसे है वैसे ही चलता रहे जबकि कुछ मुट्ठी भर लोग पढ़े-लिखे होने के बाद तर्क करते हैं,जड़ तलाशते हैं,कारण व कारण का निवारण निकालते हैं।वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर यथार्थ जानने की कोशिश करते हैं और यथार्थ उद्घाटित करने की चेष्टा करते हैं।
      वेद/पुराण/इतिहास लिखने वाले तो सभी सुर कुल के ही अभिजात्य लोग रहे हैं लेकिन किसी ने भी कृष्ण को किसी वैदिक ग्रंथ ने सुरा सेवन करने वाला नही लिखा है।सभी ग्रंथो में कृष्ण को माखन,दूध, दही,घी,छाछ खाने वाला ही लिखा गया है।उन्हें पशु,यमुना,कदम्ब,वन,जंगल,पहाड़,कृषि से इतर किसी और का पोषण करने वाला नही बताया गया है।पुराण और वेद दो तरह के ग्रंथ आर्यो या सुरों के हैं पर मूल ग्रंथ वेद है।
      वेद को संकलित करने वाले भी वेदव्यास थे तो भागवत पुराण लेखक भी वेदव्यास ही थे।दोनों ग्रंथ में कृष्ण का जिक्र है।दोनों ग्रंथो के कृष्ण यमुना के किनारे इंद्र से युद्ध करते हुये लिखे गए हैं।भागवत कथा जो कहकर पुरोहित अपनी रोटी का जुगाड़ करता है उसमें कृष्ण द्वारा इंद्र को पराजित करवाया जाता है जबकि वेद के कृष्ण को असुर लिखा गया है और उनका वध इंद्र द्वारा करवाया गया है।ऋग्वेद के मण्डल-01 के सूक्त 101,130,मण्डल-08 के सूक्त 13,14,15,17 आदि में कृष्ण को असुर व इंद्र द्वारा मारा गया लिखा गया है।
       अब सवाल उठता है कृष्ण का यथार्थ क्या है?क्या कृष्ण सुर थे या असुर?कृष्ण सुर थे तो उनके सुरासेवन का कहीं जिक्र तो नही है जबकि उनके फल,दूध आदि के सेवन का जिक्र है।इस देश के मूलनिवासियों के नायकों का चरित्र विद्रूप बनाया गया है,उनका कोई इतिहास नही है,नष्ट कर दिया गया है लिहाजा मिथकों व आर्यो के कथाओं में से ही हमे सार या यथार्थ ढूंढना है।कृष्ण यदि सुर रहते तो वेद उन्हें असुर क्यो लिखता?कृष्ण का मान-सम्मान उनके ही पुराणों के अनुसार सम्पूर्ण योग्यताओं से परिपूर्ण रहने व उनके योगिराज(अवगुण  विहीन को ही योगी कहते हैं) होने के बावजूद राम,विष्णु,इंद्र व ब्रम्हा जैसा क्यो नही है?
      कृष्ण यदि सुर थे अर्थात आर्य/अभिजात्य या सवर्ण तो फिर उनके वंशज अहीर/गोप/ग्वाला/यादव पिछड़े क्यो हैं?इंनके पास आर्यो की तरह शिक्षा,सम्पत्ति,भूमि व सम्मान क्यो नही है?क्यो अहीरों को सामाजिक दृष्टि से हेय रखा गया है।आज भी लालू जी को ललुआ,मुलायम जी को मुलयमा कहना तथा सुशिक्षित अखिलेश यादव जी के बंगले को गोमूत्र व गंगाजल से धुलने का औचित्य क्या है?
       मैं निःसंकोच अपने अनार्य/मूलनिवासी/असुर नायक पूर्वज कृष्ण को उनकी जयंती पर नमन करता हूँ और सनातन पंथ के पोंगा पंथ में फंसे अपने समाज को अंधभक्त बनने की बजाय तर्क करने,अंधविश्वास त्यागने,कृष्ण की तरह वैज्ञानिक,पदार्थवादी,प्रकृतिप्रेमी सोच डेवलप करने की अपेक्षा रखता हूँ।
      असुर नायक महामना कृष्ण को पुनः नमन!
-चंद्रभूषण सिंह यादव
प्रधान संपादक-"यादव शक्ति"
कंट्रीब्यूटिंग एडिटर-"सोशलिस्ट फ़ैक्टर"


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मैं अक्सर देखता आ रहा हूं कि जब भी किसी तार्किक व्यक्ति से रामायण, महाभारत, गीता, पुराण जैसे विषय पर बहस होती है तो वह सभी तरह से मात खाता हुआ आखिरी में ऋग्वेद पर आकर रुक जाता है और कहता है कि ऋग्वेद में किसी भगवान या देवता के वर्णन के साथ पाखंड नहीं है। इसलिए आपको ऋग्वेद पढ़ना चाहिए। 

तो आखिरकार मैंने ऋग्वेद पढ़ ही लिया। अब देखता हूं कि आपके ऋग्वेद में क्या है?? थोड़ा जांच पड़ताल होना तो बनता है। मैंने पढ़ा तो कुछ ऐसा पाया जो कि छलकपट दिख रहा है। और यदि नहीं है तो ऐसा क्यों कि ब्राह्मणों (हिन्दुओं) के सबसे मूल ग्रंथ ऋग्वेद में कृष्ण को असुर, राक्षस, पापी, जैसे शब्दों से संबोधित किया गया है और आगे चलकर गीता में कृष्ण को सभी देवी देवताओं सहित जनमानस का आराध्य बताया गया है। 
तार्किक हिसाब से कृष्ण एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें सिर्फ षड्यंत्र (मूलनिवासियों को जाल में फसाने) के तहत भगवान मान लिया गया है। इन सभी के बावजूद एक साधारण पुरुष कृष्ण सर्वोपरि देव बन गए। श्रीकृष्ण कितने महान बन गए इसको जानने के लिए आप भागवत गीता में अध्याय 10 और 14 देख सकते है। 

इन अध्यायों में कृष्ण कहते है:- "हे कुरुश्रेष्ठ, अब "मै" तेरे लिए दिव्य विभूतियों को प्रधानता से कहूंगा क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है। हे अर्जुन मैं सब भूतों की हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूं तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूं। इस प्रकार यह स्पस्ट होता है कि जहां तक गीता का संबंध है कृष्ण से महान कोई और देव नहीं है। यहां तक कि तथाकथित सृष्टि के रचयिता कहे जाने वाले ब्रह्मा भी उनसे तुक्ष्य है।

#थोड़ा_जांच_पड़ताल_करते_है:-

हिंदुओं के प्रमुख धर्मग्रंथ ऋग्वेद का मूल देवता इंद्र है। इसके 10,552 श्लोकों में से 3,500 अर्थात् ठीक एक-तिहाई इंद्र से संबंधित हैं। इंद्र और कृष्ण का मतांतर एवं युद्ध सर्वविदित है। प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत में वेदव्यास ने कृष्ण को विजेता बताया है तथा इंद्र का पराजित होना दर्शाया है। इंद्र और कृष्ण का यह युद्ध आमने-सामने लड़ा गया युद्ध नहीं है। इस युद्ध में कृष्ण द्वारा इंद्र की पूजा का विरोध किया जाता है, जिससे कुपित इंद्र अतिवृष्टि कर मथुरावासियों को डुबोने पर आमादा हैं। कृष्ण गोवर्धन पर्वत के जरिए अपने लोगों को इंद्र के कोप से बचा लेते हैं। इंद्र थककर पराजय स्वीकार कर लेता है। इस संपूर्ण घटनाक्रम में कहीं भी आमने-सामने युद्ध नहीं होता है लेकिन अन्य हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर ऋग्वेद में इस युद्ध के दौरान जघन्य हिंसा का जिक्र है तथा इंद्र को विजेता दिखाया गया है।

ऋग्वेद मंडल-1 सूक्त 130 के 8वें श्लोक में कहा गया है कि – ”हे इंद्र! युद्ध में आर्य यजमान की रक्षा करते हैं। अपने भक्तों की अनेक प्रकार से रक्षा करने वाले इंद्र उसे समस्त युद्धों में बचाते हैं एवं सुखकारी संग्रामों में उसकी रक्षा करते हैं। इंद्र ने अपने भक्तों के कल्याण के निमित्त यज्ञद्वेषियों की हिंसा की थी। इंद्र ने कृष्ण नामक असुर की काली खाल उतारकर उसे अंशुमती नदी के किनारे मारा और भस्म कर दिया। इंद्र ने सभी हिंसक मनुष्यों को नष्ट कर डाला।”

ऋग्‍वेद के मंडल-1 के सूक्त 101 के पहले श्लोक में लिखा है कि: ”गमत्विजों, जिस इंद्र ने राजा ऋजिश्वा की मित्रता के कारण कृष्ण असुर की गर्भिणी पत्नियों को मारा था, उन्हीं के स्तुतिपात्र इंद्र के उद्देश्य से हवि रूप अन्न के साथ-साथ स्तुति वचन बोला। वे कामवर्णी दाएं हाथ में बज्र धारण करते हैं। रक्षा के इच्छुक हम उन्हीं इंद्र का मरुतों सहित आह्वान करते हैं।”

इंद्र और कृष्ण की शत्रुता की भी ऋणता को समझने के लिए ऋग्वेद के मंडल 8 सूक्त 96 के श्लोक 13,14,15 और 17 को भी देखना चाहिए (मूल संस्कृत श्लोक देखें शांति कुंज प्रकाशन, गायत्री परिवार, हरिद्वार द्वारा प्रकाशित वेद में)

ऋगवेद के श्लोक 13: शीघ्र गतिवाला एवं दस हजार सेनाओं को साथ लेकर चलने वाला कृष्ण नामक असुर अंशुमती नदी के किनारे रहता था। इंद्र ने उस चिल्लाने वाले असुर को अपनी बुद्धि से खोजा एवं मानव हित के लिए वधकारिणी सेनाओं का नाश किया।

श्लोक 14: इंद्र ने कहा-मैंने अंशुमती नदी के किनारे गुफा में घूमने वाले कृष्ण असुर को देखा है, वह दीप्तिशाली सूर्य के समान जल में स्थित है। हे अभिलाषापूरक मरुतो, मैं युद्ध के लिए तुम्हें चाहता हूं। तुम यु़द्ध में उसे मारो।

श्लोक 15: तेज चलने वाला कृष्ण असुर अंशुमती नदी के किनारे दीप्तिशाली बनकर रहता था। इंद्र ने बृहस्पति की सहायता से काली एवं आक्रमण हेतु आती हुई सेनाओं का वध किया।

श्लोक 17: हे बज्रधारी इंद्र! तुमने वह कार्य किया है। तुमने अद्वितीय योद्धा बनकर अपने बज्र से कृष्ण का बल नष्ट किया। तुमने अपने आयुधों से कुत्स के कल्याण के लिए कृष्ण असुर को नीचे की ओर मुंह करके मारा था तथा अपनी शक्ति से शत्रुओं की गाएं प्राप्त की थीं। ( अनुवाद-वेद, विश्व बुक्स, दिल्ली प्रेस, नई दिल्ली)

#क्या_कृष्ण_और_यादव_असुर_थे?

ऋग्वेद के इन श्लोकों पर कृष्णवंशीय लोगों का ध्यान शायद नहीं गया होगा। यदि गया होता तो बहुत पहले ही तर्क-वितर्क शुरू हो गया होता। वेद में उल्लेखित असुर कृष्ण को यदुवंश शिरोमणि कृष्ण कहने पर कुछ लोग शंका व्यक्त करेंगे कि हो सकता है कि दोनों अलग-अलग व्यक्ति हों, लेकिन जब हम सम्पूर्ण प्रकरण की गहन समीक्षा करेंगे तो यह शंका निर्मूल सिद्ध हो जाएगी, क्योंकि यदुकुलश्रेष्ठ का रंग काला था, वे गायवाले थे और यमुना तट के पास उनकी सेनाएं भी थीं। वेद के असुर कृष्ण के पास भी सेनाएं थीं। अंशुमती अर्थात् यमुना नदी के पास उनका निवास था और वह भी काले रंग एवं गाय वाला था। उसका गोर्वधन गुफा में बसेरा था।

यदुवंशी कृष्ण एवं असुर कृष्ण दोनों का इंद्र से विरोध था। दोनों यज्ञ एवं इंद्र की पूजा के विरुद्ध थे। वेद में कृष्ण एवं इंद्र का यमुना के तीरे युद्ध होना, कृष्ण की गर्भिणी पत्नियों की हत्या, सम्पूर्ण सेना की हत्या, कृष्ण की काली छाल नोचकर उल्टा करके मारने और जलाने, उनकी गायों को लेने की घटना इस देश के आर्य-अनार्य युद्ध का ठीक उसी प्रकार से एक हिस्सा है, जिस तरह से महिषासुर, रावण, हिरण्यकष्यप, राजा बलि, बाणासुर, शम्बूक, बृहद्रथ के साथ छलपूर्वक युद्ध करके उन्हें मारने की घटना को महिमामंडित किया जाना। इस देश के मूल निवासियों को गुमराह करने वाले पुराणों को ब्राह्मणों ने इतिहास की संज्ञा देकर प्रचारित किया। इसी भ्रामक प्रचार का प्रतिफल है कि बहुजनों से उनके पुरखों को बुरा कहते हुए उनकी छल कर हत्या करने वालों की पूजा करवाई जा रही है।

यदुवंशी कृष्ण के असुर नायक या इस देश के अनार्य होने के अनेक प्रमाण आर्यों द्वारा लिखित इतिहास में दर्ज है। आर्यों ने अपने पुराण, स्मृति आदि लिखकर अपने वैदिक या ब्राह्मण धर्म को मजबूत बनाने का प्रयत्न किया है। पद्म पुराण में कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध एवं राजा बलि की पौत्री उषा के विवाह का प्रकरण पढ़ने को मिलता है। कृष्ण के पौत्र की पत्नी उषा के पिता का नाम बाणासुर था। बाणासुर के पूर्वज कुछ यूं थे-असुर राजा दिति के पुत्र हिरण्यकश्यप के पुत्र विरोचन के पुत्र बलि के पुत्र बाणासुर थे। उषा का यदुकुल श्रेष्ठ कृष्ण एवं रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध से प्रेम हो गया। अनिरुद्ध अपनी प्रेमिका उषा से मिलने बाणासुर के महल में चले गए। बाणासुर द्वारा अनिरुद्ध के अपने महल में मिलने की सूचना पर अनिरुद्ध को पकड़कर बांधकर पीटा गया।

इस बात की जानकारी होने पर अनिरुद्ध के पिता प्रद्युम्न और वाणासुर में घमासान हुआ। जब बाणासुर को पता चला कि उनकी पुत्री उषा और अनिरुद्ध आपस में प्रेम करते हैं तो उन्होंने युद्ध बंद कर दोनों की शादी करा दी। इस तरह से कृष्ण और असुर राज बलि एवं बाणासुर और कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न आपस में समधी हुए। अब सवाल उठता है कि यदि कृष्ण असुर कुल यानी इस देश के मूल निवासी नहीं होते तो उनके कुल की बहू असुर कुल की कैसे बनती? श्रीकृष्ण और राजा बलि दोनों के दुश्मन इंद्र और उपेंद्र आर्य थे। कृष्ण ने इंद्र से लड़ाई लड़ी तो बालि ने वामन रूपधार उपेंद्र (विष्णु) बलि से। राजा बलि के संदर्भ में आर्यों ने जो किस्सा गढ़ा है वह यह है कि राजा बलि बड़े प्रतापी, वीर किंतु दानी राजा थे। आर्य नायक विष्णु आदि राजा बलि को आमने-सामने के युद्ध में परास्त नहीं कर पा रहे थे, सो विष्णु ने छल करके राजा बलि की हत्या की योजना बनाई।

विष्णु वामन का रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग जमीन मांगी। महादानी एवं महाप्रतापी राजा बलि राजी हो गए। पुराण कथा के मुताबिक वामन वेशधारी विष्णु ने एक पग में धरती, एक पग में आकाश तथा एक पग में बलि का शरीर नापकर उन्हें अपना दास बनाकर मार डाला। कुछ विद्वान कहते हैं कि वामन ने राजा बलि के सिंहासन को दो पग में मापकर कहा कि सिंहासन ही राजसत्ता का प्रतीक है इसलिए हमने तुम्हारा सिंहासन मापकर संपूर्ण राजसत्ता ले ली है। एक पग जो अभी बाकी है उससे तुम्हारे शरीर को मापकर तुम्हारा शरीर लूंगा। महादानी राजा बलि ने वचन हार जाने के कारण अपनी राजसत्ता वामन विष्णु को बिना युद्ध किए सौंप दी तथा अपना शरीर भी समर्पित कर दिया। वामन वेशधारी विष्णु ने एक लाल धागे से हाथ बांधकर राजा बलि को अपने शिविर में लाकर मार डाला। इस लाल धागे से हाथ बांधते वक्त विष्णु ने बलि से कहा था कि तुम बहुत बलवान हो, तुम्हारे लिए यह धागा प्रतीक है कि तुम हमारे बंधक हो। तुम्हें अपने वचन के निर्वाह हेतु इस धागा को हाथ में बांधे रखना है।

हजारों वर्ष बाद भी इस लाल धागे को इस देश केमूल निवासियों के हाथ में बांधने का प्रचलन है जिसे रक्षासूत्र या कलावा कहते हैं। इस रक्षासूत्र या कलावा को बांधते वक्त पुरोहित उस हजार वर्ष पुरानी कथा को श्लोक में कहता है कि : ‘येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वामि प्रतिबद्धामि रक्षे मा चल मा चल।’  (अर्थात् जिस तरह हमने दानवों के महाशक्तिशाली राजा बलि को बांधा है उसी तरह हम तुम्हें भी बांधते हैं। स्थिर रह, स्थिर रह।)

#पुराणों_के_प्रमाण

दरअसल, इन पौराणिक किस्सों से यही प्रमाणित होता है कि कृष्ण, राजा बलि, राजा महिषासुर, राजा हिरण्यकश्यप आदि से विष्णु ने विभिन्न रूप धरकर इस देश के मूल निवासियों पर अपनी आर्य संस्कृति थोपने के लिए संग्राम किया था। इंद्र एवं विष्णु आर्य संस्कृति की धुरी हैं तो कृष्ण और बलि अनार्य संस्कृति की।

बहरहाल, कृष्ण को क्षत्रिय या आर्य मानने वाले लोगों को कृष्ण काल से पूर्व राम-रावण काल में भी अपनी स्थिति देखनी चाहिए। महाकाव्यकार वाल्मीकि ने रामायण में भी यादवों को पापी और लुटेरा बताया है तथा राम द्वारा किए गए यादव राज्य दु्रमकुल्य के विनाश को दर्शाया है।

वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के 22वें अध्याय में राम एवं समुद्र का संवाद है। राम लंका जाने हेतु समुद्र से कहते हैं कि तुम सूख जाओ, जिससे मैं समुद्र पार कर लंका चला जाऊं। समुद्र राम को अपनी विवशता बताता है कि मैं सूख नहीं सकता तो राम कुपित होकर प्रत्यंचा पर वाण चढ़ा लेते हैं। समुद्र राम के समक्ष उपस्थित होकर उन्हें नल-नील द्वारा पुल बनाने की राय देता है। राम समुद्र की राय पर कहते हैं कि वरुणालय मेरी बात सुनो। मेरा यह यह वाण अमोध है। बताओ इसे किस स्थान पर छोड़ा जाए। राम की बात सुनकर समुद्र कहता है कि ‘प्रभो! जैसे जगत् में आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर दु्रमकुल्य नाम से विख्यात एक बड़ा पवित्र देश है, वहां आभीर आदि जातियों के बहुत-से मनुष्य निवास करते हैं जिनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं। वे सबके सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं। उन पापाचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मैं सह नहीं सकता, श्रीराम! आप अपने इस उत्तम वाण को वहीं सफल कीजिए। महामना समुद्र का यह वचन सुनकर सागर के बताए अनुसार उसी देश में वह अत्यंत प्रज्जवलित वाण छोड़ दिया। वह वाण जिस स्थान पर गिरा था वह स्थान उस वाण के कारण ही पृथ्वी में दुर्गम मरुभूमि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।’

राम-रावण काल में यादवों के राज्य दु्रमकुल्य को समुद्र द्वारा पवित्र बताने तथा वहां निवास करने वाले यादवों को पापी एवं भयानक कर्म वाला लुटेरा कहने से सिद्ध हो जाता है कि यादव न आर्य हैं और न क्षत्रिय, अन्यथा वाल्मीकि और समुद्र इन्हें पापी नहीं कहते। जिस तरह से इस देश में दलितों को तालाब, कुओं आदि से पानी पीने नहीं दिया जाता था और डॉ. आम्बेडकर को महाड़ तालाब आंदोलन करना पड़ा, क्या उससे भी अधिक वीभत्स घटना यादवों के दु्रमकुल्य राज्य के साथ घटित नहीं हुई है?

रामचरितमानस में भी तुलसीदास ने उत्तर कांड के 129 (1) में लिखा है कि आभीर यवन, किरात खस, स्वचादि अति अधरुपजे। अर्थात् अहीर, मुसलमान, बहेलिया, खटिक, भंगी आदि पापयोनि हैं। इसी प्रकार व्यास स्मृति का रचयिता एक श्लोक में कहता है कि ‘बढ़ई, नाई, ग्वाला, चमार, कुम्भकार, बनिया, चिड़ीमार, कायस्थ, माली, कुर्मी, भंगी, कोल और चांडाल ये सभी अपवित्र हैं। इनमें से एक पर भी दृष्टि पड़ जाए ता सूर्य दर्शन करने चाहिए तब द्धिज जाति अर्थात् बड़ी जातियों का एक व्यक्ति पवित्र होता है।’

इस आशय के अनेक श्लोक ऋग्वेद में हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि आर्य लोग भारत के मूल निवासियों से किस हद तक नफरत करते थे तथा उन्होंने चमड़ी के रंग के आधार पर इनकी हत्याएं की हैं। यादवश्रेष्ठ कृष्ण काली चमड़ी वाले थे। इंद्र और यज्ञ विरोधी होने के लिहाज से ऋग्वेद के अनुसार उनका संघर्ष अग्नि, सोम, इंद्र आदि से होना स्वाभाविक है।

#पूरा_इतिहास_गवाह_है_जिनसे_जीत_नहीं_सकते 
#उन्हें_अपने_में_मिला_लिया

ऋग्वेद से लेकर तमाम शास्त्रों में अहीर व अहीर नायक कृष्ण अनार्य कहे गए हैं लेकिन इसके बावजूद जब इस देश के मूल निवासियों में कृष्ण का प्रभाव कायम रहा तो इन आर्यों ने कृष्ण के साथ नृशंसता बरतने के बावजूद उन्हें भगवान बना दिया और कृष्णवंशीय बहादुर जाति को अपने सनातन पंथ का हिस्सा बनाने में कामयाबी हासिल कर ली।

जब कृष्ण अनार्य थे तो गीतोपदेश का सवाल उठना लाजिमी है। गीतोपदेश में कृष्ण ने खुद भगवान होने, ब्राह्मण श्रेष्ठता, वर्ण व्यवस्था बनाने जैसे अनेक गले न उतरने वाली बातें कही हैं। ऋग्वेद स्वयं ही गीता में उल्लेखित बातों का खंडन करता है। जब कृष्ण खुद वेद के अनुसार असुर और इंद्रद्रोही थे तो वे वर्ण व्यवस्था को बनाने की बात कैसे कर सकते हैं। गीता में ब्राह्मणवाद को मजबूत बनाने वाली जो भी बातें कृष्ण के मुंह से कहलवाई गई हैं वे सत्य से परे हैं। काले, अवर्ण असुर कृष्ण कभी भी वर्ण-व्यवस्था के समर्थक नहीं हो सकते। भारत के मूल निवासियों में अमिट छाप रखने वाले कृष्ण का आभामंडल इतना विस्तृत था कि आर्यों को मजबूरी में कृष्ण को अपने भगवानों में सम्मिलित करना पड़ा। यह कार्य ठीक उसी तरह से किया गया जिस तरह से ब्राह्मणवाद के खात्मा हेतु प्रयत्नशील रहे गौतम बुद्ध को ब्राह्मणों ने गरुड़ पुराण में कृष्ण का अवतार घोषित कर खुद में समाहित करने की चेष्टा की।

जिस तरह से असुर कृष्ण की भारतीय संस्कृति आर्यों ने उदरस्थ कर ली उसी तरह बुद्ध की वैज्ञानिक बातों ने हिन्दू धर्म के अवैज्ञानिक कर्मकांडों के समक्ष दम तोड़ दिया। डॉ. आम्बेडकर के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद अब भारत में कुछ बौद्ध नज़र आ रहे हैं, वरना इन आर्यों ने बुद्ध को कृष्ण का अवतार और कृष्ण को विष्णु का अवतार घोषित कर कृष्ण एवं बुद्ध को निगल लिया था। कैसी विडंबना है कि विष्णु का अवतार जिस कृष्ण को बताया गया है, वह कृष्ण लगातार वेद से लेकर महाभारत ग्रंथ में इंद्र से लड़ रहा है।  💗🌿M. G. Tandan  जी 🙏 के ✍️✍️कलम से


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असुर कृष्ण और यादवों का ब्राह्मणीकरण
कृष्ण, राजा बलि, राजा महिषासुर, राजा हिरण्यकश्यप आदि से विष्णु ने विभिन्न रूप धरकर इस देश के मूल निवासियों से अपनी आर्य संस्कृति थोपने के लिए संग्राम किया था। इंद्र एवं विष्णु आर्य संस्कृति की एक धुरी हैं तो वहीं कृष्ण और बलि अनार्य संस्कृति की दूसरी धुरी हैं

इस देश की पिछड़ी जातियों में शुमार अहीर व यादव कृष्ण को अपना पूर्वज मानते हैं। इस जाति के बीच कृष्ण का नायकत्व ऐसा है कि अहीर और कृष्ण पर्यायवाची बन गए हैं।

हिन्दू धर्मग्रंथों में इस यादव नायक का नाम कृष्ण, श्याम, गोपाल आदि आया है, जो यादवों के शारीरिक रंग एवं व्यवसाय से मेल खाने वाला है। बहुसंख्यक यादव सांवले या काले होते हैं, जो कि इस देश के मूल निवासियों अर्थात् अनार्यों का रंग है, के होंगे, तो निश्चय ही इनके महामानव या नायक का नाम कृष्ण या श्याम होगा, जिसका शाब्दिक अर्थ काला, करिया या करियवा होगा। देश एवं हिंदू धर्म की वर्ण-व्यवस्था सवर्ण-अवर्ण या काले-गोरे के आधार पर बनी है।

आर्यों और अनार्यों के संदर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार रामशरण शर्मा की प्रसिद्ध पुस्तक ‘आर्य संस्कृति की खोज’ का यह अंश उल्लेखनीय है : ‘1800 ईसा पूर्व के बाद छोटी-छोटी टोलियों में आर्यों ने भारतवर्ष में प्रवेश किया। ऋग्वेद और अवेस्ता दोनों प्राचीनतम ग्रंथों में आर्य शब्द पाया जाता है। ईरान शब्द का संबंध आर्य शब्द से है। ऋ ग्वैदिक काल में इंद्र की पूजा करने वाले आर्य कहलाते थे। ऋ ग्वेद के कुछ मंत्रों के अनुसार आर्यों की अपनी अलग जाति है। जिन लोगों से वे लड़ते थे उनको काले रंग का बतलाया गया है। आर्यों को मानुषी प्रजा कहा गया है जो अग्नि वैश्वानर की पूजा करते थे और कभी-कभी काले लोगों के घरों में आग लगा देते थे। आर्यों के देवता सोम के विषय में कहा गया है कि वह काले लोगों की हत्या करता था। उत्तर-वैदिक और वैदिकोत्तर साहित्य में आर्य से उन तीन वर्णों का बोध होता था जो द्विज कहलाते थे। शूद्रों को आर्य की कोटि में नहीं रखा जाता था। आर्य को स्वतंत्र समझा जाता था और शूद्र को परतंत्र।’

इंद्र विरुद्ध कृष्ण
हिंदुओं के प्रमुख धर्मग्रंथ ऋ ग्वेद का मूल देवता इंद्र है। इसके 10,552 श्लोकों में से 3,500 अर्थात् ठीक एक-तिहाई इंद्र से संबंधित हैं। इंद्र और कृष्ण का मतांतर एवं युद्ध सर्वविदित है। प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत में वेदव्यास ने कृष्ण को विजेता बताया है तथा इंद्र का पराजित होना दर्शाया है। इंद्र और कृष्ण का यह युद्ध आमने-सामने लड़ा गया युद्ध नहीं है। इस युद्ध में कृष्ण द्वारा इंद्र की पूजा का विरोध किया जाता है, जिससे कुपित इंद्र अतिवृष्टि कर मथुरावासियों को डुबोने पर आमादा हैं। कृष्ण गोवर्धन पर्वत के जरिए अपने लोगों को इंद्र के कोप से बचा लेते हैं। इंद्र थककर पराजय स्वीकार कर लेता है। इस संपूर्ण घटनाक्रम में कहीं भी आमने-सामने युद्ध नहीं होता है लेकिन अन्य हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर ऋग्वेद में इस युद्ध के दौरान जघन्य हिंसा का जिक्र है तथा इंद्र को विजेता दिखाया गया है।

ऋग्वेद मंडल-1 सूक्त 130 के 8वें श्लोक में कहा गया है कि-‘हे इंद्र! युद्ध में आर्य यजमान की रक्षा करते हैं। अपने भक्तों की अनेक प्रकार से रक्षा करने वाले इंद्र उसे समस्त युद्धों में बचाते हैं एवं सुखकारी संग्रामों में उसकी रक्षा करते हैं। इंद्र ने अपने भक्तों के कल्याण के निमित्त यज्ञद्वेषियों की हिंसा की थी। इंद्र ने कृष्ण नामक असुर की काली खाल उतारकर उसेन अंशुमती नदी के किनारे मारा और भस्म कर दिया। इंद्र ने सभी हिंसक मनुष्यों को नष्ट कर डाला।’

ऋग्वेद के मंडल-1 के सूक्त 101 के पहले श्लोक में लिखा है कि : ‘गमत्विजों, जिस इंद्र ने राजा ऋ जिश्वा की मित्रता के कारण कृष्ण असुर की गर्भिणी पत्नियों को मारा था, उन्हीं के स्तुतिपात्र इंद्र के उद्देश्य से हवि रूप अन्न के साथ-साथ स्तुति वचन बोला। वे कामवर्णी दाएं हाथ में बज्र धारण करते हैं। रक्षा के इच्छुक हम उन्हीं इंद्र का मरुतों सहित आह्वान करते हैं।’

इंद्र और कृष्ण की शत्रुता की भी ऋ णता को समझने के लिए ऋग्वेद के मंडल 8 सूक्त 96 के श्लोक 13,14,15 और 17 को भी देखना चाहिए; मूल संस्कृत श्लोक देखें (शांति कुंज प्रकाशन, गायत्री परिवार, हरिद्वार द्वारा प्रकाशित) ऋगवेद के श्लोक 13 : शीघ्र गतिवाला एवं दस हजार सेनाओं को साथ लेकर चलने वाला कृष्ण नामक असुर अंशुमती नदी के किनारे रहता था। इंद्र ने उस चिल्लाने वाले असुर को अपनी बुद्धि से खोजा एवं मानव हित के लिए वधकारिणी सेनाओं का नाश किया।

श्लोक 14 : इंद्र ने कहा-मैंने अंशुमती नदी के किनारे गुफा  में घूमने वाले कृष्ण असुर को देखा है, वह दीप्तिशाली सूर्य के समान जल में स्थित है। हे अभिलाषापूरक मरुतो, मैं युद्ध के लिए तुम्हें चाहता हूँ। तुम यु़द्ध में उसे मारो।

श्लोक 15 : तेज चलने वाला कृष्ण असुर अंशुमती नदी के किनारे दीप्तिशाली बनकर रहता था। इंद्र ने बृहस्पति की सहायता से काली एवं आक्रमण हेतु आती हुई सेनाओं का वध किया।

श्लोक 17 : हे बज्रधारी इंद्र! तुमने वह कार्य किया है। तुमने अद्वितीय योद्धा बनकर अपने बज्र से कृष्ण का बल नष्ट किया। तुमने अपने आयुधों से कुत्स के कल्याण के लिए कृष्ण असुर को नीचे की ओर मुंह करके मारा था तथा अपनी शक्ति से शत्रुओं की गाएं प्राप्त की थीं। (अनुवाद-वेद, विश्व बुक्स, दिल्ली प्रेस, नई दिल्ली)

क्या कृष्ण और यादव असुर थे?
ऋग्वेद के इन श्लोकों पर कृष्णवंशीय लोगों का ध्यान शायद नहीं गया होगा। यदि गया होता तो बहुत पहले ही तर्क-वितर्क शुरू हो गया होता। वेद में उल्लेखित असुर कृष्ण को यदुवंश शिरोमणि कृष्ण कहने पर कुछ लोग शंका व्यक्त करेंगे कि हो सकता है कि दोनों अलग-अलग व्यक्ति हों, लेकिन जब हम सम्पूर्ण प्रकरण की गहन समीक्षा करेंगे तो यह शंका निर्मूल सिद्ध हो जाएगी, क्योंकि यदुकुलश्रेष्ठ का रंग काला था, वे गायवाले थे और यमुना तट के पास उनकी सेनाएं भी थीं। वेद के असुर कृष्ण के पास भी सेनाएं थीं। अंशुमती अर्थात् यमुना नदी के पास उनका निवास था और वह भी काले रंग एवं गाय वाला था। उसका गोर्वधन गुफा में बसेरा था। यदुवंशी कृष्ण एवं असुर कृष्ण दोनों का इंद्र से विरोध था। दोनों यज्ञ एवं इंद्र की पूजा के विरुद्ध थे। वेद में कृष्ण एवं इंद्र का यमुना के तीरे युद्ध होना, कृष्ण की गर्भिणी पत्नियों की हत्या, सम्पूर्ण सेना की हत्या, कृष्ण की काली छाल नोचकर उल्टा करके मारने और जलाने, उनकी गायों को लेने की घटना इस देश के आर्य-अनार्य युद्ध का ठीक उसी प्रकार से एक हिस्सा है, जिस तरह से महिषासुर, रावण, हिरण्यकष्यप, राजा बलि, बाणासुर, शम्बूक, बृहद्रथ के साथ छलपूर्वक युद्ध करके उन्हें मारने की घटना को महिमामंडित किया जाना। इस देश के मूल निवासियों को गुमराह करने वाले पुराणों को ब्राह्मणों ने इतिहास की संज्ञा देकर प्रचारित किया। इसी भ्रामक प्रचार का प्रतिफ ल है कि बहुजनों से उनके पुरखों को बुरा कहते हुए उनकी छल कर हत्या करने वालों की पूजा करवाई जा रही
है।

यदुवंशी कृष्ण के असुर नायक या इस देश के अनार्य होने के अनेक प्रमाण आर्यों द्वारा लिखित इतिहास में दर्ज है। आर्यों ने अपने पुराण, स्मृति आदि लिखकर अपने वैदिक या ब्राह्मण धर्म को मजबूत बनाने का प्रयत्न किया है। पद्म पुराण में कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध एवं राजा बलि की पौत्री उषा के विवाह का प्रकरण पढऩे को मिलता है। कृष्ण के पौत्र की पत्नी उषा के पिता का नाम बाणासुर था। बाणासुर के पूर्वज कुछ यूं थे-असुर राजा दिति के पुत्र हिरण्यकश्यप के पुत्र विरोचन के पुत्र बलि के पुत्र बाणासुर थे। उषा का यदुकुल श्रेष्ठ कृष्ण एवं रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध से प्रेम हो गया। अनिरुद्ध अपनी प्रेमिका उषा से मिलने बाणासुर के महल में चले गए। बाणासुर द्वारा अनिरुद्ध के अपने महल में मिलने की सूचना पर अनिरुद्ध को पकड़कर बांधकर पीटा गया। इस बात की जानकारी होने पर अनिरुद्ध के पिता प्रद्युम्न और वाणासुर में घमासान हुआ। जब बाणासुर को पता चला कि उनकी पुत्री उषा और अनिरुद्ध आपस में प्रेम करते हैं तो उन्होंने युद्ध बंद कर दोनों की शादी करा दी। इस तरह से कृष्ण और असुर राज बलि एवं बाणासुर और कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न आपस में समधी हुए। अब सवाल उठता है कि यदि कृष्ण असुर कुल यानी इस देश के मूल निवासी नहीं होते तो उनके कुल की बहू असुर कुल की कैसे बनती?

श्रीकृष्ण और राजा बलि दोनों के दुश्मन इंद्र और उपेंद्र आर्य थे। कृष्ण ने इंद्र से लड़ाई लड़ी तो बालि ने वामन रूपधार उपेंद्र (विष्णु) बलि से। राजा बलि के संदर्भ में आर्यों ने जो किस्सा गढ़ा है वह यह है कि राजा बलि बड़े प्रतापी, वीर किंतु दानी राजा थे। आर्य नायक विष्णु आदि राजा बलि को आमने-सामने के युद्ध में परास्त नहीं कर पा रहे थे, सो विष्णु ने छल करके राजा बलि की हत्या की योजना बनाई। विष्णु वामन का रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग जमीन मांगी। महादानी एवं महाप्रतापी राजा बलि राजी हो गए। पुराण कथा के मुताबिक वामन वेशधारी विष्णु ने एक पग में धरती, एक पग में आकाश तथा एक पग में बलि का शरीर नापकर उन्हें अपना दास बनाकर मार डाला। कुछ विद्वान कहते हैं कि वामन ने राजा बलि के सिंहासन को दो पग में मापकर कहा कि सिंहासन ही राजसत्ता का प्रतीक है इसलिए हमने तुम्हारा सिंहासन मापकर संपूर्ण राजसत्ता ले ली है। एक पग जो अभी बाकी है उससे तुम्हारे शरीर को मापकर तुम्हारा शरीर लूंगा। महादानी राजा बलि ने वचन हार जाने के कारण अपनी राजसत्ता वामन विष्णु को बिना युद्ध किए सौंप दी तथा अपना शरीर भी समर्पित कर दिया। वामन वेशधारी विष्णु ने एक लाल धागे से हाथ बांधकर राजा बलि को अपने शिविर में लाकर मार डाला। इस लाल धागे से हाथ बांधते वक्त विष्णु ने बलि से कहा था कि तुम बहुत बलवान हो, तुम्हारे लिए यह धागा प्रतीक है कि तुम हमारे बंधक हो। तुम्हें अपने वचन के निर्वाह हेतु इस धागा को हाथ में बांधे रखना है। हजारों वर्ष बाद भी इस लाल धागे को इस देश केमूल निवासियों के हाथ में बांधने का प्रचलन है जिसे रक्षासूत्र या कलावा कहते हैं। इस रक्षासूत्र या कलावा को बांधते वक्त पुरोहित उस हजार वर्ष पुरानी कथा को श्लोक में कहता है कि : ‘येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल : तेन त्वामि प्रतिबद्धामि रक्षे मा चल मा चल।’ (अर्थात् जिस तरह हमने दानवों के महाशक्तिशाली राजा बलि को बांधा है उसी तरह हम तुम्हें भी बांधते हैं। स्थिर रह, स्थिर रह।)

पुराणों के प्रमाण
दरअसल, इन पौराणिक किस्सों से यही प्रमाणित होता है कि कृष्ण, राजा बलि, राजा महिषासुर, राजा हिरण्यकश्यप आदि से विष्णु ने विभिन्न रूप धरकर इस देश के मूल निवासियों पर अपनी आर्य संस्कृति थोपने के लिए संग्राम किया था। इंद्र एवं विष्णु आर्य संस्कृति की धुरी हैं तो कृष्ण और बलि अनार्य संस्कृति की।

बहरहाल, कृष्ण को क्षत्रिय या आर्य मानने वाले लोगों को कृष्ण काल से पूर्व राम-रावण काल में भी अपनी स्थिति देखनी चाहिए महाकाव्यकार वाल्मीकि ने रामायण में भी यादवों को पापी और लुटेरा बताया है तथा राम द्वारा किए गए यादव राज्य दु्रमकुल्य के विनाश को दर्शाया है।

वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के 22वें अध्याय में राम एवं समुद्र का संवाद है। राम लंका जाने हेतु समुद्र से कहते हैं कि तुम सूख जाओ, जिससे मैं समुद्र पार कर लंका चला जाऊं। समुद्र राम को अपनी विवशता बताता है कि मैं सूख नहीं सकता तो राम कुपित होकर प्रत्यंचा पर वाण चढ़ा लेते हैं। समुद्र राम के समक्ष उपस्थित होकर उन्हें नल-नील द्वारा पुल बनाने की राय देता है। राम समुद्र की राय पर कहते हैं कि वरुणालय मेरी बात सुनो। मेरा यह यह वाण अमोध है। बताओ इसे किस स्थान पर छोड़ा जाए। राम की बात सुनकर समुद्र कहता है कि ‘प्रभो! जैसे जगत् में आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर दु्रमकुल्य नाम से विख्यात एक बड़ा पवित्र देश है, वहां आभीर आदि जातियों के बहुत-से मनुष्य निवास करते हैं जिनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं। वे सबके सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं। उन पापाचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मैं सह नहीं सकता, श्रीराम! आप अपने इस उत्तम वाण को वहीं सफ ल कीजिए। महामना समुद्र का यह वचन सुनकर सागर के दियाए अनुसार उसी देश में वह अत्यंत प्रज्जवलित वाण छोड़ दिया। वह वाण जिस स्थान पर गिरा था वह  स्थान उस वाण के कारण ही पृथ्वी में दुर्गम मरुभूमि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।’

राम-रावण काल में यादवों के राज्य दु्रमकुल्य को समुद्र द्वारा पवित्र बताने तथा वहां निवास करने वाले यादवों को पापी एवं भयानक कर्म वाला लुटेरा कहने से सिद्ध हो जाता है कि यादव न आर्य हैं और न क्षत्रिय, अन्यथा वाल्मीकि और समुद्र इन्हें पापी नहीं कहते। जिस तरह से इस देश में दलितों को तालाब, कुओं आदि से पानी पीने नहीं दिया जाता था और डॉ. अंबेडकर को महाड़ तालाब आंदोलन करना पड़ा, क्या उससे भी अधिक वीभत्स घटना यादवों के दु्रमकुल्य राज्य के साथ घटित नहीं हुई है? रामचरितमानस में भी तुलसीदास ने उत्तर कांड के 129 (1) में लिखा है कि आभीर यवन, किरात खस, स्वचादि अति अधरुपजे। अर्थात् अहीर, मुसलमान, बहेलिया, खटिक, भंगी आदि पापयोनि हैं। इसी प्रकार व्यास स्मृति का रचयिता एक श्लोक में कहता है कि ‘बढ़ई, नाई, ग्वाला, चमार, कुभकार, बनिया, चिड़ीमार, कायस्थ, माली, कुर्मी, भंगी, कोल और चांडाल ये सभी अपवित्र हैं। इनमें से एक पर भी दृष्टि पड़ जाए ता सूर्य दर्शन करने चाहिए तब द्धिज जाति अर्थात् बड़ी जातियों का एक व्यक्ति पवित्र होता है।’

सहमत हैं इतिहासविद्

इसी कारण महान इतिहासकार डीडी कौशाम्बी ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत की संस्कृति और सहायता’ में लिखा है-‘ऋ ग्वेद में कृष्ण को दानव और इंद्र का शत्रु बताया गया है और उसका नाम श्याम, आर्य पूर्व लोगों का द्योतक है। कृष्णाख्यान का मूल आधार यह है कि वह एक वीर योद्धा था और यदु कबीले का देवता था। परंतु सूक्तकारों ने पंजाब के कबीलों में निरंतर चल रहे कलह से जनित तत्कालीन गुटबंदी के अनुसार, इन यदुओं को कभी धिक्कारा है तो कभी आशीर्वाद दिया है। कृष्ण शाश्वत भी हैं और मामा कंस से बचाने के लिए उसे गोकुल में पाला गया था। इस स्थानांतरण ने उसे उन अहीरों से भी जोड़ दिया जो ईसा की आरंभिक सदियों में ऐतिहासिक एवं पशुपालक लोग थे और जो आधुनिक अहीर जाति के पूर्वज हैं। कृष्ण गोरक्षक था, जिन यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी, उनमें कृष्ण का कभी आह्वान नहीं हुआ है, जबकि इंद्र, वरुण तथा अन्य वैदिक देवताओं का सदैव आह्वान हुआ है। ये लोग अपने पैतृक कुलदेवता को चाहे जिस चीज की बलि भेंट करते रहे हों पर दूसरे कबीलों द्वारा उनकी इस प्रथा को अपनाने का कोई कारण नहीं था। दूसरी तरफ जो पशुचर लोग कृषि जीवन को अपना रहे थे, उन्हें इंद्र की बजाय कृष्ण को स्वीकार करने में निश्चित ही लाभ था। सीमा प्रदेश के उच्च वर्ग के लोग गौरवर्ण के थे। उनका मत था कि काला आदमी बाजार में लगाए गए काले बीजों के ढेर की भांति है और उसे शायद ही कोई ब्राह्मण समझने की भूल कर सकता है। कन्या का मूल्य देकर विवाह करने का पश्चिमोत्तर में जो रिवाज था, वह भी पूर्ववासियों को विकृत प्रतीत होता था। कन्या हरण की प्रथा थी, जिसका महाभारत के अनुसार कृष्ण के कबीले में प्रचलन था और ऐतिहासिक अहीरों ने भी जिसे चालू रखा और जो पूर्ववासियों को विकृत लगती थी।अंततोगत्वा ब्राह्मण धर्मग्रंथों ने इन दोनों प्रकार के विवाहों को अनार्य प्रथा में कहकर निषिद्ध घोषित कर दिया।’

डीडी कौशाम्बी अपनी पुस्तक में स्पष्ट करते हैं कि ‘कृष्ण आर्यों कीे पशु बलि के सख्त विरोधी थे यानी गोरक्षक थे। कृष्ण की बहन सुभद्रा से अर्जुन द्वारा भगाकर शादी करने का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार कौशाम्बी ने भी कृष्ण को अनार्य अर्थात् असुर माना है।

इतिहासकार भगवतशरण उपाध्याय ने अपनी ऐतिहासिक पुस्तक ‘खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर’ में लिखा है कि ‘क्षत्रियों ने ब्राह्मणों के देवता इंद्र और  ब्राह्मणों के साधक यज्ञानुष्ठानों के शत्रु कृष्ण को देवोत्तर स्थान दिया। उन्होंने उसे जो क्षत्रिय भी न था, यद्यपि क्षत्रिय बनने का प्रयत्न कर रहा था को विष्णु का अवतार माना और अधिकतर क्षत्रिय ही उस देवदुर्लभ पद के उपयुक्त समझे गए।’

उपाध्याय ने इसे भी स्पष्ट कर दिया है कि कृष्ण ब्राह्मणों के देवता इंद्र और उनके यज्ञानुष्ठानों के प्रबल विरोधी थे जबकि वे क्षत्रिय नहीं थे। कृष्ण के बारे में उपाध्याय ने लिखा है कि वे क्षत्रिय बनने का प्रयत्न कर रहे थे। अब तक जो भी प्रमाण मिले हैं वे यही सिद्ध करते हैं कि अहीर और कृष्ण आर्यजन नहीं थे। कृष्ण और अहीर इस देश के मूलनिवासी काले लोग थे। इनका आर्यों से संघर्ष चला है।

ऋग्वेद कहता है कि ‘निचुड़े हुए, गतिशील, तेज चलने वाले व दीप्तिशाली सोम काले चमड़े वाले लोगों को मारते हुए घूमते हैं, तुम उनकी स्तुति करो।’ (मंडल 1 सूक्त 43)

इस आशय के अनेक श्लोक ऋ ग्वेद में हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि आर्य लोग भारत के मूल निवासियों से किस हद तक नफ रत करते थे तथा उन्होंने चमड़ी के रंग के आधार पर इनकी हत्याएं की हैं। यादवश्रेष्ठ कृष्ण काली चमड़ी वाले थे। इंद्र और यज्ञ विरोधी होने के लिहाज से ऋग्वेद के अनुसार उनका संघर्ष अग्नि, सोम, इंद्र आदि से होना स्वाभाविक है।

जिनसे जीत नहीं सकते उन्हें मिला लो
ऋग्वेद से लेकर तमाम शास्त्रों में अहीर व अहीर नायक कृष्ण अनार्यकहे गए हैं लेकिन इसके बावजूद जब इस देश के मूल निवासियों में कृष्ण का प्रभाव कायम रहा तो इन आर्यों ने कृष्ण के साथ नृशंसता बरतने के बावजूद उन्हें भगवान बना दिया और कृष्णवंशीय बहादुर जाति को अपने सनातन पंथ का हिस्सा बनाने में कामयाबी हासिल कर ली। जब कृष्ण अनार्य थे तो गीतोपदेश का सवाल उठना लाजिमी है गीतोपदेश में कृष्ण ने खुद भगवान होने, ब्राह्मण श्रेष्ठता, वर्ण व्यवस्था बनाने जैसे अनेक गले न उतरने वाली बातें कही हैं। ऋ ग्वेद स्वयं ही गीता में उल्लेखित बातों का खंडन करता है। जब कृष्ण खुद वेद के अनुसार असुर और इंद्रद्रोही थे तो वे वर्ण व्यवस्था को बनाने की बात कैसे कर सकते हैं। गीता में ब्राह्मणवाद को मजबूत बनाने वाली जो भी बातें कृष्ण के मुंह से कहलवाई गई हैं वे सत्य से परे हैं। काले, अवर्ण असुर कृष्ण कभी भी वर्ण-व्यवस्था के समर्थक नहीं हो सकते। भारत के मूल निवासियों में अमिट छाप रखने वाले कृष्ण का आभामंडल इतना विस्तृत था कि आर्यों को मजबूरी में कृष्ण को अपने भगवानों में सम्मलित करना पड़ा। यह कार्य ठीक उसी तरह से किया गया जिस तरह से ब्राह्मणवाद के खात्मा हेतु प्रयत्नशील रहे गौतम बुद्ध को ब्राह्मणों ने गरुड़ पुराण में कृष्ण का अवतार घोषित कर खुद में समाहि  करने की चेष्टा की।

जिस तरह से असुर कृष्ण की भारतीय संस्कृति आर्यों ने उदरस्थ कर ली उसी तरह बुद्ध की वैज्ञानिक बातों ने हिन्दू धर्म के अवैज्ञानिक कर्मकांडों के समक्ष दम तोड़ दिया। डॉ. आंबेडकर के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद अब भारत में कुछ बौद्ध नजर आ रहे हैं, वरना इन आर्यों ने बुद्ध को कृष्ण का अवतार और कृष्ण को विष्णु का अवतार घोषित कर कृष्ण एवं बुद्ध को निगल लिया था। कितनी विडंबना है कि विष्णु का अवतार जिस कृष्ण को बताया गया है, वह कृष्ण लगातार वेद से लेकर महाभारत ग्रंथ में इंद्र से लड़ रहा है।

एक सवाल उठेगा कि यदि कृष्ण आर्य या क्षत्रिय नहीं थे तो श्रीमद्भागवद गीता में क्यों लिखा है कि ‘यदुवंश का नाम सुनने मात्र से सारे पाप दूर हो जाते हैं।’ (स्कंध-9. अध्याय. 23, लोक.19) मैं इस संदर्भ में यही कहूंगा कि असुर कृष्ण अति लोकप्रिय थे। वे लोकनायक थे। उनकी लोकप्रियता इस देश के मूल निवासियों में इतनी प्रबल थी कि आर्य उन्हें उनके मन से निकाल पाने में सफ ल नहीं थे। बहरहाल, मैंने कृष्ण और यादवों के संदर्भ में कुछ तथ्य विभिन्न स्रोतों से एकत्रित कर तर्कशील पाठकों के समक्ष बहस हेतु रखा है। मैं यह सवाल अब पाठकों के लिए छोड़ रहा हूं कि कृष्ण कौन थे? यादव किस वर्ण के हैं ? मैं समझता हूं कि ये प्रश्न अब अनुत्तरित नहीं रह गए हैं।

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कृष्ण जन्म खंड - अध्याय 112
कृपया इसको ध्यान से पढ़े - खासकर पौराणिक विद्वान - और मुझे कुछ सवालो के जवाब देने का कष्ट करे -
1. कुछ पौराणिक कृष्ण के चरित्र पर जो दोष पुराण लगाते हैं उनको ये कह कर ख़ारिज करते हैं की ये मिलावटी है - पर प्रूफ करने की बात कहो तो चुपके से खिसक जाते हैं - ऐसा क्यों ????? मिलावटी चीज़ को मानना कहा तक न्यायसंगत और तर्कसंगत है ??? जबकि आपको ज्ञात है की पुराणो में मिलावट है - तो भाई सीधे तौर पर वेदो की और क्यों नहीं लौट आते ???
2. कृष्ण जी ने 16108 कन्यायो से विवाह रचाया - यही नहीं उनके साथ रमण (सेक्स) भी किया - भाई कोई मुझे बताएगा - इतना सेक्स करने के लिए कितना समय चाहिए और किस प्रकार संभव है ??? क्या कृष्ण जी को - ग़ाज़ी - अकबर - मुग़ल लुटेरा समझ रखा है क्या ?????
3. कृष्ण जी ने जो इन स्त्रियों के साथ रमण किया - इस पर कुछ पौराणिक बोलते हैं की उस समय कृष्ण की उम्र - 7 वर्ष थी - तो भाई आप मुझे एक बात बताओ - 7 वर्ष की आयु में "रमण" किस प्रकार हो सकता है ?? दूसरा चलो यदि मान भी लू तो बताओ भाई की जो "महाबली मुर दैत्य" को यमलोक भेजा - तो क्या 7 वर्ष का बालक ऐसा कर सकता है - दोनों ही बातो से स्पष्ट है की कृष्ण जी की उम्र यौवन अवस्था की थी -
4. पुराणो में क़ुरानी बहिश्त का नजारा - जी हां - थोड़ा ध्यान से पढ़िए - कृष्ण जन्म खंड - अध्याय 112 में "महाबली मुर दैत्य" को मारने का एक विवरण मिलता है - वहाँ कृष्ण ने देखा की "16000" स्त्रीया जिनकी आयु 100 वर्ष थी पर वो नव-यौवना थी - यानि की पूर्ण युवा थी - उनपर उम्र का कोई असर नहीं हुआ था - तो कृष्ण जी ने उन सबसे विवाह कर लिया और रमण (सेक्स) कर संतान भी उत्पन्न की - वो भी हर स्त्री से 10 लड़के और एक कन्या - तो भाई जरा हिसाब लगावो की कृष्ण की कुल संतानो की संख्या कितनी हुई ????
5. मुझे कोई पौरणिक विद्वान ये भी कृपया समझाने की चेष्टा करे की मुर दैत्य को क्यों मारा गया - क्योंकि ये स्पष्ट नहीं है की किस कारण इस बेचारे दैत्य को मारा - कही उसकी "16000" स्त्रियों के लालच में तो नहीं ?
अब इतना कुछ सुनने के बाद और प्रमाण के तौर पर इमेज है - चेक करे
तो भाई कृष्णा जी - पूर्णतया शुद्धचरित्र - योगी - महाज्ञानी - वेद कर्म करने हारे - वीर - एक पत्नी वाले - अत्यंत ज्ञानी - थे -
में कैसे पुराणिक आधार पर - लम्पट - कपटी - दोषी - या यु कहु की भाई मेरे पास शब्द नहीं - में कृष्ण को गलत नहीं बोल सकता - पर पुराणो के आधार पर चरित्रहीन भी नहीं मान सकता -
पौराणिक कृष्ण और महाभारत के कृष्ण - दोनों के चरित्र का अध्ययन करे तब किसी निर्णय पर पहुंचे - पर चिंतन - पूर्वाग्रह और दुराग्रह से न करके - शुद्ध बुद्धि से करे - हठ को त्याग दे - सत्य को अपना ले।
नमस्ते
 
 
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हिन्दू धर्म मे अहीर लोग खुद को क्या समझते हैं यह उनके ऊपर निर्भर करता है लेकिन हिन्दू शास्त्र तो चीख-चीख कर यही कहता है कि अहीर "ब्राह्मण,क्षत्रिय या वैश्य" नही हैं।
व्यास स्मृति के अध्याय 1 के 11वें एवं 12 वें श्लोक का कहना है कि-
"वर्धिको,नापितो,गोपः, आशापः,कुम्भकारकः
वणिक,किरात,कायस्थः, मालाकारः कुटिम्बिनः।
बराटो वेद चांडाल दासः स्वपचश्च कोलकाः,
ऐते अंत्याजः समारन्यता ये चान्ये च गवासनाः।
एसाम संभाषणात्मानम दर्शनाद के व्रिक्षणम।।"
अर्थात
"बढ़ई,नाई,ग्वाला,चमार,कुम्भकार,बनिया,चिड़ीमार,कायस्थ,माली,कुर्मी,भंगी,कोल और चांडाल,ये सभी अपवित्र हैं।इनमें से एक पर भी दृष्टि पड़ जाए तो सूर्य दर्शन करने चाहिए तब द्विजाति(बड़ी जातियों का व्यक्ति) पवित्र होता है।"
व्यास स्मृति का स्पष्ट मत है कि गोप अर्थात अहीर अंत्यज/अछूत होता है।श्री अजय सिंह विष्ट जी अर्थात श्री योगी आदित्यनाथ जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उस भवन में प्रवेश तब तक कैसे हो सकता है जब तक अंत्यज के रहने से अपवित्र हुए कमरों का शुद्धिकरण न हो जाय।स्वभाविक है कि 5 कालिदास मार्ग के मुख्यमंत्री आवास को शुद्ध किया ही जाना था।गंगा जल,गोमूत्र,अक्षत,रोली,हवन आदि के साथ भूसुर ब्राह्मणों ने मंत्रोच्चार कर इस अंत्यज निवास को हिन्दू प्रेरणा पुरुष योगी आदित्यनाथ जी के लायक बनाया है जिस निमित्त यह शुद्धिकरण कार्यक्रम किया गया है।
इतिहास गवाह है कि वाराणसी में जब पंडित सम्पूर्णानन्द जी की मूर्ति को बाबू जगजीवन राम जी ने छू दिया था तो पुरोहितों ने उसे दूध और गंगाजल से धुल के पवित्र किया था।इसी तरह से जब समाजवादी नेता राजनारायण जी ने काशी विश्वनाथ मन्दिर में अछूत प्रवेश कराया था तो करपात्री महाराज जी ने अलग मंदिर ही बना दिया था।
अब देश में रामराज्य आ रहा है।गांधी जी की कल्पना रामराज्य लाने की थी।रामराज्य क्या है?रामराज्य में बाल्मीकि जी रामायण के युद्ध कांड के द्वादिश सर्ग में लिखते हैं कि-
"तमब्रवीत तदा रामः शृणु मे वरुणालय।
अमोघोयं महावाणः कस्मिन देशे निपत्यताम।30
रामस्य वचनं श्रुत्वा तं च दृष्टा महाशरम।
महोदधिर्महातेजा राघवं वाक्यमद्रवीत।।31
उत्तरेणावकाशोस्ति कश्चित् पुन्यतरो मम।
द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान।।32
उग्रदर्शन कर्माणो बहवस्तत्र दस्यवः।
आभीर प्रमुखाह पापाह पिबन्ति सलिलं मम।।33
तैर्ण तत्स्पर्शनन पापं सहेयं पापकर्मभिः।
आमोघह क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः।।34
तस्य तद वचनं श्रुत्वा सागरस्य महात्मनं।
मुमोच तं शरं दीप्तं परं सागरदर्शनात।।35
तेन तंमरुकांतारं पृथिव्यां किल विश्रुतम।
निपापितः शरो यत्र वज्राशनिसमप्रभः।।36
ननाद च तदा तत्र वसुधा शल्यपीड़िता।
तस्माद व्रणमुखात तोयमुत्पपात रसातलात।।"37
अर्थात
"लंका जाने हेतु जब रामजी समुद्र तट पर पँहुचे और समुद्र से सूख जाने को कहे तो समुद्र ने खुद में समाहित असंख्य जलचरों का हवाला देते हुए सूखने से जब असमर्थता जताई तो रामजी ने अपने धनुष पर अमोघ वाण चढ़ाकर कहा कि इसे चलाकर मैं तुम्हे सुखा देता हूँ।समुद्र ने रामजी को सनातन परंपरा याद दिलाते हुए कहा कि आपके पास नल-नील इंजीनियर हैं जिनसे आप सेतु बंधवा लीजिये और पार हो लीजिये।राम ने समुद्र की बात सुनके कहा कि मैं अब अपने वाण से तुम्हे नही सुखाऊंगा, सेतु बांधकर पार कर लूंगा पर यह वाण कहाँ चलाऊं क्योकि यह प्रत्यंचा से उतर नही सकता,इसे चलना ही चलना है।राम के इस कथन के बाद समुद्र ने कहा कि हे राम! मेरे उत्तर तरफ एक पवित्र देश द्रुमकुल्य है जहां आभीर(अहीर) आदि जातियों के बहुत से लोग निवास करते हैं जिनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं।वे सब के सब पापी और लुटेरे हैं।वे लोग मेरा जल पीते हैं।उन पापाचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है।इस पाप को मैं नही सह सकता।श्रीराम आप अपने वाण को वही छोड़ दीजिए।समुद्र के इस कथन पर राम ने अपने अमोघ वाण को उस अहीरों के राज्य द्रुमकुल्य पर छोड़ दिया जिससे वह स्थान मरुभूमि में बदल गया।सारे अहीर धरती में समाहित हो गए।"
बाल्मीकि जी ही लिखते हैं कि ब्राह्मण पुत्र के निधन पर रामचंद्र जी ने शूद्र शम्बूक नाम के तपस्वी ऋषि को गर्दन काटके मार डाला कि उसने तपस्या क्यो की?
देश के संविधान रचयिता बाबा साहब डा भीम राव अम्बेडकर को संस्कृत इसलिए भारतीय अध्यापकों ने नही पढ़ाया कि वे अछूत थे।उन्हें विदेश जाकर संस्कृत पढ़ना पड़ा।2011 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर श्री मिथिलेश चतुर्वेदी जी ने दलित छात्रा सरिता को ज्योतिष पढ़ाने से इसलिए मना कर दिया कि वह दलित है।देश के सर्वश्रेष्ठ पद धारक (आईएएस,प्रमुख सचिव, सांसद, अध्यक्ष -SC/ST आयोग) पी एल पुनिया जी को जगन्नाथ मंदिर में इसलिए प्रवेश से रोक दिया गया कि वे दलित थे और उनके प्रवेश से मंदिर परिसर अपवित्र हो जाता।डा लोहिया के सहयोगी रहे तथा फिरोज गांधी जी के खिलाफ चुनाव लड़े नन्दकिशोर नाई जी को अम्बाला के संस्कृत पाठशाला से इसलिए निष्कासित कर दिया गया कि वे हजाम थे।अलवर के स्वामी सुधानन्द योगी को दिल्ली के एक संस्कृत पाठशाला से इसलिए निष्कासित कर दिया गया कि वे जाति से अहीर थे।पंढरपुर के भगवान बिठोवा का दर्शन बाबा साहब अपनी पत्नी रमा बाई जी को उनके आग्रह के बावजूद नही करा सके क्योकि वे महार थे।बाबा साहब को होटल,कोर्ट,किराए के घर तक में जाति के नाते अपमान भोगना पड़ा और पवित्रता-अपवित्रता के रोग से जूझना पड़ा।
हिन्दू धर्म के अपने विधि-विधान हैं,नियम और संविधान है।हमे उन्हें मानना ही है तभी तो राजीव गांधी जी को नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर में पत्नी सोनिया गांधी जी के साथ जाने से रोक दिया जाता है क्योकि सोनिया जी गैर हिन्दू जो ठहरीं तो नेपाल की महिला राष्ट्रपति जो सधवा नही हैं उन्हें विधवा होने के नाते दर्शन से मना कर दिया जाता है।
बिहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट AIR 1980 कृष्णा सिंह बनाम मथुरा अहीर के मामले में निर्णय देता है कि अहीर शूद्र है लिहाजा उसे महंथ बनने का अधिकार नही है।
हमारे कुछ यादव साथी जो खुद को हिन्दू धर्मानुसार श्रेष्ठ मानते हैं या क्षत्रिय कहते हैं उनका भी अपना एक तर्क है कि भागवत पुराण में उल्लिखित है कि "यदोर्वंशः नरः श्रुत्वा,सर्व पापयिप्रमुच्यते।" अर्थात "यदुवंश का इतिहास सुनने मात्र से सारे पापों का विनाश हो जाता है।"हिन्दू धर्म भी अजीब धर्म है जहां एक तरफ कृष्ण का गुणगान है तो वही दूसरी तरफ वेद में कृष्ण को असुर या राक्षस कहके उनका वध इंद्र के हाथों करवा दिया गया है।
ऋग्वेद के मंडन -1,सूक्त-101 का पहला मंत्र कहता है कि -
"प्र मंदिने पितुमदरचता बचो यः कृष्णगर्भा निर्हंनृ जिश्वना।
अवश्यवो व्रिषणं वज्र दक्षिडं मरुत्वंतं सख्याह हवामहे।।"
अर्थात
"हे ऋत्विग्गण!श्रेष्ठ इंद्र देव की हविष्यान्न देकर अर्चना करो।रिजिश्व की सहायता से कृष्ण असुर की गर्भिणी स्त्रियों के साथ उसका वध करने वाले ,दाएं हाथ में वज्र धारण करने वाले ,मरुदगणों की सेना के साथ विद्यमान रहने वाले ,शक्ति सम्पन्न ,उन इंद्रदेव का अपने संरक्षण की कॉमना करने वाले हम यजमान मित्र भाव से आह्वान करते हैं।"
ऋग्वेद के मंडन-1,सूक्त -130 का 8 वां मंत्र,मंडन-8,सूक्त-96 का 13 वां,14 वां,15 वां एवं 17 वां मंत्र भी कृष्ण को असुर घोषित करता है।
तुलसी दास जी के रामचरित मानस का हम खूब प्रेम से लाखों खर्च कर सस्वर पाठ करवाते हैं जिसके सप्तम सोपान,उत्तरकाण्ड के मासपारायण के उन्तीसवें विश्राम के आखिरी पन्ने पर अहीरों के बारे में तुलसी दास जी लिखते हैं कि-
"आभीर,यवन,किरात,खस,स्वपचादि अति अधरूपजे।"
अर्थात
"अहीर,मुसलमान,किरात आदि अत्यंत ही अधम और नीच जातियां हैं।"
 



 
 

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